श्रॆणी पुरालेख: कहानियां

मन से गढ़ा हुआ या किसी वास्तविक घटना के आधार पर प्रस्तुत किया हुआ मौखिक या लिखित विवरण …

गुड़िया मर गयी

गुड़िया मर गयी :
* रचना में आँसुओं का आधिक्य, स्याही की कमी है,
प्रभू! तू ही इस जहां में सबसे अधिक धनी है,
दे तो सबको समान जिंदगी की दौलत दे, अन्यथा-
तेरे ही बनाए बन्दों की एक स्याह सी जमीन है,
बसा घरौंदा इस पर उसी का जो किस्मत का धनी है,
न जाने क्यों?………
तुझ पर यकीन रखने वालों की,आँख में सदा नमी है।।
ये घटना छोटे से कस्बे के एक रेलवे स्टेशन की है, जो लगभग आज से लगभग ३० या ३२ वर्ष पूर्व घटित हुई होगी।


  "क्या  भयी  आज  भी  विलम्ब?     

ऐसा कब तक चलता रहेगा। अरे भई मैं स्टेशन अधीक्षक हूँ और यहाँ पोर्टर का काम कर रहा हूँ। आपकी जगह यदि लाल हरि झंडिया ही दिखाता रहूँगा तो अपना कार्य कब निपटाऊंगा महाशय?”
स्टेशन अधीक्षक श्री कंदर्प नारायण मिश्रा जी ने विलम्ब से आए पोर्टर धनीराम को हड़काते हुए कहा। धनीराम अपनी ढीठता और मिश्रा जी की सहजता का पूर्ण लाभ उठाते हुए, बेशर्मों की भाँति खिखियाता हुआ:-
“अब क्या है मिश्रा जी, एक तो सायकिल का टायर पञ्चर हो गया था, ऊपर से आप भी हड़काने लगे।” “अच्छा ठीक है ठीक है भयी, कम से कम बहाने तो नए ले आया करिए महानुभाव” …. मिश्रा जी तो पूर्व परिचित हैं, इस बहानेबाजी और रोज रोज की देरी से भी। इसलिए ज्यादा कुछ बोले बिना ही अपने कक्ष में चले गए……… तभी स्टेशन पर पैसेंजर ट्रेन आकर रुकती है।आने जाने वाले सभी यात्री अपनी-अपनी जगह हो लिए। सिवाय……एक यात्री के। वो यात्री प्लेटफार्म पर लगी बेंच के नीचे चुपचाप जाकर बैठ गया। तबसे कितनी ट्रेनें आयीं और गयीं लेकिन, वो यात्री वहीं उसी स्थान पर बिना हिले डुले स्थिर बना रहा। सुबह से दोपहर हो गयी स्टेशन के सभी कर्मचारी अपनी ड्यूटी के अनुरूप भोजन ग्रहण की तैयारी में लगे गए।
मिश्रा जी भी अपना डब्बा सहेजते हुए अपने सहकर्मचारी को भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं। क्योंकि, अगली ट्रेन आने के मध्य काफी समय था अतः यही उचित समय भोजन करने के लिए मिलता था, आखिर मिश्रा जी को भी तो आदत थी सबको साथ लपेटकर भोजन ग्रहण करने की।
मिश्रा जी हाथ मुँह धोने प्लेटफार्म पर बनी पानी की टँकी की तरफ बढ़ते हैं तभी उनकी नजर बेंच के नीचे बैठे यात्री पर गयी।
पहले तो उन्होंने नजरअंदाज किया। नहीं माना मन नजदीक जाकर देखने का प्रयास किया तो सामने बेंच के पावे से सटकर दोनों हाथों के फंदे के मध्य, घुटनों को घेरे में लिए और घुटनो पर ही ठुड्डी के सहारे पूरे सर का भार दिए बैठी एक बालिका थी। रही होगी तकरीबन ११ या १२ वर्ष की। मैले बिखरे बाल, लग रहा था सदियों से इसे सँवारा ही न गया हो। उसके बगल ही उससे भी मैली एक गुड़िया रखी हुई थी।

” हे कौन है रे, और सुबह से यहाँ काहे बैठी है?”
मिश्रा जी ने महज मानवता वश उससे प्रश्न किया। वो चुपचाप बैठी कोई उत्तर नहीं देती। पुनः मिश्रा जी:-” री लड़की कौन है तू, कहाँ जाना है, किसके साथ है तू?” पुनः कोई उत्तर नहीं। मिश्रा जी:- ” जाने कहाँ से आ जाते हैं मरने को यहाँ, न पता न ही ठिकाना। पूछो भी तो मुँह में दही जमाकर बैठ जाते हैं।”
झुंझलाते हुए हाथ मुँह धोने लगते हैं।तभी पीछे से उनकी पीठ पर जोर का प्रहार होता है।
मिश्रा जी दर्द से कराहते हुए:-
” अबे कौन है नालायक क्या खाया बे जो भीम की ताकत लगा कर अबूझ दुश्मनी निकाल रहा।” मिश्रा जी जैसे ही पलट कर देखते हैं स्तब्ध रह गए।
सामने वही अबोध, नाजुक बालिका थी जिसने मिश्रा जी जैसे सशक्त व्यक्तित्व के मुख से कराह निकलवा दी।
‌ मिश्रा जी के क्रोध की पराकाष्ठा ही थी कि, एक नजर उसके हुलिए पर गयी- मैला सा नंगे पैर तक झूलता घाघरा, ऊपर से किसी विद्यालय वर्दी की मैली बुशर्ट, पहने एक हाथ मे वो ही फटीचर गुड़िया उठाए , दाँत फाड़ती मिश्रा जी की दशा पर बड़ी प्रसन्न हो रही थी।

‌मिश्रा जी को समझते देर न लगी के इस पर क्रोध करना मतलब ईश्वर का अपमान करना था। क्योंकि जो अबोध, दुर्भाग्य का मारा है उससे कैसा रोष।
सहायक महतो जी ने आवाज लगाते हुए आ धमके:-
” क्या मिश्रा जी पूरा गंगा स्नान करके ही भोजन ग्रहण करने का विचार है क्या?” “अरे नहीं महतो जी ये बालिका….” बात को बीच के ही काटते हुए महतो जी:-
” अरे का मिश्रा जी आपौ कहाँ इस पगलिया के चक्कर मे पड़े हैं। अब चलिए भी……..” “अरे सुनो तो महतो जी….”
महतो जी लगभग घसीटते हुए मिश्रा जी भोजन के लिए ले गए कक्ष में।
मिश्र जी का मन नही लगा रहा था। महतो जी फिर भन्नाएंगे का संकोच करते हुए बोल ही पड़े:-
” महतो जी जरा देखिएगा तो बेचारी सुबह से बैठी है। जाने कुछ खायी पी भी है नहीं?” ” हमें पता था पंडित महाराज आपके हलक से निवाला नहीं उतरने वाला। जाओ खिलाओ, बनाओ स्टेशन को सराय…..” ” क्या महतो जी आप भी….।” कहकर मिश्रा जी खाने का डब्बा लेकर खड़े हो गए। “अरे दानी कर्ण महाराज जी पहिले अपना भोजन करिए फिर यहाँ से खिसकने की हिमाकत करिएगा।” अक्सर मिश्रा जी के सहृदयता के कारण उनके अधीनस्थ भी उन्हें हड़का लिया करते थे। सो आज्ञा का पालन करते हुए फटाफट भोजन करके,किनारे सहेजी साफ सुथरी रोटी उठाकर उस बालिका के पास जा पहुँचे। मिश्रा जी को देखते ही उसने फिर से दाँत फाड़ना शुरू कर दिया।
मिश्रा जी बड़े प्यार से :-” ऐ लड़की सुन, ले कुछ खा ले।”
उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी सिवाय हँसने के। ” खीस काहे काढ़े है लड़की,ले खा ले कुछ भूखी होगी। न खाके काहे हमें पाप का भागी बना रही।” मिश्रा जी ने उसके सामने रोटी का टुकड़ा छोड़कर पुनः अपने कक्ष में चले गए। मन नहीं मान रहा था सो बीच बीच मे जाकर उसको झाँक भी आते थे। थोड़े समय बाद उसने रोटी भी खायी और उसी पानी की टँकी पर जाकर अंजली भर पानी पीने लगी।मिश्रा जी की देखा देखी उसने भी हाथ मुँह धोया। अब उसके चेहरे की धूल थोड़ी हटी, तो बड़ी प्यारी सी मासूम सूरत निखर कर सामने आयी। उसे देख मिश्रा जी किसी भूखे को रोटी खिलाकर फूले नहीं समा रहे थे।
खैर पुण्य कल्याण के सुखानुभूति पश्चात पुनः अपने कार्य मे लग गए। रात्रि प्रहर जब घर जाने लगे तो एक बार ध्यान आया कि, कहाँ होगी वो बालिका?
आस-पास न दिखायी देने पर “चली गयी होगी कहीं” के विचार से आस्वस्त होते हुए गृह प्रस्थान कर लिया।

दूसरे दिन समय के पक्के मिश्रा जी सुबह स्टेशन पर हाजिर थे। तभी उन्होंने देखा वो बालिका उसी बेंच के नीचे सो रही थी।
बड़ी दया, करुणा के साथ उस पर नजर डालते हुए ” बेचारी पता नहीं कौन है” कहकर निकल गए। पुनः दोपहर के भोजन में उसका भी हिस्सा लगाया और उसके पास रख आए। ये सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।
एक दिन प्लेटफार्म के सफाई कर्मचारियों ने बताया कि:-
‌ ” बड़े साहब जी बड़ी स्वाभिमानी पगलेट है ये, कभी किसी का दिया नहीं खाती। बहुत लोग आते- जाते इसे बिस्कुट फल वगैरह पकड़ा जाते हैं। ये वो सब फेंक देती है। आप जो भी देते हैं बस उसी को खाकर दिन रात बिता देती है ये।” मिश्रा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन दिनों छोटे स्टेशनों पर खाने पीने के स्टॉल भी नहीं हुआ करते थे, इसलिए मिश्रा जी अब घर से एक पैकेट बिस्कुट और डब्बे में खाने की मात्रा ज्यादा लाने लगे थे।
हाँ ये अलग बात थी कि, बदले में मिसराइन जी की अच्छी खासी लताड़ मिलती थी। फिर भी करुण हृदय तो सब कर्म बर्दाश्त कर लेता है। एक दिन बड़े ही प्यार से मिश्रा जी ने उसको पूछा:- “कहाँ से आयी है बिटिया? तेरे घर वाले कहाँ हैं।” मिश्र जी के स्नेह से गदगद हो उसने रेलवे पटरी पर उँगली से इशारा किया। “माँ है तेरी?” मिश्रा जी ने पूछा। वो कुछ भी बोल पाने में असमर्थ थी। सिवाय ” गुड़िया मम्मममग्ग्ग गी” ( गुड़िया मर गई ) के। मिश्रा जी के भली भाँति भान था कि, उसका कहने को अपना दुनियां में कोई भी नहीं होगा फिर भी अनायास ही उन्होंने ये प्रश्न कर लिया।
मिश्रा जी से अपनत्व व सहानुभूति पाकर वो भी खुश रहती।
अब तक तो वह मिश्रा जी से काफी घुलमिल गयी थी। वे अब उसको गुड़िया नाम से ही बुलाने लगे। मिश्रा जी भी उसके लिए हरसंभव मदद हेतु उपस्थित रहते किन्तु उतना ही जितना कि अपने ग्रह दशा शांत रखने के लिए गृह दशा शांति आवश्यक थी। अब तक तो गुड़िया के हुलिए में भी खासा परिवर्तन आ गया था। सफाई कर्मचारियों में सुशीला नामक महिला को मिन्नतें कर- करके मिश्रा जी ने गुड़िया को बाल सँवारना, कपड़े पहनना सिखवा दिया। अब वह अपनी क्षमता अनुरूप साफ सफाई का भी काम करने लगी। मिश्रा जी जब भी ड्यूटी पर आते उनके आगे दाँत दिखाती पहुँच जाती और अपने कपड़े से उनकी कुर्सी मेज साफ करने लगती।
दिन भर तो उसका यूँ ही निकल जाता। रात्रि के लिए भी मिश्रा जी ने पानी की टँकी के पीछे बड़े बरगद के पेड़ में सटाकर एक तिरपाल का टूकड़ा तनवा दिए। किनारे भी सहारा देते हुए उसके लिए एक सुरक्षित सर छुपाने के स्थान बनवा दिए। बहुत लोगों ने इसका विरोध भी किया किन्तु सबको वे मानवता का पाठ पढ़ाते हुए स्वीकृति ले ही लेते।
मिश्रा जी यदा कदा रात्रि ड्यूटी रहते तब तो उसकी सुरक्षा के लिए निश्चिंत रहते। लेकिन जब भी ड्यूटी किसी और कि लगती या बदलती अगले कर्मचारी को वे गुड़िया की जिम्मेदारी सौंपते जाते। ऐसे ही समय निकल गया और पूरा एक वर्ष बीत गया और पता भी न चला। गुड़िया भी यहाँ अपने घर जैसा अनुभव कर खुश रहती जिसका प्रमाण उसके चेहरे की मुस्कुराहट और उसके बदले हाव भाव से मिल जाता था।
एक दिन सुबह जैसे ही मिश्रा जी स्टेशन पहुँचे, गुड़िया के कराहने के स्वर ने उन्हें विचलित कर दिया। वे भागकर उसके पास पहुँचे। गुड़िया की तो दशा ही बिगड़ी हुई थी। उसके चेहरे पर अथाह पीड़ा छलक रहा था और घाघरा रक्त से भीगा हुआ था। मिश्रा जी का स्वर सुनते ही गुड़िया कराहते रुदन करते हुए- ” गगगगुड़िया मम्मममग्ग गी( गुड़िया मर गयी) मिश्रा जी दहाड़ते हुए रात्रि शिफ्ट कर के घर जाने को तैयार श्रीवास्तव जी पर बिफर पड़े:- ” थू है श्रीवास्तव जी, आपसे उम्मीद न थी, कम से कम उम्र का लिहाज और प्रभु की लाठी का तो खयाल किया होता। ऐसी अमर्यादित हरकत शोभा देती है क्या भला?…”
मिश्रा जी बिना सोचे समझे गुड़िया के प्रति अपनी चिंता और भय को श्रीवास्तव जी पर उड़ेले जा रहे थे। ” अरे हुआ क्या मिश्रा जी बताइयेगा तो पहिले? बस बेफिजूल के आरोप लगाए जा रहे हैं।” ” क्या बताना है श्रीवास्तव जी, इतने भी अनजान तो न बनिए। देखिए इस बच्ची की क्या दुर्दशा बनी हुई है। बेचारी… ….रे जरा भी तरस नहीं आयी आपको?” श्रीवास्तव जी वास्तविकता से जब तक परिचित होते मिश्रा जी पूरी तरह उनकी आरती उतार चुके थे। ” होश में हो मिश्रा जी जरा दिमाग ठिकाने रखा करिए। कुछ भी कैसा भी लांछन लगाने से पहिले एक बार विचार तो कर लिया करिए कि, किसको और क्या बके जा रहे हैं।” ” जो भी है हमने आपको गुड़िया की हिफाजत का जिम्मा दिया था…….” मिश्रा जी की बात को बीच मे ही काटते हुए-
” ऐसा है न मिश्रा जी हम यहाँ सरकार की नौकरी करते हैं। ऐरे गैरे नत्थू खैरे की चाकरी नहीं। कृपा करके आप अपनी उदारता और भ्रष्ट मति कहीं और चलाइये।”
श्रीवास्तव जी ने अपने क्रोध का ज्वार बाँटते हुए वहाँ से चलता बने।
इतना हो हल्ला सुनकर सुशीला भी वहाँ आ गयी। मिश्रा जी ने सुशीला को कैसे भी करके गुड़िया को संभालने का अनुरोध करते हैं।
पहले तो सुशीला भी इन सबसे भाग रही थी लेकिन औरत होने के मर्म ने उसे रोक लिया।
करीब जाकर देखा तो बात ही कुछ और निकली: – “क्या साहेब नाहक ही सिरीवास्तव साहेब जी को चिल्लाए पड़े हैं आप। जैसा आप समझ रहे वैसा कुछ भी नहीं है।” ” फिर ये पीड़ा ये ……?” ” अरे साहेब जी, अऊरत होने का पहिला पायदान समझो। अब तो हर महीना ही इसको इस दरद से गुजरना पड़ेगा इसको।” ‌ मिश्रा जी श्रीवास्तव जी पर अनायास चिल्लाने व मिथ्या दोषारोपण हेतु तनिक शर्मिंदा भी थे। लेकिन उनकी चिन्ता और पीड़ा दोनों में वृद्धि हो गयी। अभी तक तो सुशीला को बोलकर उसकी मदद करवा दी।लेकिन आगे क्या? कब तक कोई बातों का मान रखेगा आखिर? फिर सबसे बड़ी समस्या अब ये थी कि, शीघ्र ही उनके तबादले के समय भी निकट था। जब तक तो वे वहाँ हैं, ठीक है उनके जाने के बाद……..? ‌ आखिर उसे साथ ले जाना भी तो सम्भव नहीं था । मिसराइन परोपकार समेत मिश्रा जी को घर के बाहर का रास्ता नपवा देतीं। समय भी पंख लगाकर उड़ता चला। पिछले तीन वर्षों से तो वे उसका संरक्षण करते रहे। लेकिन अब गुड़िया के प्रति उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी कि, इसी बीच एक अच्छी खबर ने दस्तक दी। खबर ये थी कि, मिश्रा जी का अगला तबादला ज्यादा दूर नहीं बल्कि, अगले जिले में ही था।जिसकी दूरी वहां से मुश्किल से ३० मील ही था। मिश्रा जी के खुशी का ठिकाना न था क्योंकि एक ट्रेन से आना अगली ट्रेन से जाना वे गुड़िया को अभी भी पूर्ण संरक्षण दे सकते थे। फिर भी कष्ट तो था ही। जिस दिन यहाँ से उनकी बिदायी थी उस दिन गुड़िया गुमसुम सी न कुछ खाया न पिया था। आज उसका दाँत भी नहीं दिख रहा था। शायद मिश्रा जी के जाने का एहसास था उसे।
जा चुकी ट्रेन को वो सर खुजाते घण्टों ताकती रही। क्या हुआ शायद उसे भी समझ नहीं आ रहा था। पूरे प्लेटफार्म पर इधर से उधर भटकती रही। पूरा दिन अपनी माँ को खोजते एक बच्चे की तरह वह आस लिए तकटकी लगाए रही। मिश्रा जी के सहेजने पर लोग उसे खाने को कुछ न कुछ दे देते थे। लेकिन पिछले दो दिन से उसने कुछ नहीं खाया सब वहीं पेड़ के नीचे रख कर बार- बार पटरी को दूर तलक झाँकती। थक कर फिर अपनी फटीचर गुड़िया के साथ आसरे में आकर सो जाती। दो दिन बाद मिश्रा जी का किसी कार्यवश स्टेशन आना हुआ।
उनके आने के पूर्व ही बिना किसी जानकारी के गुड़िया जोर से उछल- उछल कर ताली बजाती ठहाके लगा कर कर हँसने लगी।उसकी इस हरकत से सभी के मुख से यही निकलता- “पगलिया तो पगलिया ही है जाने कब रोए, जाने कब सोए, जाने कब हँसे……” कहते हुए बिना मुस्कुराए कोई न रहता। सबकी मुस्कुराहट आश्चर्य में तब तब्दील हो गयी जब सामने मिश्रा जी दिखे। तब सबको देर न लगी पगलिया की भवनाओं को समझते हुए।
ये कहना गलत न होगा कि, हर सप्ताहांत कोई न कोई बहाना करके मिश्रा जी आ जाते थे अपनी गुड़िया को मिलने और अपनी सामर्थ्य अनुसार उसके हित की वस्तुएँ भी लाकर उसके निवास में जमा कर देते। ऐसा करके मिश्रा जी को बड़ी सुखद अनुभूति हुआ करती थी।लगता था किसी जनम का छूटा हुआ रिश्ता मिल गया हो। लेकिन भलाई का जमाना और भले लोगों से तो दुनियां भी रिक्त है। किसी ने मिसराइन को के कान भर दिए कि, मिश्रा जी हर सप्ताहांत उस पगलिया को मिलने और उसके लिए खूब सारा सामान भी ले जाते। हैं। अब तो मिसराइन राशन पानी संग कर दीं मिश्रा जी पर चढ़ाई। अब मिश्रा जी केवल जरूरी काम के लिए ही पुराने स्टेशन जा पाते थे। लेकिन टेलीफोन द्वारा गुड़िया का हाल समाचार बराबर लेते रहते। यूँ ही समय गुजरता रहा। सभी लोग अपने – अपने खाते का लिखा जीवन व्यतीत करते रहे।
लेकिन गुड़िया अब पहले से चुपचाप रहने लगी थी। फिर से वही मैले- कुचैले कपड़ो में लिपटी पुरानी गुड़िया बन गयी थी।स्टेशन पर दिन भर बैठी रहती, तमाम यात्रियों की आवाजाही होती रहती। उनमें से कोई कुछ खाने पीने या फिर अन्य वस्तुएँ देता तब भी न लेती। केवल कर्मचारियों का उसमें भी विशेषतयः सुशीला का दिया खा पी लेती। और चुपमारकर मिश्रा जी द्वारा बनवाए गए तिरपाल के आसरे में जाकर सो जाती। एक दिन रात्रि गुड़िया की चीखती और दर्द भरी कराह सबने सुनी लेकिन कोई भी जाकर देखना उचित नहीं समझ कि, उसे हुआ क्या है? सुबह जब सुशीला आयी तो उसने रोजाना की भाँति सामने गुड़िया को न पाकर उसके आसरे में देखने गयी। बेतहाशा, निढाल पड़ी गुड़िया बदन पर वस्त्र के नाम पर हैवानियत और क्रूरता थी। किसी भी संवेदनशील प्राणी की आत्मा चीत्कार उठती उसकी दशा देखकर लेकिन उस कुकर्मी का पाषाण हृदय न पसीजा। सुशीला ने उसे सम्भालना चाहा लेकिन पहले से ही अपनी सुधि बुधी न रखने वाली गुड़िया अब अपने आसरे में ही सिमट कर रह गयी। मिश्रा जी को देखकर जो भी उसके स्वर फूटते थे अब बस वो हर रात्रि चीखों में तब्दील हो गयी थी। विडंबना तो ये थी कि, किसी को भी कोई परवाह नहीं थी उन चीखों की। होती भी क्यों भला कौन सी वो समझदार या किसी की रिश्तेदार थी। मात्र एक असहाय लड़की ही तो थी। जिसे शायद अपनी पीड़ा का कारण भी ज्ञात नहीं था। के आखिर उसकी चीख निकल ही क्यों रही है। फिर भला कोई और कैसे उसे समझता या रोकता-टोकता………..दुःखद, बेहद दुःखद…….. इधर मिश्रा जी जब भी स्टेशन पर टेलीफोन करते तो पता चलता सब ठीक है। फिर भी वे अपनी बढ़ती चिंता के कारण खुद ही उसे देखने आए गए। उसकी दशा देख स्टेशन कर्मचारियों पर बिफर पड़े। पुनः ड्यूटी पर सजग श्रीवास्तव जी से उनकी खासी बहस हो गयी।
कर्मचारियों का भी कहना था कि, यदि उन्हें इसकी इतनी ही चिंता है तो ले जावें अपने साथ।
लेकिन सत्य तो यही था कि वे चाहकर भी उसे नहीं ले जा सकते थे। मिसराइन उनकी दानवीरता के नाम पहले ही बहुत कुछ अभद्रता कर चुकी थीं। पुनः मिश्रा जी द्रवित हृदय धड़ पड़े- “अरे इतनी तो मानवता रख लेते आपलोग कि, कम से कम किसी की करुण पुकार पर तो पसीज जाते।” ” मिश्रा जी ये आपका घर नहीं स्टेशन है अच्छे बुरे हजारों लोगों को आना जाना रहता है किस किसको हम जाँचते रहें।” श्रीवास्तव जी ने अकड़ते हुए कहा। ” जांचना अलग बात है महोदय, लेकिन किसी अबोध को सरंक्षण कैसे किया जा सकता है यहां उपस्थित तकरीबन सभी ज्ञानियों को पता है। बाकी अब आप लोगो से क्या ही उम्मीद की जा सकती है।” मिश्रा जी की आवाज कान में पड़ते ही गुड़िया आज इतने दिनों बाद बाहर दिखी। मिश्रा जी को देखते ही वो बिफर कर रो पड़ी। मिश्रा जी की नम आँखों से उसके सर पर हाथ फेरते हैं। लेकिन इस बार गुड़िया बहुत कमजोर लेकिन शरीर से तन्दरुस्त लग रही थी। मिश्रा जी भी आयु का तकाजा मान नजरअंदाज कर गए। और सुशीला को बुलवाकर कुछ दिन उसकी देखभाल करने का आग्रह करते हैं। साथ अगली बार कुछ प्रबन्ध करके उसे साथ ले जाने की भी बात करते हैं। ये कहकर कि, कुछ नहीं तो यहाँ की भाँति उस स्टेशन पर तो इसकी व्यवस्था कर ही लेंगे। कम से कम मेरी नियुक्ति वाले स्टेशन पर तो ये सुरक्षित रहेगी।
मिश्रा जी के जाते ही गुड़िया अपने आसरे में चली गयी और फिर वही चुप्पी। इधर सुशीला को भी गुड़िया में पर्याप्त तब्दीली नजर आने लगी। विशेष करके उसका पेट दिनों दिन बढ़ता जा रहा था। तनते वस्त्रों की सिलाई ने आखिर सब कुछ बयाँ कर ही दिया। सुशीला की पारखी नजर भी समझते देर न करी, अबोध पर हुए कुकर्म ने अपनी हैवानियत के अंश ने पावन, पवित्र गुड़िया का गर्भ, जिसमें पाप का भार पैर पसार चुका था।
इसकी खबर सुशीला ने जल्द से जल्द मिश्रा जी को पहुँचवा दी। मिश्रा जी सुनते ही गुड़िया को देखने आते हैं। ” हे प्रभू, तनिक भी दया न आयी तुम्हें इस बच्ची पर, जो खुद का बोझ नही। उठा पा रही वो किसी और को कैसे झेल पाएगी।”
सहृदय मिश्रा जी की आँखे भर आयीं। तभी सुशीला भी आ जाती है। ” सुशील क्या इसका कोई इलाज नहीं हो सकता?” मेरा कहने का मतलब है जैसे……?” ” समझ रहे हैं मिश्रा जी पर मेरे अनुभव से दिन अधिक चढ़ चुका है अब कौनो चारा नहीं।” ” ठीक है कोई बात नहीं, मैंने अभी वहाँ कोई प्रबन्ध नहीं किया है, कुछ अलग ही उलझनों में व्यस्त था। फिर वहाँ का परिवेश भी खासा समझ नही आया। फिर भी जल्द ही कुछ करके इसे ले जाता हूँ।” ” क्या मिश्रा जी इतनी मानवता तो हममें भी है। आपके साथ इतने वर्षों कार्य किया है तनिक आपकी अच्छाईयां तो हमें भी मिलनी स्वाभाविक ही हैं।
अभी वहां आप हर समय तो रहेंगे नहीं, फिर यहाँ तो मैं भी हूँ। इस समय तो किसी जनानी की इसको सख्त जरूरत है। सो अभी इसे यहीं रहने दीजिए। फिर बाद में ले जाइएगा।” “हाँ सही कह रही हो बहन, कृपा करके इसका खयाल रखना ईश्वर तुम्हारा सदैव कल्याण करेगा।” मिश्रा जी सुशीला को कुछ धनराशि देकर वापस चले जाते हैं। सुशीला मानव व स्त्री धर्म बखूबी निभा रही थी। एक सुबह जैसे ही वह स्टेशन पर आयी गुड़िया के चीखने का स्वर उसे विचलित कर गया। भाग कर देखा तो पाया कि, चारों तरफ रक्त कण बिखरे पड़े हैं। ऐसा लग रहा था मानो गुड़िया छटपटाहट में ऊपर से नीचे पूरा रक्त स्नान कर ली हो। बड़ी तरस आ रही थी उसको देख कर, सुशीला भी प्रभु को याद करती हुई-
“का प्रभु जी न दुआ, न दारू…..कैसी लीला रचते आपौ। जाने कहाँ की सहनशीलता दे दिए हो इस पगलेट को……..” तभी सुशीला ने देखा कि गुड़िया एक कोने में बैठकर कुछ देख देखकर डरी हुई दुबकी बैठी थी। सिसकियों के साथ रोती, चिल्लाती उँगली से कुछ संकेत कर रही थी- ” गुड़िया मम्मममग्ग गी…” जब सुशीला ने दूसरे कोने में देखा तो एक सुन्दर सा नवजात सुन्न सा पड़ा हुआ था। जिसे देखकर गुड़िया डर रही थी। ये कोई और नहीं बल्कि गुड़िया की ममता व ईश्वर प्रदत्त स्त्रियों की सबसे अनुपम भेंट थी। सुशीला ने उस नवजात को उठाया और गुड़िया के करीब ले आयी,गुड़िया उसे देख डर से भाग रही थी। ज्यों ही सुशीला ने उसका हाथ नवजात के ऊपर रखा सुन्न हुआ नवजात जोर जोर से रोने लगा।
गुड़िया को भी उसे देख कर अच्छा लगा। उसने निर्छल ममता भीगे आँचल में नवजात को छुपा लिया। उस दिन से गुड़िया का एक अलग ही रूप सामने आया। ये कुदरत की अनमोल भेंट ही थी कि, जिसे स्वयं के अस्तित्व का भी एहसास नहीं वो अन्य अस्तिव को पाल पोस रही थी। सुशीला ने उसे मिश्रा जी के दिए रुपयों से उस बच्चे की आवश्यक वस्तुएँ भी लाकर दे दी। गुड़िया में न जाने इतनी समझ कैसे आ गयी वो बच्चे का इतना ध्यान रखने लगी थी कि, कोई सामान्य माँ भी न रख पाती। उसके पीछे उसने हँसना सीख लिया।
बच्चे की इतनी सुरक्षा व चिंता करती कि, उसके आसरे तक कोई जानवर या पक्षी भी फटक जाए तो छड़ी लेकर मारने के लिए दौड़ती थी। पूरा दिन बच्चे को सीने से लगाए रखती। अब तो उसे भी जीवन का एक उद्देश्य मिल गया था, जिसके सहारे ही सही खूबसूरत जीवन के रंग उसने भी देख लिए।

इस प्रकार पूरे एक महीने का समय व्यतीत हो गया। मिश्रा जी की अतिव्यस्तता अब तक यहाँ आने में बाधक बनी रही। फिर भी सुशीला से गुड़िया की कुशल समाचार पाकर आश्वस्त रहते।
एक दिन मिश्रा जी के पास सुशीला का टेलिफोन सन्देश आता है कि, गुड़िया की हालत ठीक नहीं है। वो सबको पत्थर फेंके कर मार रही है। किसी की बात भी नहीं सुन रही यहां तक कि सुशीला की भी। जिसके चलते यहाँ भी लोगों ने उसके साथ बदसलूकी की है। खबर मिलते ही मिश्रा जी गुड़िया को मिलने के लिए तैयार होने लगे। पहले से ही तमतमाई मिसराइन बरस पड़ी मिश्रा जी पर- ” अरे बौरा गए हो का मिश्रा जी। आखिर कौन सी हूर है वो पगलिया जिसका रूप सौंदर्य आपको दीवानों की भाँति खींचता रहता है।
मुखे पता नहीं क्या की आप वहाँ जाकर क्या…….. मिसराइन की बात पूरी भी न हुई कि, मिश्रा जी का हाथ उठ गया। लेकिन स्वयं को सहेजते हुए उन्होंने उसी हाथ को पास बैठी ग्यारह वर्षीय पुत्री के सर पर फेरते हुए बिना कुछ बोले घर से निकल गए। स्टेशन पहुँच कर देखा तो उनके द्वारा बनवाया गया गुड़िया का नन्हा आसरा उजाड़ दिया गया था। वो स्थान अब एकदम साफ सुथरा था। वहां कुछ भी नहीं था। आसपास कहीं भी गुड़िया का भी आता पता नहीं था। लोगो से पता चला कि वो यहाँ से कहीं और जा चुकी है।
क्योंकि, सभी को पत्थर फेंक कर मारती थी तो यात्रियों को भी खास दिक्कत होने लगी थी। जिसके चलते सबने मिलकर उसे वहाँ से भगा दिया था। साथ ही मिश्रा जी को बहु उलहनाएँ मिलती कि, उन्हीं की सर चढ़ाई पगलिया है। तभी सुशीला भी वहाँ आ गयी। उसके बाद तो बड़ी हृदयविदारक वास्तविकता सामने आयी। सुशीला ने बताया कि, उसका बच्चा महीने भर का हो गया था। अथाह स्नेह के साथ वो उसको लालन पालन कर रही थी। लेकिन बदकिस्मती की मार में यहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। कोई निर्दयी उसके बच्चे को ही चुरा ले गया। उस दिन से उसके करीब जो भी दिखता उसे वो पत्थर व डंडे से मारती थी। जिसके बदले में लोगों ने भी उसे निर्दयता पीट दिया था। यहाँ तक कि, पीछे पेड़ से बंधा तिरपाल भी खोलकर फेंक दिया और उसे यहाँ से भगा दिया। फिर भी वो रोज उसी जगह आकर अपने बच्चे को तरसती नरज ढूँढती रहती है। तभी लोगों के मध्य हल्ला सुनायी दिया, भगाओ,, भगाओ, आ गयी, मारो……. भीड़ को चीरकर मिश्रा जी ने उत्सुकता से देखा तो पाया वो गुड़िया ही थी। जिसे लोग भगा रहे थे। वो बेहद कमजोर हो चुकी थी। इतनी मैली कुचैली कि उसे पहचानना मुश्किल हो रहा था। उसने हाथ में ईंट का आधा टुकड़ा पकड़ा हुआ था। मिश्रा जी को देखते ही उसके हाथ से ईंट का टुकड़ा नीचे गिर गया। इतने दिनों का मर्म उसकी बेबस आँखों से छलक गया।वो वहीं धड़ाम से बैठ गयी। मिश्रा जी भागकर उसके पास पहुँचते हैं। एक पिता की भाँति उसे अपनी गोद में समा लेते हैं। गुड़िया पिता का आश्रय पाते ही फफक कर रोते हुए इतना ही बोली :- ” गुड़िया मम्ममग्गग गी” मिश्रा जी उसके सर पर हाथ फेरते हुए:-” शांत हो जा गुड़िया।”
वो सच में शांत हो गयी। आँखें भी शान्त और साँसे भी…….
मिश्रा जी के आंखों से टपटप आँसू उसके चेहरे पर गिरते जिसे, अपने हाथों से पोछते हुए – “आज सच में गुड़िया मर गयी और इंसानियत भी।” उन्होंने गुड़िया को अपनी गोद मे उठा लिया और भीड़ की तरफ देखते हुए।
” आखिर इतनी निर्दयता क्यों?जो पत्थर, डंडे गुड़िया को आप सबने उपहार स्वरूप दिए हैं। काश की वही उपहार उस कुकर्मी और धरती के सबसे बड़े पापी को, उस बच्चा चोर को दिए होते तो आज एक मासूम, हर जुल्म सहकर भी यूँ निर्दयता की बलि न चढ़ती……” मिश्रा जी का दर्द उनकी आँखों से बह चला, और सभी को सम्बोधित करते हुए- “जिस किसी को भी इंसानियत की अंत्येष्टि में शामिल होना है तो उसका स्वागत है।” कहकर गुड़िया को गोद में संभालते हुए उसकी अंत्येष्टि हेतु चल पड़े…………..
समाप्त
* अंकिता सिंह “रिनी”🙏

कुबेर ऐसे बन गए धन के देवता

अपने पूर्व जन्म में कुबेर देव गुणनिधि नाम के गरीब ब्राह्मण थे. बचपन में उन्होंने अपने पिता से धर्म शास्त्रों की शिक्षा ली, लेकिन धीरे-धीरे गलत संगत में आने से उन्हें जुआ खेलने और चोरी करने की लत लग गई. गुणनिधि की इन हरकतों से परेशान होकर पिता ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया. घर से निकाले जाने के बाद गुणनिधि की हालत दयनीय हो गई और वो लोगों के घर जा-जाकर भोजन मांगने लगे. एक दिन गुणनिधि भोजन की तलाश में गांव-गांव भटक रहे थे, लेकिन उस दिन उन्हें किसी ने भोजन नहीं दिया. जिसके बाद भूख और प्यास से परेशान गुणनिधि, भटकते-भटकते जंगल की ओर निकल पड़े. तभी उन्हें कुछ ब्राह्मण अपने साथ भोग की सामग्री लेकर जाते हुए दिखाई दिए. भोग की सामग्री को देख गुणनिधि की भूख बढ़ गई और खाने की लालच में वो ब्राह्मणों के पीछे-पीछे चल दिए. ब्राह्मणों का पीछा करते-करते गुणनिधि एक शिवालय आ पहुंचे. जहां उन्होंने देखा कि मंदिर में ब्राह्मण भगवान शिव की पूजा कर रहे थे.


और भगवान शिव को भोग अर्पित कर सभी ब्राह्मण भजन-कीर्तन में मग्न हो गए. गुणनिधि शिवालय में भोजन चुराने की ताक में बैठे हुए थे. उन्हें भोजन चुराने का मौका रात में तब मिला, जब भजन-कीर्तन समाप्त कर सभी ब्राह्मण सो गए. गुणनिधि दबे पांव भगवान शिव की प्रतिमा के पास पहुंचे और वहां से भोग के रुप में रखा प्रसाद चुराकर भागने लगे. लेकिन भागते समय एक ब्राह्मण ने उन्हें देख लिया और चोर-चोर चिल्लाने लगा. गुणनिधि जान बचाकर वहां से भाग निकले, लेकिन नगर के रक्षक का निशाना बन गए और वहीं उनकी मृत्यु हो गई. भोग चोरी करके भागते वक्त गुणनिधि की मौत हो गई लेकिन अंजाने में उनसे महाशिवरात्रि के व्रत का पालन हो गया तथा वो उस व्रत से प्राप्त होने वाले शुभ फल के हकदार बन गए. अंजाने में महाशिवरात्रि के व्रत का पालन हो जाने की वजह से गुणनिधि अपने अगले जन्म में कलिंग देश के राजा बने.

अपने इस जन्म में गुणनिधि भगवान शिव के परमभक्त हुए. वे सदैव भगवान शिव की भक्ति में खोए रहते थे. उनकी इस कठिन तपस्या और भक्ति को देखकर भगवान शिव उनपर प्रसन्न हुए. भगवान शिव ने वरदान देते हुए उन्हें यक्षों का स्वामी तथा देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया. कहते हैं भगवान शिव जिसपर प्रसन्न हो जाते हैं उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. यह भगवान शिव की ही एक माया थी जिससे गरीब ब्राह्मण गुणनिधि धन के देवता कुबरे कहलाए, और संसार में पूजनीय हुए.

सिंदबाद जहाजी की पहली यात्रा

सिंदबाद ने कहा कि मैंने अच्छी-खासी पैतृक संपत्ति पाई थी किंतु मैंने नौजवानी की मूर्खताओं के वश में पड़कर उसे भोग-विलास में उड़ा डाला। मेरे पिता जब जीवित थे तो कहते थे कि निर्धनता की अपेक्षा मृत्यु श्रेयस्कर है। सभी बुद्धिमानों ने ऐसा कहा है। मैं इस बात को बार-बार सोचता और मन ही मन अपनी दुर्दशा पर रोता। अंत में जब निर्धनता मेरी सहन शक्ति के बाहर हो गई तो मैंने अपना बचा-खुचा सामान बेच डाला और जो पैसा मिला उसे लेकर समुद्री व्यापारियों के पास गया और कहा कि अब मैं भी व्यापार के लिए निकलना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे व्यापार के बारे में बड़ी अच्छी सलाह दी। उसके अनुसार मैंने व्यापार की वस्तुएँ मोल लीं और उन्हें लेकर उनमें से एक व्यापारी के जहाज पर किराया देकर सामान लादा और खुद सवार हो गया। जहाज अपनी व्यापार यात्रा पर चल पड़ा।

जहाज फारस की खाड़ी में से होकर फारस देश में पहुँचा जो अरब के बाईं ओर बसा है और हिंदुस्तान के पश्चिम की ओर। फारस की खाड़ी लंबाई में ढाई हजार मील और चौड़ाई में सत्तर मील थी। मुझे समुद्री यात्रा का अभ्यास नहीं था इसलिए कई दिनों तक मैं समुद्री बीमारी से ग्रस्त रहा। फिर अच्छा हो गया। रास्ते में हमें कई टापू मिले जहाँ हम लोगों ने माल खरीदा और बेचा। एक दिन हमारा जहाज पाल उड़ाए हुए जा रहा था। तभी हमारे सामने एक हरा-भरा सुंदर द्वीप दिखाई दिया। कप्तान ने जहाज के पाल उतरवा लिए और लंगर डाल दिए और कहा कि जिन लोगों का जी चाहे वे इस द्वीप की सैर कर आएँ। मैं और कई अन्य व्यापारी, जो जहाज पर बैठे-बैठे ऊब गए थे, खाने का सामान लेकर उस द्वीप पर नाव द्वारा चले गए। किंतु वह द्वीप उस समय हिलने लगा जब हमने खाना पकाने के लिए आग जलाई। यह देखकर व्यापारी चिल्लाने लगे कि भाग कर जहाज पर चलो, यह टापू नहीं, एक बड़ी मछली की पीठ है। सब लोग कूद-कूद कर जहाज की छोटी नाव पर बैठ गए। मैं अकुशलता के कारण ऐसा न कर सका। नाव जहाज की ओर चल पड़ी। इधर मछली ने, जो हमारे आग जलाने से जाग गई थी, पानी में गोता लगाया। मैं समुद्र में बहने लगा। मेरे हाथ में सिर्फ एक लकड़ी थी जिसे मैं जलाने के लिए लाया था। उसी के सहारे समुद्र में तैरने लगा। मैं जहाज तक पहुँच पाऊँ इससे पहले ही जहाज लंगर उठा कर चल दिया।

मैं पूरे एक दिन और एक रात उस अथाह जल में तैरता रहा। थकन ने मेरी सारी शक्ति हर ली और मैं तैरने के लिए हाथ-पाँव चलाने के योग्य भी न रहा। मैं डूबने ही वाला था कि एक बड़ी समुद्री लहर ने मुझे उछाल कर किनारे पर फेंक दिया। किंतु किनारा समतल नहीं था। बल्कि खड़े ढलवान का था। मैं किसी प्रकार मरता-गिरता वृक्षों की जड़ें पकड़ता हुआ ऊपर पहुँचा और मुर्दे की भाँति जमीन पर गिर रहा।

जब सूर्योदय हुआ तो मेरा भूख से बुरा हाल हो गया। पैरों से चलने की शक्ति नहीं थी इसलिए घुटनों के बल घिसटता हुआ चला। सौभाग्य से कुछ ही दूर पर मुझे मीठे पानी का एक सोता मिला जिसका पानी पीकर मुझमें जान आई। मैंने तलाश करके कुछ मीठे फल और खाने लायक पत्तियाँ भी पा लीं और उनसे पेट भर लिया। फिर मैं द्वीप में इधर-उधर घूमने लगा। मैंने एक घोड़ी चरती देखी। बहुत सुंदर थी किंतु पास जाकर देखा तो पाया कि खूँटे से बँधी थी। फिर पृथ्वी के नीचे से मुझे कुछ मनुष्यों के बोलने की आवाज आई और कुछ देर में एक आदमी जमीन से निकल कर मेरे पास आकर पूछने लगा कि तुम कौन हो, क्या करने आए हो। मैं ने उसे अपना हाल बताया तो वह मुझे पकड़कर तहखाने में ले गया।

वहाँ कई मनुष्य और थे। उन्होंने मुझे खाने को दिया। मैंने उनसे पूछा कि तुम लोग इस निर्जन द्वीप में तहखाने में बैठे क्या कर रहे हो। उन्होंने बताया, हम लोग बादशाह के साईस हैं। इस द्वीप के स्वामी बादशाह वर्ष भर में एक बार यहाँ अपनी अच्छी घोड़ियाँ भेजते हैं ताकि उन्हें दरियाई घोड़ों से गाभिन कराया जाए। इस तरह जो बछेड़े पैदा होते हैं वे राजघराने के लोगों की सवारी के काम आते हैं। हम घोड़ियों को यहाँ बाँध देते हैं और छुपकर बैठ जाते हैं। दरियाई घोड़े की आदत होती है कि वह संभोग के बाद घोड़ी को मार डालता है। जब वह घोड़ा संभोग के बाद हमारी घोड़ी को मारना चाहता है तो हम लोग तहखाने से बाहर निकलकर चिल्लाते हुए उसकी ओर दौड़ते हैं। घोड़ा हमारा शब्द सुनकर भाग जाता है और समुद्र में डुबकी लगा लेता है। कल हम लोग अपनी राजधानी को वापस होंगे।

मैंने उनसे कहा कि मैं भी तुम लोगों के साथ चलूँगा क्योंकि इस द्वीप से तो किसी तरह खुद अपने देश को जा नहीं सकता। हम लोग बातचीत कर ही रहे थे कि दरियाई घोड़ा समुद्र से निकला और घोड़ी से संभोग करके वह उसे मार ही डालना चाहता था कि साईस लोग चिल्लाते हुए दौड़े और घोड़ा भाग कर समुद्र में जा छुपा। दूसरे दिन वे सारी घोड़ियों को इकट्ठा करके राजधानी में आए। मैं भी उनके साथ चला गया। उन्होंने मुझे अपने बादशाह के सामने पेश किया। उसके पूछने पर मैंने अपना सारा हाल कहा। उसे मुझ पर बड़ी दया आई। उसने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि इस आदमी को आराम से रखो। अतएव मैं सुख- सुविधापूर्वक रहने लगा।

मैं वहाँ व्यापारियों और बाहर से आने वाले लोगों से मिलता रहता था ताकि कोई ऐसा मनुष्य मिले जिसकी सहायता से मैं बगदाद पहुँचूँ। वह नगर काफी बड़ा और सुंदर था और प्रतिदिन कई देशों के जहाज उसके बंदरगाह पर लंगर डालते थे। हिंदुस्तान तथा अन्य कई देशों के लोग मुझसे मिलते रहते और मेरे देश की रीति-रस्मों के बारे में पूछते रहते और मैं उन से उनके देश की बातें पूछता।

बादशाह के राज्य में एक सील नाम का द्वीप था। उसके बारे में सुना था कि वहाँ से रात-दिन ढोल बजने की ध्वनि आया करती है। जहाजियों ने मुझे यह भी बताया कि वहाँ के मुसलमानों का विश्वास है कि सृष्टि के अंतकाल में एक अधार्मिक और झूठा आदमी पैदा होगा जो यह दावा करेगा कि मैं ही ईश्वर हूँ। वह काना होगा और गधा उसकी सवारी होगी। मैं एक बार वह द्वीप देखने भी गया। रास्ते में समुद्र में मैंने विशालकाय मछलियाँ देखीं। वे सौ-सौ हाथ लंबी थीं बल्कि उनमें से कुछ तो दो-दो सौ हाथ लंबी थीं। उन्हें देखकर डर लगता था। किंतु वे स्वयं इतनी डरपोक थीं कि तख्ते पर आवाज करने से ही भाग जाती थीं। एक और तरह की मछली भी मैंने देखी। उसकी लंबाई एक हाथ से अधिक न थी किंतु उसका मुँह उल्लू का-सा था। मैं इसी प्रकार बहुत समय तक सैर-सपाटा करता रहा।

एक दिन मैं उस नगर के बंदरगाह पर खड़ा था। वहाँ एक जहाज ने लंगर डाला और उसमें कई व्यापारी व्यापार वस्तुओं की गठरियाँ लेकर उतरे। गठरियाँ जहाज के ऊपरी तख्ते पर जमा थीं और तट से साफ दिखाई देती थीं। अचानक एक गठरी पर मेरी नजर पड़ी जिस पर मेरा नाम लिखा था। मैं पहचान गया कि यह वही गठरी है जिसे मैंने बसरा में जहाज पर लादा था। मैं जहाज के कप्तान के पास गया। उसने समझ लिया था कि मैं डूब चुका हूँ। वैसे भी इतने दिनों की मुसीबतों और चिंता के कारण मेरी सूरत बदल गई थी इसलिए वह मुझे पहचान न सका।

मैं ने उससे पूछा कि यह लावारिस-सी लगने वाली गठरी कैसी है। उसने कहा, हमारे जहाज पर बगदाद का एक व्यापारी सिंदबाद था। हम एक रोज समुद्र के बीच में थे कि एक छोटा-सा टापू दिखाई दिया और कुछ व्यापारी उस पर उतर गए। वास्तव में वह टापू न था बल्कि एक बहुत बड़ी मछली की पीठ थी जो सागर तल पर आकर सो गई थी। जब व्यापारियों ने खाना बनाने के लिए उस पर आग जलाई तो पहले तो वह हिली फिर समुद्र में गोता लगा गई। सारे व्यापारी नाव पर या तैरकर जहाज पर आ गए किंतु बेचारा सिंदबाद वहीं डूब गया। ये गठरियाँ उसकी ही हैं। अब मैंने इरादा किया है इस गठरी का माल बेच दूँ और इसका जो दाम मिले उसे बगदाद में सिंदबाद के परिवार वालों के पास पहुँचा दूँ।

मैंने उससे कहा कि जिस सिंदबाद को तुम मरा समझ रहे हो वह मैं ही हूँ और यह गठरी तथा इसके साथ की गठरियाँ मेरी ही हैं। उसने कहा, ‘अच्छे रहे, मेरे आदमी का माल हथियाने के लिए खुद सिंदबाद बन गए। वैसे तो शक्ल-सूरत से भोले लगते हो मगर यह क्या सूझी है कि इतना बड़ा छल करने को तैयार हो गए। मैंने स्वयं सिंदबाद को डूबते देखा है। इसके अतिरिक्त कई व्यापारी भी साक्षी हैं कि वह डूब गया है। मैं तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास करूँ।

मैंने कहा, भाई कुछ सोच-समझ कर बात करो। तुमने मेरा हाल तो सुना ही नहीं और मुझे झूठा बना दिया। उसने कहा, अच्छा बताओ अपना हाल। मैंने सारा हाल बताया कि किस प्रकार लकड़ी के सहारे तैरता रहा और चौबीस घंटे समुद्र में तैरने के बाद निर्जन द्वीप में पहुँचा और किस तरह से बादशाह के साईसों ने मुझे वहाँ से लाकर बादशाह के सामने पेश किया।

कप्तान को पहले तो मेरी कहानी पर विश्वास न हुआ। फिर उसने ध्यानपूर्वक मुझे देखा और अन्य व्यापारियों को भी मुझे दिखाया। सभी ने कुछ देर में मुझे पहचान लिया और कहा कि वास्तव में यह सिंदबाद ही है। सब लोग मुझ नया जीवन पाने पर बधाई और भगवान को धन्यवाद देने लगे।

कप्तान ने मुझे गले लगाकर कहा, ईश्वर की बड़ी दया है कि तुम बच गए। अब तुम अपना माल सँभालो और इसे जिस प्रकार चाहो बेचो। मैंने कप्तान की ईमानदारी की बड़ी प्रशंसा की और कहा कि मेरे माल में से थोड़ा-सा तुम भी ले लो। किंतु उसने कुछ भी नहीं लिया, सारा माल मुझे दे दिया।

मैं ने अपने सामान में से कुछ सुंदर और बहुमूल्य वस्तुएँ बादशाह को भेंट कीं। उसने पूछा, तुझे यह मूल्यवान वस्तुएँ कहाँ से मिलीं? मैंने उसे पूरा हाल सुनाया। वह यह सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने मेरी भेंट सहर्ष स्वीकार कर ली और उसके बदले में उनसे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तुएँ मुझे दे दीं। मैं उससे विदा होकर फिर जहाज पर आया और अपना माल बेचकर उस देश की पैदावार यथा चंदन, आबनूस, कपूर, जायफल, लौंग, काली मिर्च आदि ली और फिर जहाज पर सवार हो गया। कई देशों और टापुओं से होता हुआ हमारा जहाज बसरा के बंदरगाह पर पहुँचा। वहाँ से स्थल मार्ग से बगदाद आया। इस व्यापार में मुझे एक लाख दीनार का लाभ हुआ। मैं अपने परिवार वालों और बंधु-बांधवों से मिलकर बड़ा प्रसन्न हुआ। मैं ने एक विशाल भवन बनवाया और कई दास और दासियाँ खरीदीं और आनंद से रहने लगा। कुछ ही दिनों में मैं अपनी यात्रा के कष्टों को भूल गया।

सिंदबाद ने अपनी कहानी पूरी करके गाने-बजाने वालों से, जो उसके यात्रा वर्णन के समय चुप हो गए थे, दुबारा गाना-बजाना शुरू करने को कहा। इन्हीं बातों में रात हो गई। सिंदबाद ने चार सौ दीनारों की एक थैली मँगाकर हिंदबाद को दी और कहा कि अब तुम अपने घर जाओ, कल फिर इसी समय आना तो मैं तुम्हें अपनी यात्राओं की और कहानियाँ सुनाऊँगा। हिंदबाद ने इतना धन पहले कभी देखा न था। उसने सिंदबाद को बहुत धन्यवाद दिया। उसके आदेश के अनुसार हिंदबाद दूसरे अच्छे और नए वस्त्र पहन कर उसके घर आया। सिंदबाद उसे देखकर प्रसन्न हुआ और उसने मुस्कराकर हिंदबाद से उसकी कुशल-क्षेम पूछी।

कुछ देर में सिंदबाद के अन्य मित्र भी आ गए और नित्य के नियम के अनुसार स्वादिष्ट व्यंजन सामने लाए गए। जब सब लोग खा-पीकर तृप्त हो चुके तो सिंदबाद ने कहा, दोस्तो, अब मैं तुम लोगों को अपनी दूसरी सागर यात्रा की कहानी सुनाता हूँ, यह पहली यात्रा से कम विचित्र नहीं है। सब लोग ध्यान से सुनने लगे और सिंदबाद ने कहना शुरू किया।

सर्प और कौवे

एक जंगल में एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर घोंसला बनाकर एक कौआ-कव्वी का जोड़ा रहता था। उसी पेड़ के खोखले तने में कहीं से आकर एक दुष्ट सर्प रहने लगा। हर वर्ष मौसम आने पर कव्वी घोंसले में अंडे देती और दुष्ट सर्प मौक़ा पाकर उनके घोंसले में जाकर अंडे खा जाता।
एक बार जब कौआ व कव्वी जल्दी भोजन पाकर शीघ्र ही लौट आए तो उन्होंने उस दुष्ट सर्प को अपने घोंसले में रखे अंडों पर झपटते देखा। अंडे खाकर सर्प चला गया कौए ने कव्वी को ढाडस बंधाया ‘प्रिये, हिम्मत रखो। अब हमें शत्रु का पता चल गया हैं। कुछ उपाय भी सोच लेंगे।’
कौए ने काफ़ी सोचा विचारा और पहले वाले घोंसले को छोड़ उससे काफ़ी ऊपर टहनी पर घोंसला बनाया और कव्वी से कहा ‘यहां हमारे अंडे सुरक्षित रहेंगे। हमारा घोंसला पेड़ की चोटी के किनारे निकट हैं और ऊपर आसमान में चील मंडराती रहती हैं। चील सांप की बैरी हैं। दुष्ट सर्प यहां तक आने का साहस नहीं कर पाएगा।’
कौवे की बात मानकर कौव्वी ने नए घोंसले में अंडे दिए जिसमे अंडे सुरक्षित रहे और उनमें से बच्चे भी निकल आए। उधर सर्प उनका घोंसला ख़ाली देखकर यह समझा कि उसके डर से कौआ कव्वी शायद वहां से चले गए हैं पर दुष्ट सर्प टोह लेता रहता था। उसने देखा कि कौआ-कव्वी उसी पेड़ से उड़ते हैं और लौटते भी वहीं हैं। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उन्होंने नया घोंसला उसी पेड़ पर ऊपर बना रखा हैं।
एक दिन सर्प खोह से निकला और उसने कौओं का नया घोंसला खोज लिया। घोंसले में कौआ दंपती के तीन नवजात शिशु थे। दुष्ट सर्प उन्हें एक-एक करके घपाघप निगल गया और अपने खोह में लौटकर डकारें लेने लगा। कौआ व कव्वी लौटे तो घोंसला ख़ाली पाकर सन्न रह गए। घोंसले में हुई टूट-फूट व नन्हें कौओं के कोमल पंख बिखरे देखकर वह सारा माजरा समझ गए। कव्वी की छाती तो दुख से फटने लगी। कव्वी बिलख उठी ‘तो क्या हर वर्ष मेरे बच्चे सांप का भोजन बनते रहेंगे?’
कौआ बोला ‘नहीं! यह माना कि हमारे सामने विकट समस्या हैं पर यहां से भागना ही उसका हल नहीं हैं। विपत्ति के समय ही मित्र काम आते हैं। हमें लोमड़ी मित्र से सलाह लेनी चाहिए।’
दोनों तुरंत ही लोमड़ी के पास गए। लोमड़ी ने अपने मित्रों की दुख भरी कहानी सुनी। उसने कौआ तथा कव्वी के आंसू पोंछे। लोमड़ी ने काफ़ी सोचने के बाद कहा ‘मित्रो! तुम्हें वह पेड़ छोड़कर जाने की जरुरत नहीं हैं। मेरे दिमाग में एक तरकीब हैं, जिससे उस दुष्टसर्प से छुटकारा पाया जा सकता हैं।’ लोमड़ी ने अपने चतुर दिमाग में आई तरकीब बताई। लोमड़ी की तरकीब सुनकर कौआ-कव्वी खुशी से उछल पड़ें। उन्होंने लोमड़ी को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट आएं।
अगले ही दिन योजना अमल में लानी थी। उसी वन में बहुत बड़ा सरोवर था। उसमें कमल और नरगिस के फूल खिले रहते थे। हर मंगलवार को उस प्रदेश की राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ वहां जल-क्रीड़ा करने आती थी। उनके साथ अंगरक्षक तथा सैनिक भी आते थे।
इस बार राजकुमारी आई और सरोवर में स्नान करने जल में उतरी तो योजना के अनुसार कौआ उड़ता हुआ वहां आया। उसने सरोवर तट पर राजकुमारी तथा उसकी सहेलियों द्वारा उतारकर रखे गए कपड़ों व आभूषणों पर नजर डाली। कपड़े के ऊपर राजकुमारी का प्रिय हीरे व मोतियों का विलक्षण हार रखा था कौव्वी ने राजकुमारी तथा सहेलियों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए ‘कांव-कांव’ का शोर मचाया।
जब सबकी नजर उसकी ओर घूमी तो कौआ राजकुमारी का हार चोंच में दबाकर ऊपर उड़ गया। सभी सहेलियां चीखी ‘देखो, देखो! वह राजकुमारी का हार उठाकर ले जा रहा हैं।’ सैनिकों ने ऊपर देखा तो सचमुच एक कौआ हार लेकर धीरे-धीरे उड़ता जा रहा था। सैनिक उसी दिशा में दौड़ने लगे। कौआ सैनिकों को अपने पीछे लगाकर धीरे-धीरे उड़ता हुआ उसी पेड़ की ओर ले आया।
जब सैनिक कुछ ही दूर रह गए तो कौए ने राजकुमारी का हार इस प्रकार गिराया कि वह सांप वाले खोह के भीतर जा गिरा। सैनिक दौड़कर खोह के पास पहुंचे। उनके सरदार ने खोह के भीतर झांका। उसने वहां हार और उसके पास में ही एक काले सर्प को कुडंली मारे देखा।
वह चिल्लाया ‘पीछे हटो! अंदर एक नाग हैं।’ सरदार ने खोह के भीतर भाला मारा। सर्प घायल हुआ और फुफकारता हुआ बाहर निकला। जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने भालों से उसके टुकडे-टुकडे कर डाले।
सीख : सूझ बूझ का उपयोग कर हम बड़ी से बड़ी ताकत और दुश्मन को हरा सकते हैं, बुद्धि का प्रयोग करके हर संकट का हल निकाला जा सकता है।

पतन और उदय

वर्धमान नामक शहर में एक बहुत ही कुशल व्यापारी दंतिल रहता था। राजा को उसकी क्षमताओं के बारे में पता था जिसके चलते राजा ने उसे राज्य का प्रशासक बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी दंतिल ने राजा और आम आदमी को बहुत खुश रखा। कुछ समय के बाद व्यापारी दंतिल ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस उपलक्ष्य में उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। राजघराने का एक सेवक, जो महल में झाड़ू लगाता था, वह भी इस भोज में शामिल हुआ। मगर गलती से वह एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो केवल राज परिवार के लिए रखी हुयी थी। सेवक को उस कुर्सी पर बैठा देखकर व्यापारी दंतिल को गुस्सा आ जाता है और वह सेवक को दुत्कार कर वह वहाँ से भगा देता है। सेवक को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है और वह व्यापारी दंतिल को सबक सिखाने का प्रण लेता है।
अगले ही दिन सेवक राजा के कक्ष में झाड़ू लगा रहा होता है। वह राजा को अर्धनिद्रा में देख कर बड़बड़ाना शुरू करता है। वह बोलता है, “इस व्यापारी दंतिल की इतनी मजाल की वह रानी के साथ दुर्व्यवहार करे। ” यह सुन कर राजा की नींद खुल जाती है और वह सेवक से पूछता है, “क्या यह वाकई में सच है? क्या तुमने व्यापारी दंतिल को दुर्व्यवहार करते देखा है?” सेवक तुरंत राजा के चरण पकड़ता है और बोलता है, “मुझे माफ़ कर दीजिये, मैं कल रात को सो नहीं पाया। मेरी नींद पूरी नहीं होने के कारण कुछ भी बड़बड़ा रहा था।” यह सुनकर राजा सेवक को कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके मन में शक पैदा हो जाता है।
उसी दिन से राजा व्यापारी दंतिल के महल में निरंकुश घूमने पर पाबंदी लगा देता है और उसके अधिकार कम कर देता है। अगले दिन जब व्यापारी दंतिल महल में आता है तो उसे संतरिया रोक देते हैं। यह देख कर व्यापारी दंतिल बहुत आश्चर्य -चकित होता है। तभी वहीँ पर खड़ा हुआ सेवक मज़े लेते हुए बोलता है, “अरे संतरियों, जानते नहीं ये कौन हैं? ये बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो तुम्हें बाहर भी फिंकवा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसा इन्होने मेरे साथ अपने भोज में किया था। तनिक सावधान रहना।”
यह सुनते ही व्यापारी दंतिल को सारा माजरा समझ में आ जाता है। वह सेवक से माफ़ी मांगता है और सेवक को अपने घर खाने पर बुलाता है। व्यापारी दंतिल सेवक की खूब आव-भगत करता है। फिर वह बड़ी विनम्रता से भोज वाले दिन किये गए अपमान के लिए क्षमा मांगता है और बोलता है की उसने जो भी किया, गलत किया। सेवक बहुत खुश होता है और व्यापारी दंतिल से बोलता है, “आप चिंता ना करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान आपको ज़रूर वापस दिलाउंगा।”
अगले दिन राजा के कक्ष में झाड़ू लगाते हुआ सेवक फिर से बड़बड़ाने लगता है, “हे भगवान, हमारा राजा तो इतना मूर्ख है कि वह गुसलखाने में खीरे खाता है।” यह सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है और बोलता है, “मूर्ख, तुम्हारी ये हिम्मत? तुम अगर मेरे कक्ष के सेवक ना होते, तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।” सेवक फिर राजा के चरणों में गिर जाता है और दुबारा कभी ना बड़बड़ाने की कसम खाता है।
राजा भी सोचता है कि जब यह मेरे बारे में इतनी गलत बातें बोल सकता है तो इसने व्यापारी दंतिल के बारे में भी गलत बोला होगा। राजा सोचता है की उसने बेकार में व्यापारी दंतिल को दंड दिया। अगले ही दिन राजा व्यापारी दंतिल को महल में उसकी खोयी प्रतिष्ठा वापस दिला देता है।

(सीख: व्यक्ति बड़ा हो या छोटा, हमें हर किसी के साथ समान भाव से ही पेश आना चाहिए।)
…………….
दमनक से यह कथा सुनकर संजीवक ने कहा, “ठीक है। तुम जो कहते हो, वही करूँगा।”

तब दमनक उसे साथ लेकर पिंगलक के पास आया। बोला, ”महाराज, मैं संजीवक को ले आया हूँ।”

संजीवक ने भी पिंगलक को नमस्कार किया और पास ही बैठ गया।

पिंगलक ने संजीवक बैल के ऊपर अपना दाहिना हाथ रखते हुए पूछा, ”आप इस वन में कहाँ से आए हैं? यहाँ कुशल से तो रहते हैं?”

संजीवक ने अपनी सारी कथा उसको सुना दी।

पिंगलक ने उसकी कथा सुनकर उससे कहा कि तुम निडर होकर मेरे द्वारा सुरक्षित इस वन में विचरण करो। इसके बाद पिंगलक ने अपने जंगल का राजकाज नए मंत्रियों करटक और दमनक को सौंप दिया और खुद संजीवक के साथ आनंद से रहने लगा।

संजीवक ने कुछ दिनों में ही अपनी बुद्धि के प्रभाव से जंगली पिंगलक की हिंसक आदतें छुड़ाकर उसे ग्राम्य धर्म में लगा दिया। पिंगलक भी उसकी बातों में रुचि लेने लगा। उसकी हिंसा की वृत्ति समाप्त हो गई। वह अब हरिणों और दूसरे जानवरों को अपने नजदीक नहीं आने देता था। करटक और दमनक को भी दूर- ही-दूर रखता था।

परिणाम यह हुआ कि सिंह के शिकार से बचे हुए भोजन से ही पेट भरनेवाले छोटे-छोटे जानवर भूख से व्याकुल हो गए। करटक, दमनक और दूसरे जानवर इस स्थिति पर चिंता करने लगे। वे सोचने लगे कि जब भगवान्‌ शंकर के गले में लिपटा हुआ साँप, गणेशजी के वाहन चूहे को निगल जाना चाहता है, जब कार्तिकेय का वाहन मोर शंकरजी के साँप को खाना चाहता है, जब साँप को मारकर खानेवाले मोर को भी पार्वती का वाहन सिंह खाने की इच्छा रखता है, तब यह अहिंसा का नाटक क्यों?

दमनक ने करटक से कहा, ‘अरे भई, अब तो पिंगलक और संजीवक में ऐसी प्रगाढ़ मित्रता हो गई है कि पिंगलक हम लोगों से विमुख ही हो गया। हमारे कितने ही साथी भी भाग गए। हमें राजा को समझाना चाहिए। मंत्री का धर्म है कि वह ठीक समय पर राजा को समझाए।”

करटक ने कहा, “तुमने ही तो यह आग लगाई है। तुम्हीं ने इस घास चरनेवाले जानवर को हमारे स्वामी का मित्र बनाया है।”

दमनक बोला, ”यह सच है। दोष तो मेरा ही है, पिंगलक का नहीं। किंतु मैंने जैसे उनकी मित्रता कराई थी, वैसे ही अब उनकी मित्रता को भंग भी करा दूँगा।”

करटक ने कहा, “लेकिन संजीवक बैल होने पर भी बड़ा बुद्धिमान प्राणी है। उधर सिंह पिंगलक भी भयानक है। यह ठीक है कि तुम्हारी बुद्धि तेज है, फिर भी तुम इन दोनों को अब अलग करने में कैसे समर्थ हो पाओगे?’

दमनक ने कहा, “भाई! असमर्थ होते हुए भी मैं समर्थ हूँ। जो काम पराक्रम से पूरा नहीं हो पाता उसे भी चतुर व्यक्ति युक्ति से पूरा कर सकते हैं। जैसे कौए ने सोने के सूत्र के सहारे विषधर काले साँप का अंत कर दिया था!”

सियार और ढोल

एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा। सेनाएं अपने नगरों को लौट गईं। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भाट व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे।
युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई। आंधी के जोर में वह ढोल लुढ़कता-पुढ़कता एक सूखे पेड़ के पास जाकर टिक गया। उस पेड़ की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थीं कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थीं और ढमाढम-ढमाढम की गुंजायमान आवाज होती।
एक सियार उस क्षेत्र में घूमता था। उसने ढोल की आवाज सुनी। वह बड़ा भयभीत हुआ। ऐसी अजीब आवाज बोलते पहले उसने किसी जानवर को नहीं सुना था। वह सोचने लगा कि यह कैसा जानवर है, जो ऐसी जोरदार बोली बोलता है ‘ढमाढम’। सियार छिपकर ढोल को देखता रहता, यह जानने के लिए कि यह जीव उड़ने वाला है या चार टांगों पर दौड़ने वाला।
एक दिन सियार झाड़ी के पीछे छुपकर ढोल पर नजर रखे था। तभी पेड़ से नीचे उतरती हुई एक गिलहरी कूदकर ढोल पर उतरी। हलकी-सी ढम की आवाज भी हुई। गिलहरी ढोल पर बैठी दाना कुतरती रही।
सियार बड़बड़ाया, ‘ओह! तो यह कोई हिंसक जीव नहीं है। मुझे भी डरना नहीं चाहिए।’
सियार फूंक-फूंककर कदम रखता ढोल के निकट गया। उसे सूंघा। ढोल का उसे न कहीं सिर नजर आया और न पैर। तभी हवा के झोंके से टहनियां ढोल से टकराईं। ढम की आवाज हुई और सियार उछलकर पीछे जा गिरा।
‘अब समझ आया’, सियार उठने की कोशिश करता हुआ बोला, ‘यह तो बाहर का खोल है। जीव इस खोल के अंदर है। आवाज बता रही है कि जो कोई जीव इस खोल के भीतर रहता है, वह मोटा-ताजा होना चाहिए। चर्बी से भरा शरीर। तभी ये ढम-ढम की जोरदार बोली बोलता है।’
अपनी मांद में घुसते ही सियार बोला, ‘ओ सियारी! दावत खाने के लिए तैयार हो जा। एक मोटे-ताजे शिकार का पता लगाकर आया हूं।’
सियारी पूछने लगी, ‘तुम उसे मारकर क्यों नहीं लाए?’
सियार ने उसे झिड़की दी, ‘क्योंकि मैं तेरी तरह मूर्ख नहीं हूं। वह एक खोल के भीतर छिपा बैठा है। खोल ऐसा है कि उसमें दो तरफ सूखी चमड़ी के दरवाजे हैं। मैं एक तरफ से हाथ डाल उसे पकड़ने की कोशिश करता तो वह दूसरे दरवाजे से न भाग जाता?’
चांद निकलने पर दोनों ढोल की ओर गए। जब वे निकट पहुंच ही रहे थे कि फिर हवा से टहनियां ढोल पर टकराईं और ढम-ढम की आवाज निकली। सियार सियारी के कान में बोला, ‘सुनी उसकी आवाज? जरा सोच जिसकी आवाज ऐसी गहरी है, वह खुद कितना मोटा ताजा होगा।’
दोनों ढोल को सीधा कर उसके दोनों ओर बैठे और लगे दांतों से ढोल के दोनों चमड़ी वाले भाग के किनारे फाड़ने। जैसे ही चमड़ियां कटने लगी, सियार बोला, ‘होशियार रहना। एक साथ हाथ अंदर डाल शिकार को दबोचना है।’
दोनों ने ‘हूं’ की आवाज के साथ हाथ ढोल के भीतर डाले और अंदर टटोलने लगे। अंदर कुछ नहीं था। एक-दूसरे के हाथ ही पकड़ में आए।
दोनों चिल्लाए, ‘हैं ! यहां तो कुछ नहीं है।’ और वे माथा पीटकर रह गए।

सीख : बड़ी-बड़ी शेखी मारने वाले लोग भी ढोल की तरह ही अंदर से खोखले होते हैं।
……………………
यह कहानी सुनने के बाद पिंगलक ने कहा, “भाई, मैं क्या करूँ? जब मेरा पूरा परिवार और सभी साथी भयभीत होकर भागने पर तुले हैं तो अकेला मैं ही कैसे धैर्य से रह सकता हूँ?”

दमनक ने कहा, “इसमें आपके सेवकों का क्या दोष है! जैसा मालिक करेगा वैसा ही सेवक करेंगे। तो भी आप तब तक यहाँ ठहरिए जब तक मैं उस आवाज के विषय में ठीक-ठीक पता न लगा लूँ।”

पिंगलक ने आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम वास्तव में वहाँ जाने की सोच रहे हो?”

दमनक ने जवाब दिया, “स्वामी की आज्ञा से तो योग्य सेवक कोई भी काम कर सकता है, चाहे उसे साँप के मुँह में हाथ डालना पड़े या समुद्र ही पार करना पड़े। राजाओं को चाहिए कि ऐसे ही सेवक को सदा अपने निकट रखें।”

पिंगलक ने कहा, ”अगर ऐसी बात है तो जाओ, भद्र, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो।”

दमनक उसको प्रणाम करके आवाज की दिशा में चल पड़ा।

पिंगलक को पछतावा होने लगा कि मैंने बेकार ही दमनक की बातों में आकर उसे अपने मन का भेद बता दिया। उसका क्या विश्वास! पहले मंत्री का पद छिन जाने के कारण वह खिन्‍न तो है ही। बदला लेने के लिए यह भी तो हो सकता है कि दमनक लालच में आकर शत्रु से मिल जाए और बाद में घात लगाकर मुझको ही मरवा दे। खैर, अब तो एक ही रास्ता है कि कहीं दूसरी जगह छिपकर दमनक के आने की राह देखी जाए।

उधर दमनक खोजते-खोजते संजीवक के पास पहुँचा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जिसके डर से सिंह की जान निकल रही थी, वह तो यह मामूली-सा बैल है। दमनक इस स्थिति से लाभ उठाने की सोचने लगा–अब तो इस बैल से संधि या विग्रह, कुछ भी करके पिंगलक को सहज ही अपने वश में किया जा सकता है। यही सोचता-सोचता वह लौटकर पिंगलक के पास पहुँचा।

पिंगलक उसे आते देख सँभलकर बैठ गया। दमनक ने पिंगलक को प्रणाम किया।

पिंगलक ने पूछा, “तुमने उस भयंकर प्राणी को देखा क्या? ”

दमनक ने कहा, ” आपकी कृपा से मैं उसे देख आया हूँ।”

पिंगलक को आश्चर्य हुआ- ‘सच?’

पिंगलक ने अपनी झेंप मिटाने के लिए कहा, “तो फिर उस बलवान जंतु ने तुम्हें छोड़ कैसे दिया? शायद उसने इसीलिए तुमको छोड़ दिया होगा कि बलशाली लोग अपने समान बलवाले से ही बैर या मित्रता करते हैं। कहाँ वह महाबली और कहाँ तुम जैसा तुच्छ, विनम्र प्राणी!”

दमनक ने मन का क्षोभ छिपाकर कहा, “ऐसा ही सही। वह सचमुच महान्‌ है। बलशाली है और मैं एकदम क्षुद्र, दीन प्राणी हूँ। तो भी यदि आप कहें तो मैं उसे भी लाकर आपकी सेवा में लगा सकता हूँ।”

पिंगलक ने चकित होकर कहा, “सच कहते हो? ऐसा संभव है?”

दमनक बोला, “बुद्धि के लिए कुछ भी असंभव नहीं।”

तब पिंगलक ने कहा, “अगर ऐसी बात है तो मैं आज से ही तुमको अपना मंत्री नियुक्त करता हूँ। तुम्हें प्रजा पर दया और दंड के अधिकार देता हूँ।”

पद और अधिकार पाकर प्रसन्‍न दमनक बड़ी शान से चलता हुआ संजीवक के पास पहुँचा और गुर्राकर बोला, “ओरे दुष्ट बैल, इधर आ। मेरे स्वामी पिंगलक तुझे बुला रहे हैं। इस प्रकार निश्शंक होकर डकराने- गरजने की तुझे हिम्मत कैसे हुई?”

संजीवक ने पूछा, “यह पिंगलक कौन है, भाई?”

दमनक ने जवाब दिया, ”अरे! तू क्या वनराज सिंह पिंगलक को नहीं जानता? अभी तुझे पता चल जाएगा। वह देख, बरगद के पेड़ के नीचे अपने परिवार के साथ जो सिंह बैठा है, वही हमारे स्वामी पिंगलक हैं।”

यह सुनकर संजीवक की कंपकंपी छूट गई। वह कातर स्वर में बोला, ”भाई, तुम तो चतुर सुजान लगते हो। अपने स्वामी से मुझे माफ करवा दो तो मैं अभी तुम्हारे साथ चला चलता हूँ।”

दमनक ने कहा, “बात तो ठीक है, तुम्हारी! अच्छा, ठहरो। मैं अभी स्वामी से पूछकर आता हूँ।”

वह पिंगलक के पास जाकर बोला, “स्वामी, वह कोई मामूली जंतु नहीं है। वह तो भगवान्‌ शंकर का वाहन वृषभ है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि भगवान्‌ शंकर के आदेश से वह नित्य यहाँ आकर यमुना-तट पर हरी-हरी घास चरता है और इस वन में घूमा करता है।”

पिंगलक भयभीत होकर बोला, ”यह सच ही होगा, क्योंकि भगवान्‌ की कृपा के बिना घास चरनेवाला यह प्राणी सर्पों से भरे वन में इस तरह से डकराता हुआ, निर्भय विचरण नहीं कर सकता। खैर, यह बता कि अब वह कहता क्या है?”

दमनक बोला, “मैंने उससे कह दिया है कि यह वन भगवती दुर्गा के वाहन मेरे स्वामी पिंगलक सिंह के अधिकार में है, इसलिए उनके पास चलकर भाईचारे के साथ रहते हुए इस वन में सुख से चरो। मेरी बात सुनकर उसने आपसे मित्रता की याचना की है।”

पिंगलक बहुत खुश हुआ। वह प्रशंसा करते हुए बोला, “मंत्रिवर, तुम धन्य हो! मैंने उसको अभयदान दिया; लेकिन तुम मुझे भी उससे अभयदान दिलाकर मेरे पास ले आओ।”

दमनक अपनी बुद्धि और भाग्य पर इतराता हुआ फिर संजीवक के पास पहुँचा। बोला, “मित्र! मेरे स्वामी ने तुमको अभयदान दे दिया है। अब तुम निडर होकर मेरे साथ चलो। किंतु याद रहे कि राजा का साथ और कृपा पाने के बाद भी तुम हमसे उचित व्यवहार ही करना। कहीं घमंड में आकर मनमाना आचरण न कर बैठना। मैं समयानुकूल ही शासन करूँगा। मंत्री के पद पर तुम्हारे रहने से हम दोनों को राज्य-लक्ष्मी का सुख मिलेगा। जो व्यक्ति अहंकार के कारण उत्तम, मध्यम और अधम व्यक्तियों का उचित सम्मान नहीं करते, वे राजा का सम्मान पाने के बाद भी दंतिल की तरह दुःख भोगते हैं।”

संजीवक ने पूछा, “यह दंतिल कौन था? !

हुनर – जिलियन लिन

जिलियन लिन सिर्फ 8 साल की थी, पर उसका भविष्य खतरे में था। स्कूल की पढ़ाई उसके लिए मुसीबत थी और सारे अध्यापक उसके लिए चिंतित थे। वो अपने असाइनमेंट्स देरी से बनाती थी। उसकी लिखाई भी बहुत बुरी थी और परीक्षाओं में भी वो फेल होती थी। इतना ही नहीं वह पूरी क्लास के लिए एक मुसीबत बन चुकी थी, एक मिनट में शोर मचाना शुरू कर देती या खिड़की से बाहर देखना शुरू कर देती जिसके कारन अध्यापक को उसका ध्यान दुबारा क्लास में वापस लाने के लिए मजबूरन क्लास रोकनी पड़ती, फिर वह अपने आसपास के बच्चों को परेशान करती थी।

जिलियन इस बारे में ख़ास चिंतित नहीं थी पर स्कूल के अधिकारी उसके लिए चिंतित थे और उसकी गलती को सुधारने की कोशिश करते थे। इन सबके बावजूद वो खुद को दूसरे बच्चों से अलग महसूस नहीं करती थी।

स्कूलवालों को लगा की जिलियन को कोई बीमारी है जिस कारण वह पढ़ाई नहीं कर पाती और उसे ऐसे स्कूल में होना चाहिए जहाँ उसे विशेष ढंग से पढ़ाया जा सके। ये सब 1930 के दशक में हो रहा था।

मुझे लगता है की उन्होंने कहा होगा की जिलियन को एक ऐसी बीमारी (attention deficit hyperactivity disorder) है जो उसका ध्यान पढ़ाई से हटा देती है और उसे ‎केंद्रीय तंत्रिका तंत्र उत्तेजक (central nervous system stimulant) पर या इसी तरह के किसी सिस्टम पर रखा जाए। लेकिन उस समय तक एडीएचडी महामारी (ADHD epidemic) का आविष्कार नहीं किया गया था। इस हालात के बारे में लोग नहीं जानते थे कि उन्हें ऐसी कोई बिमारी है भी या नहीं।

जिलियन के माता पिता को स्कूल वालों की तरफ से एक चिंता भरा पत्र मिला और उन्होंने उस पर तुरंत कार्यवाही की। जिलियन की माँ ने अपनी बेटी को सबसे अच्छे कपड़े और जूते पहनाए उसके बालों को बाँधा और डरते हुए उसके इलाज के लिए उसे मनोवैज्ञानिक के पास ले गयी। जिलियन बताती हैं की उन्हें ऐसे कमरे में ले जाया गया था जो काफी बड़ा था और वहां बहुत सारी किताबें भी थीं। कमरे में एक बड़ी मेज के बगल में ट्वीड जैकेट में एक भव्य आदमी खड़ा था।

वह जिलियन को लेकर कमरे के किनारे गया और उसे एक बड़े चमड़े के सोफे पर बिठाया। जिलियन के पैर जमीन को नहीं छू पा रहे थे। इस हालत ने उसे सावधान कर दिया और खुद का डर भगाने के लिए अपनी हथेलियों पर बैठ गयी ताकि उसे कोई परेशानी ना हो।

वह मनोवैज्ञानिक वापस अपने डेस्क पर गया और 20 मिनट तक वहां बैठ कर जिलियन को देखता रहा, फिर उसने जिलियन की माँ से जिलियन से होने वाली परेशानियों और स्कूल में की जाने वाली शैतानियों के बारे में पुछा। पर उसे किसी भी सवाल का सही जवाब नहीं मिला और वह सारा समय जिलियन को देखता रहा। इस से जिलियन असहज हो गयी और संशय में पड़ गयी। यहां तक कि इतनी छोटी उम्र में, वह जानती थी कि यह आदमी उसके जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

वह जानती थी कि ‘विशेष स्कूल” में जाने का क्या अर्थ है और वह उस के साथ कुछ भी नहीं करना चाहती थी। वह सच में यह महसूस नहीं करती थी की उसे कोई प्रॉब्लम है पर बाकी सब लोगों को उससे उल्टा ही लगता था। जिस तरह से उसकी मां ने सवालों के जवाब दिए जिलियन ने सब महसूस किया। जिलियन को लगा शायद वो सही हैं।

अंत में उस मनोवैज्ञानिक ने जिलियन की माँ से सवाल जवाब बंद किया और अपने डेस्क से उठा और जाकर लड़की के पास सोफे पर बैठ गया।

जैसे ही वे कमरे के बाहर बरामदे में पहुंचे, डॉक्टर ने जिलियन की मां से कहा, “बस यहाँ एक पल के लिए रुकिए और देखिये वह क्या करती है?” कमरे में एक खिड़की थी, और वे उसके एक तरफ खड़े हो गए, जहां से जिलियन उन्हें नहीं देख सकती थी।

थोड़ी ही देर में, जिलियन अपने पैरों पर, संगीत की धुन पर कमरे में चारों ओर घूम रही थी। वो दोनों उस लड़की की इस प्रतिभा को बिना ऑंखें झपके देख रहे थे। किसी ने जिलियन की इस हरकत पर ये महसूस नहीं किया की ये सब प्राकृतिक है या अप्राकृतिक। ऐसा लगा जैसे निश्चित रूप से उन्होंने उसके चेहरे पर खुशी की अभिव्यक्ति को स्पष्ट रूप से देख लिया हो।

अंत में, मनोवैज्ञानिक जिलियन की मां की तरफ मुड़ा और कहा, “श्रीमती लीनी, आप जानती हैं, जिलियन बीमार नहीं है। वह एक डांसर है। उसके हुनर की पहचान कर उसे एक डांस स्कूल के ले जाइए।”

मैं जिलियन से पूछा तो क्या हुआ। उसने कहा उसकी माँ ने वैसा ही किया जैसा कि मनोचिकित्सक ने सुझाव दिया था कहा। “मैं आपको बता नहीं सकती कि कैसा अद्भुत था यह,” उसने मुझे बताया। “मैं डांस स्कूल के कमरे में गयी, और यह मेरे जैसे लोगों से भरा हुआ था। लोग जो बैठ नहीं सकते थे। लोगों को सोचने के लिए भी हिलना पड़ता था।

उसने हर हफ्ते डांस स्कूल जाना शुरू कर दिया, और वह हर दिन घर पर अभ्यास करती। आखिरकार, उसने लंदन में रॉयल बैले स्कूल के लिए ऑडिशन दिया, और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। वह खुद ही रॉयल बैलेट कम्पनी में शामिल हुयी और एकल कलाकार(soloist) के तौर पर सारी दुनिया में परफॉर्म किया।


जब उनके कैरियर के इस भाग का अंत हुआ तो उन्होंने खुद कई संगीत थिएटर कंपनी बनाई और लन्दन के साथ-साथ न्यूयॉर्क में कई सफल शो किये। आगे चल कर उनकी मुलाकात एंड्रयू लॉयड वेबर से हुई और उनके साथ मिलकर उन्होंने इतिहास को कई सफल म्यूजिक थिएटर प्रोडक्शन दिए जिसमें कैट्स एंड दी फैंटम ऑफ़ दी ओपेरा मुख्य हैं।

छोटी जिलियन जिसका भविष्य खतरे में था, जिलियन लिन के नाम से मशहूर हुयी। वो एक निपुण कोरियोग्राफर थीं जिन्होंने लाखों लोगों को खुशियां दी और लाखों रूपए कमाए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि किसी ने उसकी आँखों की गहराई में देखा, जो उसकी भावनाओं को समझ सका। कई और लोगों ने जिलियन को शांत रहने को कहा किसी ने दिमागी तौर पर बीमार कहा। लेकिन जिलियन एक बीमार लड़की नहीं थी और न ही उसे किस स्पेशल स्कूल की जरुरत थी। वह वो बनना चाहती थी जो वो थी।

इस दुनिया में हर इंसान के अंदर कोई न कोई गुण जरूर होता है जो उसे आसमान की बुलंदियों तक पहुँचा सकता है। जरुरत है तो उस गुण को पहचानने और निखारने की। तभी हम एक कामयाब और सफल इंसान बन सकते हैं।

लघु कहानियाँ

तीन छोटे प्रश्न
सुकरात बहुत ज्ञानवान और विनम्र थे। एक बार वे बाजार से गुजर रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात एक परिचित व्यक्ति से हुई। उस सज्जन ने सुकरात को रोककर कुछ बताना शुरू किया। वह कहने लगा कि ‘क्या आप जानते हैं कि कल आपका मित्र आपके बारे में क्या कह रहा था?’

सुकरात ने उस व्यक्ति की बात को वहीं रोकते हुए कहा – सुनो, भले व्यक्ति। मेरे मित्र ने मेरे बारे में क्या कहा यह बताने से पहले तुम मेरे तीन छोटे प्रश्नों का उत्तर दो। उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा – ‘तीन छोटे प्रश्न’।
सुकरात ने कहा – हाँ, तीन छोटे प्रश्न।

पहला प्रश्न तो यह कि क्या तुम मुझे जो कुछ भी बताने जा रहे हो वह पूरी तरह सही है? उस आदमी ने जवाब दिया – ‘नहीं, मैंने अभी-अभी यह बात सुनी और …।’
सुकरात ने कहा- ‘कोई बात नहीं, इसका मतलब यह कि तुम्हें नहीं पता कि तुम जो कहने जा रहे हो वह सच है या नहीं।’

अब मेरे दूसरे प्रश्न का जवाब दो कि ‘क्या जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे लिए अच्छा है?’ आदमी ने तुरंत कहा – नहीं, बल्कि इसका ठीक उल्टा है।

सुकरात बोले – ठीक है। अब मेरे आखिरी प्रश्न का और जवाब दो कि जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे किसी काम का है भी या नहीं।
व्यक्ति बोला – नहीं, उस बात में आपके काम आने जैसा तो कुछ भी नहीं है।

तीनों प्रश्न पूछने के बाद सुकरात बोले – ऐसी बात जो सच नहीं है, जिसमें मेरे बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है और जिसकी मेरे लिए कोई उपयोगिता नहीं है, उसे सुनने से क्या फायदा। और सुनो, ऐसी बातें करने से भी क्या फायदा।

तुम हो कौन?
एक बार यूनान का सबसे धनी व्यक्ति अपने समय के सबसे बड़े विद्वान सुकरात से मिलने गया। उसके पहुंचने पर सुकरात ने जब उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया तो उसने कहा, ‘‘क्या आप जानते हैं मैं कौन हूं?’’

सुकरात ने कहा, ‘‘जरा यहां बैठो, आओ समझने की कोशिश करें कि तुम कौन हो?’’
सुकरात ने दुनिया का नक्शा उसके सामने रखा और उस धनी व्यक्ति से कहा,
‘‘बताओ तो जरा, इसमें एथेंस कहां है?’’
वह बोला, ‘‘दुनिया के नक्शे में एथेंस तो एक बिन्दु भर है।’’
उसने एथेंस पर उंगली रखी और कहा, ‘‘यह है एथेंस।’’
सुकरात ने पूछा, ‘‘इस एथेंस में तुम्हारा महल कहां है?’’
वहां तो बिन्दु ही था, वह उसमें महल कहां से बताए। फिर सुकरात ने कहा, ‘‘अच्छा बताओ, उस महल में तुम कहां हो?’’

यह नक्शा तो पृथ्वी का है। अनंत पृथ्वियां हैं, अनंत सूर्य हैं, तुम हो कौन? कहते हैं, जब वह जाने लगा तो सुकरात ने वह नक्शा यह कहकर उसे भेंट कर दिया कि इसे सदा अपने पास रखना और जब भी अभिमान तुम्हें जकड़े, यह नक्शा खोलकर देख लेना कि कहां है एथेंस? कहां है मेरा महल? और फिर मैं कौन हूं? बस अपने आपसे पूछ लेना।

वह धनी व्यक्ति सिर झुका कर खड़ा हो गया तो सुकरात ने कहा, ‘‘अब तुम समझ गए होंगे कि वास्तव में हम कुछ नहीं हैं लेकिन कुछ होने की अकड़ हमें पकड़े हुए है। यही हमारा दुख है, यही हमारा नरक है।

जिस दिन हम जागेंगे, चारों ओर देखेंगे तो कहेंगे कि इस विशाल ब्रह्मांड में हम कुछ नहीं हैं।

शादी करनी चाहिए
दार्शनिक सुकरात के कई शिष्य थे। उनमें से एक शिष्य इस पसोपेश में था कि उसको शादी करनी चाहिए या नहीं। उसने अपने मित्रों, रिश्तेदारों, सगे-संबंधियों, परिचितों और बुजुर्गों सभी से अपने -अपने ढंग से सलाह ली। किसी ने कहा कि शादी कर लेना और घर बसा लेना। इससे जीवन व्य्वस्थित हो जाएगा। वो अपनी बात के पक्ष में तरह-तरह की दलीलें देते थे।

दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी थे, जो उसको शादी न करने की सलाह देते थे और कहते थे कि शादी में झंझट ही झंझट है इसको करने से ज्यादा इसको निभाने में है।

इतनी सारी सलाह मिलने के बाद शिष्य बड़े धर्मसंकट में पड़ गया कि आखिर क्या करे ? आखिरकार उसने अपने गुरू से सलाह लेने का निश्चय किया। शिष्य का सोचना था कि गुरू ही सही सलाह दे सकते हैं क्योंकि खुद उनका पारिवारिक जीवन बड़ा कष्टकारी था। इसलिए वह ज्यादा व्यवहारिक और सही सलाह दे सकते हैं। शिष्य सुकरात से सलाह लेने आया। सुकरात ने कहा कि ‘उसको शादी कर लेना चाहिए। ‘ शिष्य यह सुनकर बहुत हैरान हुआ और उसने कहा कि ‘ आपका पारिवारिक जीवन तो ठीक नहीं है और आपकी पत्नी भी बहुत झगड़ालू है और उसने आपका जीना दूभर कर दिया है। फिर भी आप मुझको शादी करने की सलाह दे रहे हैं?’

सुकरात यह सुनकर मुस्कुराए और कहा कि ‘यदि तुम्हे शादी के बाद अच्छी पत्नी मिल गई तो तुम्हारा जीवन संवर जाएगा। क्योंकि वह तुम्हारे जीवन में खुशियां लाएगी और उन खुशियों की बदौलत तुम सफलता के नित नए सोपानों को छुओगे। और यदि मेरी पत्नी जेंथिप की तरह कर्कश पत्नी मिल गई तो तुम्हारे जीवन में इतनी समस्याएं हो जाएंगी कि तुम मेरी तरह दार्शनिक बन जाओगे। यानी कुल मिलाकर शादी किसी भी तरह से घाटे का सौदा नहीं है।’

हँसी का कारण

मंगलू एक ग्वाला था । एक दिन जंगल में उसकी गाएँ चर रही थी । वह चीड़ के पेड़ों की छांव में बांसुरी बजा रहा था । बांसुरी की धुन जंगल में गूंज रही थी । तभी उस रास्ते उसने राजा के दल को जाते हुए देखा । मंगलू जोर से हँसा । वजीर ने इसे राजा का अपमान

समझा । उसने राजा से मंगलू की शिकायत की । राजा ने मंगलू से हँसने का कारण पूछा । वह बोला – ’’मै समय आने पर बताऊंगा ।’’ राजा क्रोधित हो गया । उसने ग्वाला को जेल में बन्द करवा दिया । मंगलू ने राजा से निवेदन किया – ’’महाराज! मुझे बांसुरी बजाने का शौक है। मुझे जेल में भी बांसुरी बजाने की इजाजत दीजिए ।‘‘

’’तुम सुबह रोज सुरक्षाकर्मियों की उपस्थिति में बांसुरी बजाने जेल से थोड़ी देर के लिए बाहर लाए जाओगे । कुछ देर बाद फिर जेल में कैदी के रूप में रहोगे ।’’ – राजा ने मंगलू को आज्ञा दी।

राजा की एक लड़की थी । उसका नाम दिव्या था । वह खूबसूरत थी । उसे गाने का शौक था । एक दुर्घटना में उसकी याददाश्त चली गई थी । अब वह किसी से बात नहीं करती थी । गुमसुम रहती थी । राजा ने उसकी याददाश्त लौटाने के बहुत प्रयास किए किन्तु सब बेकार ।

रोज सुबह सुरक्षाकर्मियों की उपस्थिति में मंगलू जेल से बाहर आकर थोडी देर तक बांसुरी बजाता रहता । मंगलू की बांसुरी की धुन दिव्या के कानो तक भी पहुंचती । वह अपने कक्ष से बाहर आकर बांसुरी की धुन को सुनती रहती ।

एक दिन रानी ने दिव्या को बांसुरी की धुन सुनते हुए देखा । उसे बहुत समय बाद दिव्या के चेहरे पर खुशी दिखाई दी । रानी ने राजा को यह बात बता दी । राजा ने मंगलू को कैद से मुक्त करते हुए आज्ञा दी कि वह इसी दरबार में रहेगा और दिव्या को बांसुरी की धुन सुनाएगा । मंगलू ने ऐसा ही किया । धीरे-धीरे दिव्या के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा । अब वह अपने परिवार वालों के साथ बातें भी करने लगी । कुछ दिनों के बाद वह गाने भी लगी । अब मंगलू बांसुरी बजाता और वह गाती । राजा और रानी दिव्या में आए परिवर्तन से बडे खुश थे ।

’’महाराज ! मंगलू ने हम पर इतना बड़ा उपकार किया है । मुझे लगता है दिव्या मंगलू को चाहती है । हमें दोनों की शादी करानी चाहिए । ’’ – एक दिन रानी ने राजा से कहा ।

’’महारानी ! हमारा कोई पुत्र नहीं है । हम जिसके साथ दिव्या का विवाह करेंगें उसे ही इस राज्य का उत्तराधिकारी भी बनाएगें । राज्य चलाने के लिए बुद्धि एवं चातुर्य आवश्यक है । जब हमें मंगलू में ये गुण दिखाई देगें , तभी हम दिव्या की शादी मंगलू से करेंगे ।’’- राजा ने रानी को समझाया ।

एक दिन पड़ोस के राजा वीरेन्द्र का दूत इस राजा के दरबार में आया । उसने राजदरबार में राजा वीरेन्द्र का संदेश पढ़कर सुनाया –

’’हम आपसे दो सवाल पूछते हैं । यदि आपने हमारे दो बौद्धिक सवालों के जवाब दे दिए तो हम आपके राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे । अगर आप जवाब नही दे पाए तो आपको बन्दी बनाकर हम आपके राज्य को अपने राज्य में मिला लेगें ।

पहला सवाल – ’’इस चाँदी के टुकडे को देखकर बताओ । इसमें हम कहाँ पर ,तुम कहाँ पर ? “ – चांदी के टुकड़े को दिखाते हुए दूत ने संदेश पढ़ा ।

अपने साथ लाए दो घोड़ों को राजदरबार में पेश करते हुए दूत ने दूसरा सवाल

पढ़ा- ’’ यह दोनो घोड़े एक जैसे हैं । इनका रंग भी एक जैसा है । बताओ इनमें कौन पिता और कौन बच्चा है ? जो पिता है उसके भार के बराबर चांदी के सिक्के हमें भेजने होंगे । ‘‘

कोई भी राजदरबारी राजा वीरेन्द्र के भेजे इन सवालों के जवाब नहीं बता पाया । मंगलू ने कहा -’’महाराज! आपकी आज्ञा हो तो मै इन सवालों का जवाब बता सकता हूँ । ’’

’’बताओ ! “- राजा ने मंगलू को आज्ञा दी । मंगलू ने दूत के लाए चाँदी के टुकड़े को हाथ में पकड़ कर गौर से देखा । वह बोला – ’’महाराज! यह चाँदी का टुकड़ा पड़ोस के राजा वीरेन्द्र और आपके राज्य के नक्शे के रूप में है । इसमें ऊपर वाले बिन्दु पर आपका राज्य है और दूसरा राजा वीरेन्द्र के राज्य को दर्शा रहा है ।’’

मंगलू ग्वाला था ही वह पहले घोडों का व्यापार भी करता था । इसलिए उसे घोडों के स्वभाव के बारे में भी पता था । दूसरे सवाल का जवाब देते हुए मंगलू बोला -‘‘ दूत के लाए इन दो घोड़ों को मैदान में एक साथ छोड़ दिया जाए । जो घोडा आगे-आगे दौड़कर चले । थोड़ी देर बाद पीछे वाले का इंतजार करे, वह बच्चा है । दूसरा वाला घोड़ा उसका पिता है ।

राजा मंगलू की बुद्धिमता से प्रभावित हुआ । उसने दिव्या की शादी मंगलू से कर दी । और उसे अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया । मंगलू बोला – ’’ महाराज ! जंगल में आपके दल को देखकर जब मै हंसा था तो आपने मुझसे हंसने का कारण पूछा था । मैने कहा था समय आने पर बताऊँगा । आज वह समय आ गया है । मै यह सोचकर हँसा था कि मैं राजा की कन्या से विवाह करूंगा और स्वयं भी राजा बनूंगा । मै अपनी कल्पना पर ही हँसा था जो आज साकार हो गई है ।

चुड़ैल की कहानी

किसी गाँव में रामू नाम का एक हलवाई रहता था, वह बहुत ही मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था, उसके हाथ से बनाये मिठाई काफी स्वादिष्ट होते थे, जिस कारण से दूर दूर दे लोग उसे अपने यहा कोई आयोजन होने पर मिठाई बनाने के लिए बुलाते थे,

एकबार की बात है, उसके पास के गाँव के मुखिया के यहा शादी का आयोजन था, जिसमे मिठाई बनाने के लिए रामू को बुलाया गया था, फिर रामू उस गाँव में जाकर मुखिया के यहा मिठाई आदि सब अच्छे से बना देता है, जिसके बाद उस मुखिया ने उसके काम के बदले पैसे और ढेर सारे घर पर खाने के लिए मिठाई दिए,

जिसे रामू एक गठरी बनाकर अपने गाँव को वापस जाने लगा था, जो की उसके गाँव का रास्ता एक जंगल से होकर गुजरता था, जंगल काफी घना था, और शाम भी हो गयी थी, फिर धीरे धीरे रामू उस जंगल के रास्ते से जा रहा था, की अचानक से उसके सामने एक चुड़ैल प्रकट हुई, जिसे देखकर रामू बहुत ही डर गया,

और फिर डर के मारे उस चुड़ैल के सामने रुक गया, फिर इतने में चुड़ैल खूब जोर से हसते हुए बोली “ अच्छा हुआ इन्सान जो तू आ गया, मै कितने दिन से भूखी थी, अब तुम मेरा भोजन बनेगा”

फिर डरते हुए रामू चुड़ैल से बोला “ अगर आप मुझे खा लोगी, तो फिर मै कभी भी वापस अपने गाँव नही जा सकुगा, जिसके कारण लोग इस जंगल में आने से डरने लगेगे, फिर लोग नही आयेगे तो फिर आपको हमेसा भूखा ही रहना पड़ेगा, इसके बदले अगर कुछ और भी खाने को दे तो,”

रामू की यह बात सुनकर बोली फिर और क्या दे सकता है खाने में, जिससे उसकी भूख मिट जाए, तो फिर रामू ने कहा “उसके गठरी में ढेर सारे स्वादिष्ट मिठाई है, अगर उसे खाएगी तो निश्चित ही उसकी भूख मिट जाएगी,

तो रामू की यह बात सुनकर चुड़ैल बोली ठीक है जल्दी से वह मिठाई उसे दे, इसके बाद रामू ने अपने गठरी खोलकर वह सारे मिठाई उस भूखी चुड़ैल को दे दिया, फिर उन स्वादिष्ट मिठाई को खाकर चुड़ैल बोली “तुम्हारे मिठाई बहुत ही स्वादिष्ट है, मुझे बहुत ही अच्छे लगे, इसलिए तुम्हारी जान को छोडती हु, लेकिन एक शर्त मुझे फिर से इन मिठाई को आगे भी खिलाना पड़ेगा”

तो रामू बोला वह बहुत ही गरीब है, इसको बनाने के लिए ढेर सारे पैसे चाहिए, फिर वह इतने सारे पैसे कहा से लेकर आएगा, जिससे वह मिठाई बना सके.

रामू की यह बात सुनकर चुड़ैल बोली रुको मै तुम्हे सोने के सिक्के देती हु, तुम इन्हें बेचकर इन पैसो से मिठाई के समान खरीदकर मिठाई बना लेना,

इसके बाद वह चुड़ैल अपने उस पेड़ के गुफा में गयी और ढेर सारे सोने के सिक्के लेकर आ गयी, जिसे देखकर रामू दंग रह गया, और फिर उस चुड़ैल से मिठाई लाने का वादा करके वापस अपने घर चला गया, इस तरह रामू अपने दिमाग से अपनी जान बचा लिया, और यह सारी बाते अपनी पत्नी को बता दिया,

जिसके बाद उसकी समझदार पत्नी ने उस जंगल में दोबारा जाने के लिए मना कर दिया, इस तरह उन मिले सोने के सिक्को को बेचकर दोनों अपना खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे.

लेकिन रामू और उसकी पत्नी की बातो को उसके घर पर दूध देने ग्वाले ने पूरी बात सुन लिया था, और फिर उस ग्वाले ने सोने के सिक्के और चुड़ैल वाली बात अपनी पत्नी को बता दिया, उस ग्वाले की पत्नी बहुत ही लालची स्वाभाव की थी, और बोली ठीक है आप भी उस जंगल में मिठाई लेकर जाना और उस चुड़ैल से उसके बदले सोने लेकर आना, फिर डरते डरते वह ग्वाला उस जंगल में जाने को तैयार हो गया.

फिर अगले दिन वह ग्वाला ढेर सारी मिठाई लेकर उस जंगल में पहुच गया, जहा उसकी मुलाकात उस चुड़ैल से हो गयी, तो अपनी जान के बदले में उसने मिठाई को दे दिया, फिर उसके बदले उस चुड़ैल ने अपने पेड़ की गुफा से सोने के सिक्के लाकर उस ग्वाले की दे दिया.

फिर सोने के सिक्के को पाकर ग्वाला काफी खुश हुआ था, जिसे देखकर ग्वाले की लालची पत्नी बोली फिर से आप वहा जंगल में जाना फिर जिस पेड़ की गुफा से सोने की सिक्के दिया है, उस पेड़ को ही काटकर सारे सोने के सिक्के एक ही बार में ले आना.

अपनी पत्नी के कहे गये ग्वाले ने ठीक वैसा ही किया, लेकिन पेड़ को काटते देखकर चुड़ैल बहुत ही क्रोधित हुई और फिर उसने उस ग्वाले का वही अंत कर दिया. इस प्रकार उस ग्वाले को अपनी लालची पत्नी के चलते जान गवानी पड़ी.

छोटी लोककथाएं

यह एक किसान की कहानी है जो एक गाँव में अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनके पास एक छोटी सी जमीन थी जहां वे सब्जियों की खेती करते थे और उन सब्जियों को बाजार में बेच देते थे। गांव में एक सरोवर के पास एक मंदिर बना हुआ था। गांव के लोग सरोवर की देवी को मछलि और सरोवर किनारे लगे पेड़ के आम चढ़ाते थे। इसलिए सभी को अपने स्वार्थ के लिए पेड़ और झील का उपयोग करने की मनाही थी।

एक दिन किसान मंदिर को पार कर रहा था और उसने देखा कि पेड़ से बहुत सारे रसीले आम लटके हुए हैं। उसने चारों और देखा और पाया की आस पास कोई नहीं था। । यह अच्छा अवसर पाकर, उसने जल्दी से पेड़ से एक आम तोड़ा और उसे धोने के लिए सरोवर के किनारे चला गया। जैसे ही वह सरोवर में गया, उसने देखा कि कई मछलियाँ तैर रही हैं। उत्साहित किसान सरोवर से आधा दर्जन मछलियां पकड़कर खुशी-खुशी घर वापस चला गया |

अपने घर पहुँचने पर, उसने तुरंत अपनी पत्नी को मछलियाँ दीं और उसे स्वादिष्ट भोजन बनाने को कहा। पर जब पत्नी ने मछली का पहला टुकड़ा खाया तो वह तुरंत बेहोश हो गई। जैसे ही वह बेहोश हुई, पीछे से एक आवाज आई। आवाज ने किसान से कहा कि उसे उसके लालच की सजा मिली है। किसान ने अपनी गलती के लिए माफी मांगी और अपनी पत्नी को बचाने का अनुरोध किया। आवाज ने किसान को आदेश दिया कि मछली बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी बर्तन उसी सरोवर सरोवर में फेंक दे। उसने वैसे ही किया और इस तरह उसकी पत्नी फिर से उठ खड़ी हुई।

यह कहानी हमें कभी भी चोरी न करने और हमेशा नेक रास्ते पर चलने की सीख देती है।

सच्ची मित्रता

कश्मीरी लोक कथा

एक राजा और उसका मंत्री बहुत अच्छे मित्र थे। वे हमेशा साथ रहते थे। उनकी तरह, उनके बेटे भी एक साथ बड़े हुए और बहुत करीबी दोस्त बने । एक दिन दोनों शिकार पर गए। रास्ते में उन्हें बहुत प्यास लगी और वे थक गए इसलिए उन्होंने एक पेड़ के नीचे आराम करने का फैसला किया। मंत्री का बेटा पानी की तलाश में गहरे जंगल में चला गया। एक झरने के पास पहुँचकर उसने एक सुंदर परी को देखा। लेकिन परी के पास एक शेर बैठा था। उसने धीरे से झील से कुछ पानी निकाला और अपने दोस्त के पास वापस लौट आया।

उसने राजा के बेटे को घटना सुनाई और उसे झरने के पास ले गया। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि शेर परी की गोद में सो रहा है। उन्होंने परी को महल में ले जाने का फैसला किया जबकि मंत्री का बेटा शेर के साथ ही रहा। थोड़ी देर बाद जब शेर उठा तो लड़के ने कहा कि उसका दोस्त परी को महल में ले गया है। शेर फिर हँसा और उससे कहा कि अगर राजा का बेटा सच्चा दोस्त होता तो वह उसे शेर के साथ कभी अकेला नहीं छोड़ता। फिर उसने तीन महान मित्रों- एक राजा, एक पुजारी और एक भवन निर्माता की कहानी सुनाना शुरू किया, जिन्होंने दोस्ती का सही अर्थ दिखाया और अंत तक हमेशा एक-दूसरे के साथ रहे।

कहानी एक बड़ा सबक देती है कि हमें अपने दोस्तों का चयन बहुत ध्यान से करना चाहिए।

बहुत पहले की बात है, खासी जन समूह में कानन नाम की एक खूबसूरत लड़की थी। एक बार एक बाघ ने उसे पकड़ लिया और गुफा में ले गया। जब भूखे बाघ ने लड़की को देखा, तो उसने महसूस किया कि वह लड़की उसकी भूख को संतुष्ट करने के लिए बहुत छोटी है। इसलिए उसने उसे बड़े होने तक कुछ समय के लिए रखने का फैसला किया।

बाघ उसे बहुत कुछ खिलाता था और स्थिति से अनजान, कानन धीरे-धीरे गुफा में घर जैसा महसूस करने लगी। गुफा में एक चूहा भी रहता था। चूहे ने अगले दिन बाघ को कानन को खाने की बात करते हुए सुना। चूहा तुरंत कानन के पास गया और उसे सारी बात बता दी। चिंतित कानन ने चूहे से उसकी मदद करने को कहा । उसने उसे गुफा से बाहर जाने और एक जादूगर मेंढक से मिलने का सुझाव दिया। कहानी आगे बढ़ती है । मेंढक कानन की मदद करने को तैयार हो जाता है। पर बदले मे कानन को अपना सेवक बना लेता है। मेंढक के पास एक जादुई खाल थी।

चूहे ने एक बार फिर कनान को मेंढक से बचाया और उसे एक जादुई पेड़ के पास ले गया जिसकी शाखाएँ नीले आकाश तक पहुंचती थीं । वापस गुफा में, जब बाघ ने देखा कि कानन गायब है, तो वह बहुत क्रोधित हुआ। आकाश में “का संगी ” नाम की एक देवी ने कनान को आश्रय दिया। दूसरी ओर का संगी को मेंढक की जादुई खाल के बारे में पता चला और उसने उसे जला दिया। जादूगर मेंढक का संगी से लड़ने के लिए आकाश में आया।

दोनों में भयंकर युद्ध हुआ पर अंत में सब धरती वासियों ने इतनी जोर से नगाड़े और ढोल बजाये की मेंढक डर कर भाग गया और का-संगी जीत गई। इसीलिए आज भी उस प्रजाति के लोग सूर्य ग्रहण पर ढोल नगाड़े बजा कर सूर्य की मदद करते हैं।

यह लोक कथा उस समय की है जब जानवर बोलते और नाचते थे। एक बार एक सुस्त पंखों वाला मोर रहता था | लेकिन उसे अपनी लंबी पूंछ पर बहुत गर्व था। अपनी लंबी लंबी पूंछ के कारण, वह कभी अपने पड़ोसियों के पास नहीं जा सका। वह केवल बड़े घरों और पैसे वाले लोगों से मिलने जाता था। उसके घमण्ड के कारण उसके पड़ोसी उसे नापसंद करने लगे। वे पीठ पीछे मोर का मजाक उड़ाते थे। एक दिन उन्होंने उस से मज़ाक करने का करने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि एक बर्ड क्लब बनाया गया है और सभी पक्षियों ने मोर को अपना नेता

बनाने के लिए वोट दिया है। मुखिया को का संगी की यात्रा करने और उसके साथ नीले आकाश में उड़ान भरने का मौका मिलेगा। क- संगी सूर्य की देवी थीं। मोर बहुत उत्साहित था। मोर ने अपनी यात्रा के लिए उड़ान भरी। उसके जाने के तुरंत बाद, अन्य पक्षी गपशप करने लगे और उनकी छोटी सी चाल पर हंसने लगे। का-सांगी अपने महल में अकेली रहती थी। इसलिए, वह अपने स्थान पर एक अतिथि को पाकर बहुत खुश थी।

दिन बीतते गए और मोर पर्याप्त सुविधाओं के साथ एक महान जीवन व्यतीत करता था। धीरे-धीरे उनका अभिमान आसमान पर पहुंच गया। का संगी अपना अधिक समय मोर के साथ बिताती थी, परिणामस्वरूप वह अपनी गर्मी से पृथ्वी को गले नहीं लगा पाती थी। धरती ठंडी होने लगी और जंगल के जानवर बीमार और उदास रहने लगे। हर समय बारिश होने लगी, सब कुछ तबाह हो रहा था और पृथ्वी पर कोई खुशी नहीं बची थी।

सभी जानवरों ने इंसानो से मदद मांगी और इस नतीजे पर पहुंचे कि मोर की वजह से का-संगी को आसमान से अपनी गर्मी बरसाने का समय नहीं मिल रहा है। इसलिए मोर को वापस धरती पर लाना सभी के लिए जरूरी है। उन्होंने एक बूढ़ी औरत की मदद से पृथ्वी को बचाने के लिए एक और तरकीब लगाई और मोर को आकर्षित कर वापिस धरती पर आने के लिए मजबूर कर दिया।

मोर की याद में जो आंसू का-संगी ने बहाये, वह मोर के पंखो पर गिरे और रंग बिरंगे निशान छोड़ गए, जो आज भी मोर के पंखो पर देखे जा सकते हैं।

भिखारी और लड्डू

यह एक दक्षिण भारतीय लोक कथा है।

मूर्ति और उसकी पत्नी भावी का एक साथ रहते थे । मूर्ति को भीख में जो भी चावल मिलता, वह दोनों के लिए दिन में दो बार खाने के लिए पर्याप्त था। एक बार, मूर्ति के दोस्त ने उन्हें रात के खाने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें चावल से बने लड्डू भेंट किए। भावी को लड्डू इतने पसंद आये की उसने अगले दिन वही लड्डू घर में बनाये । लेकिन वो कुल 5 लड्डू थे।

दोनों में से कोई आखरी और पांचवा लड्डू बांटना नहीं चाहता था, इसलिए उन्होंने फैसला किया कि वह आँखें बंद कर के लेट जाएंगे और जो कोई भी अपनी आंख पहले खोलेगा और पहले बात करेगा उसे 2 लड्डू मिलेंगे और दूसरे को तीन। तीन दिन बीत गए, वे नहीं उठे। ग्रामीण परेशान होने लगे। जब ग्रामीणों ने अपना घर खोला और उन्हें लेटा हुआ देखा, तो उन्हें लगा कि यह दोनों नहीं रहे।

भावी और मूर्ति को उनके अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया, जब मूर्ति अचानक उठे और चिल्लाए “मैं दो लड्डू से खुश हूं।” बाद में उन्होंने पूरी कहानी ग्रामीणों को बताई। तभी से मूर्ति को गांव में “लड्डू भिखारी” नाम दिया गया।

बोधिसत्ता की बहादुरी

एक समय की बात है, ब्रह्मदत्त नाम का एक बनारस का राजा था। बोधिसत्व का जन्म ब्रह्मदत्त की प्रमुख रानी के पुत्र के रूप में हुआ था। नामकरण के दिन ही ब्रह्मदत्त ने 800 ब्राह्मणों की मनोकामना पूरी करी। उसके बाद ब्रह्मदत्त ने ब्राह्मणों से पुत्र के भाग्य के बारे में पूछा।

ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि उसका पुत्र उसके बाद राजा बनेगा और अपनी बुद्धि और 5 हथियारों से पूरे भारत पर शासन करेगा। जब बोधिसत्व 16 वर्ष के थे, तब उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा गया था। राजा ने बोधिसत्व को अपने गुरु के लिए गुरु दक्षिणा के रूप में एक हजार मुद्राएं दीं और उन्हें कंधार राज्य भेज दिया, जहां एक बुद्धिमान शिक्षक रहता था। बोधिसत्व ने अपनी शिक्षा पूरी की, गुरु से उपहार के रूप में 5 हथियार प्राप्त किए। उन्होंने अपने गुरु से विदा ली और तक्षिला को छोड़ दिया और अपने 5 हथियारों के साथ बनारस के लिए रवाना हो गए।

रास्ते में, उनका सामना एक शक्तिशाली राक्षस से हुआ, लेकिन बोधिसत्व में पर्याप्त आत्मविश्वास था और वे घबराए नहीं। उसके आत्मविश्वास और निडर रवैये को देखकर राक्षस ने उसे जाने दिया। वन छोड़ने से पहले, बोधिसत्व ने राक्षस को भक्ति के मार्ग पर चलने और क्रूरता के मार्ग को छोड़ने का आदेश दिया। कुछ लोग अभी भी जंगल के बाहर इंतजार कर रहे थे। बोधिसत्व ने उन्हें सारी बातें बताईं और फिर बनारस की ओर चल पड़े। आगे जाकर जब बोधिसत्व राजा बना तो उसने बड़ी ईमानदारी और बुद्धि से लोगों की सेवा की और देश की सेवा की।

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मासूम सावित्री
गुजराती लोक कथा

एक गाँव में सावित्री नाम की एक बच्ची अपने माता ापिता और तीन भाइयों के साथ रहती थी। एक दिन, सावित्री के माता पिता तीर्थ यात्रा पर चले गए। माता पिता के जाने के बाद तीनो भाइयों ने सावित्री को परेशान करना शुरुर कर दिया।

एक दिन सब से बड़ा भाई ने सावत्री को जानबूझकर एक छोटी सी रस्सी और छेद वाले घड़े में पानी लेने कुँए पर भेजा और समय पर न आने पर दंड देने की धमकी भी दी। कुँए पर पहुंच कर सावित्री रोने लगी। वहां एक सांप और मेंढक रहते थे जो सावित्री का रोआ सुन कर बहार आ गए. दोनों ने सावित्री की मदद करने की ठानी। सांप ने रस्सी से जुड़ कर रस्सी को लम्बा बना दिया और मेंढक घड़े में इस तरह बैठ गया की घड़े छेद बंद हो गया। सावित्री पानी निकाल कर ख़ुशी ख़ुशी घर चली गई।

अगले दिन दूसरे भाई ने सावित्री को अपने सफ़ेद मैले कपडे धोने के लिए भेजा और जानबूझकर उसे साबुन नहीं दिया। तालाब पर पहुंच कर सावित्री रोने लगी। तभी वहां से एक सारस निकला और रोती हुई सावित्री को देख कर उसकी मदद के लिए रुक गया। सरस कपड़ों पर लोटने लगा जिस से कपडे दूध जैसे सफ़ेद हो गए। सावित्री ख़ुशी ख़ुशी कपडे ले कर घर चली गई।

अगले दिन तीसरे भाई ने सावित्री को खूब सारे अनाज में से धान अलग करने को दिए। इतने सारे धान सावित्री अकेले अलग नहीं कर सकती थी। सावित्री को दुविधा में देख कर पास में रहने वाली एक चिड़िया उसकी मदद के लिए आ गयी। उस चिड़िया ने अपने साथियों को भी बुला लिया और उन सब ने मिल कर तुरंत अनाज में से धान अलग कर दिए। सावित्री के भाई छिप कर यह सब देख रहे थे। उन्हें अपने किये पर पछतावा हुआ और उन्होंने फिर कभी सावित्री को परेशान ना करने की ठानी।

दयालु किसान
यह बच्चों के लिए एक कश्मीरी लोक कथा है।

एक गाँव में एक किसान रहता था। किसान खेती करने में व्यस्त था तभी उसकी पत्नी वहां आयी और उसके लिए खाना रख कर वहां से घर वापस चली गयी। जब किसान को फुर्सत मिली तो उसने खाना खाने की सोची। पर यह क्या। खाने का बर्तन खाली था। किसान को लगा की उसकी पत्नी ने उसके साथ मज़ाक किया है और वह नाराज़ हो गया। घर जा कर उसने अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा किया। पत्नी को भी कुछ समझ ना आया।

अगले दिन वह एक अलग तरह के बर्तन में किसान को खाना देने गयी और किसान को व्यस्त देख कर खाना वहीँ रख कर घर वापस आ गयी। कुछ देर बाद एक सियार वहां आया और खाने के बर्तन में मुँह डाल के खाना खाने की कोशिश करने लगा। पर इस बार वह सफल नहीं हुआ और उसका मुँह बर्तन में फंस गया। सियार हल्ला मचाने लगा। सियार को इस हालत में देख के किसान समझ गया की कल उसका खाना कहा गायब हुआ था। वह डंडा ले कर सियार के पास आया . सियार ने उस से अपनी जान बचाने की गुज़ारिश की। किसान को सियार पर दया आ गयी और उसने सियार को बर्तन से मुक्त कर दिया। सियार ने किसान को धन्यवाद दिया और किसान की मदद का वडा कर के वहां से चला गया।

सियार सीधा राजा के पास गया और वहां जा के सियार ने किसान के बारे में राजा को सब बताया। राजा बहुत दिन से अपने खेतों के लिए एक ऐसा ही मेहनती किसान ढूंढ रहा था और उसने सियार से किसान को राजमहल लाने को कहा।

सियार किसान के घर गया और उसे अगले दिन सुबह कही चलने को तैयार रहने को कहा। अगले दिन सुबह, किसान और सियार राजमहल की तरफ निकल पड़े। राजमहल के पास पहुँच कर किसान घबरा गया। उसे लगा सियार राजा से कह कर उसे सज़ा दिलवाएगा। डरते डरते किसान महल के अंदर गया। राजा किसान को देखते ही खुश हो गया। पर किसान दर के मारे काँप रहा था। तब राजा ने किसान को बताया की उसने किसान को सज़ा देने के लिए नहीं बल्कि उसे नौकरी देने के लिए बुलाया था। अब किसान की जान में जान आयी। राजा ने किसान को अपने पास नौकरी पर रख लिया और उसकी साड़ी गरीबी दूर कर दी।

ब्राह्मण और नौकर
गुजराती लोक कथा

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। ब्राह्मण अनपढ़ था इसलिए वह कोई काम नहीं कर सकता था। एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने उसे राजा के पास अपनी समस्या ले कर जाने की सलाह दी। ब्राह्मण ने राजा के पास जा कर उसे आशीर्वाद दिया। राजा ने ब्राह्मण से खुश हो कर एक पर्ची दी और उस पर्ची को खजांची के पास ले जा कर अपना इनाम लेने को कहा। ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। वह अक्सर राजा के पास आने लगा।

एक दिन राजा के नौकर ने ब्राह्मण से बक्शीश मांगी। ब्राह्मण कोई जवाब दिए बिना वहां से चला गया। नौकर ने ब्राह्मण को सबक सिखाने की ठानी। अगले दिन नौकर ने ब्राह्मण से कहा की राजा तुम से नाराज हैं क्योंकि उन्हें तुम्हारे मुँह से दुर्गन्ध आती है। ब्राह्मण घबरा गया और अगली बार राजा से मिलने अपने नाक मुँह पर कपड़ा रख कर गया।

शाम को नौकर ने राजा से कहा की आज ब्राह्मण नाक मुँह पर कपड़ा इसलिए रख कर आया था क्योंकि वह कह रहा था की उसे आप के कान से दुर्गन्ध आती है। राजा को यह सुन कर क्रोध आया। अगले दिन जब ब्राह्मण महल से वापस लौट रहा था तब नौकर ने फिर उस से बक्शीश मांगी। ब्राह्मण को जो पर्ची राजा से मिली थी वही उसने नौकर को दे दी। नौकर ख़ुशी ख़ुशी खजांची के पास पहुंचा। खजांची ने नौकर को बैठने को कहा। कुछ देर में एक नाई आया और नौकर के नाक कान काट के ले गया। नौकर गुस्से में राजा से शिकायत करने गया। राजा नौकर की बात सुन कर सारा माज़रा समझ गए। उन्होंने कहा तुम ने नौकर की झूठी शिकायत की इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हुआ।

जादुई पेड़

किसी जगह पर पीपल का एक बहुत बड़ा पेड़ था। वहां रहने वाले लोगों का यह मानना था की यह पीपल का पेड़ बहुत पवित्र है। कुछ समय बीता, वहां केराजा की एक बेटी हुई। बेटी का नाम रूपा रखा गया। रूपा को बाग़-बगीचे में खेलना बहुत अच्छा लगता था। जैसे ही रूपा की पढ़ाई पूरी होती, वह सीधे राज बगीचे में खेलने चली जाती।

एक दिन रूपा बगीचे में खेल रही थी। तभी उसके पास एक तितली आ कर बैठी। इसके पंखों में हीरे जड़े हुए थे। तभी तितली उड़ चली और रूपा उसका पीछा करते करते जंगल में निकल गयी। कुछ देर बाद रूपा को एहसास हुआ की वह भटक गयी है। तभी तेज़ तूफ़ान शुरू हो गया और रूपा रोने लगी। अचानक से रूपा के पीछे लगे पीपल के पेड़ की डाली आगे आयी और उसने रूपा उठा कर कहा की उसके रहते रूपा को डरने की कोई ज़रुरत नहीं है। जब तक तूफ़ान थम नहीं गया, पीपल के पेड़ ने रूपा को अपने अंदर छिपाये रखा। तब तक रूपा को ढूंढते हुए सैनिक आ गए और उसे अपने साथ महल वापस ले गए।

धीरे धीरे रूपा और पीपल के पेड़ की दोस्त बढ़ने लगी। जब राजा को इसकी भनक लगी तो वह विचलित हो उठा। रूपा किसी खतरे में न पड़ जाये यह सोच कर उसने जंगल के सभी पेड़ कटवाने का निर्णय ले लिया। राजा के आदेश से सैनिक जंगल में पेड़ काटने पहुंचे पर वह जैसे ही पीपल के पेड़ की टहनियां काटते, पेड़ से नयी टहनियां ऊग आती। सैनिक घबरा गए। तब पीपल के पेड़ ने गरज कर कहा की सालों से वह और उसके साथी इंसानों को सांस लेने के लिए हवा देते आ रहे हैं , और आज यह लोग उन्हें ही ख़त्म करने चले हैं। अगर पेड़ नहीं रहे, तो इंसान भी नहीं बचेंगे। यह पता चलने पर राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने अपना निर्णय वापस लिया और रूपा और पीपल के पेड़ की दोस्ती की फ़िक्र छोड़ दी।

गुरु और शिष्य

एक आश्रम में एक गुरूजी अपने 4 शिष्यों के साथ रहते थे। एक बार गुरूजी और शिष्य आश्रम में उगाये फल और सब्ज़ी बेचने बैल गाडी में बैठ कर बाजार की तरफ निकले। बैलगाड़ी कहीं न रोकने का आदेश दे कर गुरूजी सो गए। तभी एक ठोकर लगी और गुरूजी की पगड़ी गिर पड़ी। पर जैसा की गुरूजी का आदेश था , शिष्यों ने बैल गाडी नहीं रोकी। जब गुरूजी की नींद टूटी तो उन्हें अपने शिष्यों की मूर्खता पर बहुत गुस्सा आया। इस बार सोने से पहले गुरूजी ने आदेश दिया की बैलगाड़ी में से जो भी गिरे उसे उठाना है।

कुछ दूर जा कर बैलों ने गोबर कर दिया। शिष्यों ने बैलगाड़ी रोकी और गोबर उठा कर गुरूजी के बगल में रख दिया। जब गुरूजी की नींद टूटी तो उन्हें अपने शिष्यों की मूर्खता पर बहुत गुस्सा आया। इस बार उन्होंने सोने से पहले कागज़ पर एक सूची बनायी जिसमे किस सामन को उठाने के लिए रुकना है और किस सामान के लिए नहीं रुकना है, यह लिखा था।

बैलगाड़ी कुछ दूर चली और फिर उसमे ठोकर लगी। इस बार गुरूजी बैलगाड़ी से लुढ़क कर एक दल-दल में गिर गए। शिष्यों ने गुरूजी की दी हुई सूची निकाली और देखा की उठाने वाले सामान में कहीं भी गुरूजी का नाम नहीं था। गुरूजी चिल्लाते रहे और शिष्य मुँह झुकाये खड़े रहे। तभी वहां से एक बूढी औरत निकली। उसने पूरा नज़ारा देखा और शिष्यों से गुरूजी को निकालने को कहा। शिष्यों ने पूरी कहानी कह सुनाई। बूढी औरत ने शिष्यों से कागज़ लिया और उठाने वाले सामान की सूची में गुरूजी का नाम लिख दिया। फिर शिष्यों ने गुरूजी को बहार निकला और सब वापस आश्रम चले गए।

जादुई चिड़िया

बहुत समय पहले, नीलगिरि पहाड़ियों के नीचे एक शंगरीला नाम का राज्य था। वहां का राजा – ऋषिराज बहुत दयालु और मेहनती राजा था जिसकी वजह से पूरे राज्य में खुशहाली थी। शंगरीला राज्य में एक कोकिला नाम की कोयल थी जो बहुत मधुर गीत गाने के लिए जानी जाती थी। नीलगिरि पहाड़ी के दूसरी तरफ दूसरा राज्य था जिसका नाम डोंगरीला था। डोंगरीला राज्य शंगरीला के बिलकुल विपरीत राज्य था , वह का राजा जगतगुरु बहुत ही स्वार्थी और ईर्ष्यालु राजा था।

एक बार जगतगुरु शंगरीला से हो कर गुज़रा और वहां की रौनक देख कर प्रसन्न हो गया। वापस आने के बाद जगतगुरु ने अपने प्रधान मंत्री ज्ञानदीप को बुलाया और शंगरीला की खुशाली का राज़ पता करने को कहा। ज्ञानदीप ने 10 दिन तक शंगरीला का भ्रमण किया और वापस आ कर जगत गुरु को बताया की शंगरीला की खुशहाली का राज़ एक कोयल है जो दिन रात सुरीला गाना गाती है। यह सुन कर जगतगुरु सोचने लगा की किस तरह उस कोयल को हासिल किया जाए। वह युद्ध नहीं कर सकता था क्योंकि शंगरीला की सेना बहुत ताकतवर थी। इसलिए उसने एक चाल सोची। जगतगुरु एक साधू बन कर शंगरीला के राजा ऋषिराज के महल में गया। साधु को आया देख कर ऋषिराज ने उसका खूब अतिथि सत्कार किया। अगले दिन वापस आने से पहले साधु के भेष में जगतगुरु ने ऋषिराज से कुछ दिनों के लिए कोकिला को अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। ऋषिराज को कोकिला दने की बिलकुल इच्छा नहीं थी पर साधु को मन करना उन्हें ठीक नहीं लगा और उन्होंने कोकिला को जगतगुरु के साथ जाने दिया। वापस आ कर जगत गुरु ने कोकिला को सोने के पिंजरे में दाल दिया और उसका गाना सुन ने का इंतज़ार करने लगा।

एक महीने बीता पर कोकिला के कंठ से आवाज़ नहीं निकली। जगतगुरु इसका समाधान पूछने अपने राज्य के एक तपस्वी प्रशांत बाबा के पास गया। वहां प्रशांत बाबा ने उसे समझाया की शंगरीला की खुशहाली का राज़ कोकिला नहीं बल्कि ऋषिराज का दयालु और मेहनती स्वभाव है। प्रशांत बाबा ने जगतसुरु से अपने स्वार्थी स्वाभाव को छोड़ कर कोकिला को वापस लौटाने की सलाह दी। जगतगुरु ने प्रशांत बाबा की बात मानी और कोकिला को ऋषिराज को वापस लौटा दिया। कुछ दिन बाद डोंगरीला भी समृद्ध और खुशहाल राज्य बन गया।

मिठाई की दूकान में मक्खी

गोपाल अपनी पत्नी के साथ दोपहर में आराम कर रहा था। पर उसके बेटे हरी को नींद नहीं आ रही थी। दरअसल हरी की स्कूल की छुट्टियां चल रहीं थी और उसके सारे दोस्त कहीं न कहीं घूमने चले गए थे। हरी घर में रहते रहते ऊब गया था। हरी ने अपनी माँ को जगाया और उनसे मिठाई खाने जाने के लिए पैसे मांगे। पर उसकी माँ उसकी बात टाल के फिर से सो गयी। हरी ने अपने पिता गोपाल से भी पैसे लेने की कोशिश करी पर निराशा ही हाथ लगी।

फिर हरी खुद ही घर से निकला और मिठाई की दूकान के सामने पहुँच गया। वह वहां खड़ा हो कर सोचने लगा की बिना पैसे के मिठाई कैसे खायी जाए। कुछ देर बाद उसने देखा की हलवाई दुकान अपने छोटे बेटे को सँभालने दे कर खुद सोने जा रहा है। यह देख कर हरी के दिमाग में एक तरकीब आयी। वह दूकान पर पहुंचा और मिठाई मांगने लगा। इस पर हलवाई के बेटे ने हरी से पैसे मांगे। हरी ने कहा की उसे मिठाई खाने के लिए पैसे देने की ज़रुरत नहीं है। हलवाई के बेटे को हरी की बात का यकीन न आया। हरी ने हलवाई के बेटे से कहा की की वह जाए और अपने पिताजी को बता आये की दुकान पर मिठाई खाने हरी आया है फिर देखते हैं वह क्या कहते हैं। हलवाई के बेटे ने ऐसा ही किया। हलवाई यह सुन कर भड़क गया की उसका बेटा उसे मक्खी के दूकान पर आने जैसी छोटी बात के लिए जगाने आ गया। उसने अपने बेटे को वहां डांट के भगा दिया। हलवाई के बेटे ने फिर हरी से कुछ न कहा। हरी ने मनपसंद मिठाई खायी और वहां से खिसक लिया।

शाम को गोपाल को हरी की हरकत का पता चला। एक तरफ गोपाल को अपने बेटे के तेज़ दिमाग पर आश्चर्य हुआ पर दूसरी तरफ उसे अपने बेटे के किसी की दूकान से इस तरह मुफ्त में खाने का दुःख भी हुआ। गोपाल ने हरी से वादा लिया की दोबारा वह ऐसा कभी नहीं करेगा। उसे जो भी चाहिए होगा वह अपने माता पिता को बताएगा।

शायरा की दिवाली

बहुत समय पहले की बात है जब देवी देवता इंसान मिलने धरती पर आते थे। एक गाँव में शायरा नाम की बच्ची अपनी माँ के साथ रहती थी। वह दोनों दूसरों के कपडे धो कर पैसे कमाते थे। शायरा सोच रही थी की इस बार दिवाली पर वह अपनी माँ को क्या उपहार देगी। तभी एक कौवा वहां उड़ता हुआ आया और अपनी चोंच से एक मोतियों का हार गिरा गया। शायरा खुश हो गयी की इस बार वह अपनी माँ को दिवाली पर हार देगी।

अगले दिन शायरा को पता चलता है की यह हार रानी का है और वह इसके खोने से बहुत परेशां है। शायरा मायूस हो गयी। पर आखरी में शायरा ने उस हार को रानी को वापस लौटाने का निर्णय लिया और राजमहल की तरफ चल पड़ी। रानी अपना हार वापस पा कर बहुत खुश हुई और उसने बदले में शायरा की कोई एक इच्छा पूरी करने का वादा किया। शायरा ने रानी से कहा की दिवाली वाली रात को पूरे गाँव में तक तक अँधेरा रखा जाए जब तक वह एक आतिशबाजी कर के इशारा न दे। उसके बाद सब रौशनी कर सकते हैं।

रानी ने शायरा की बात मान कर पूरे गाँव में घोषणा करा दी। दिवाली वाली रात को पूरे गाँव में अँधेरा था सिर्फ शायरा के घर में दिए जल रहे थे। तभी शायरा के घर में दरवाज़ा खटका। शायरा ने दरवाज़ा खोला और उसे जैसी उम्मीद थी उसने सामने देवी लक्ष्मी को खड़ा पाया। देवी लक्ष्मी ने शायरा और उसके परिवार को हमेशा धनवान रहने आशीर्वाद दिया अंतर्ध्यान हो गयीं। इसके बाद शायरा ने आतिशबाजी चला के सब को अपने अपने घर रोशन कर लेने का इशारा दिया

दावत
यह एक दक्षिण भारतीय लोक कथा है |

एक बार सूरज, पवन और चन्द्रमा अपने चाचा-चाची बिजली और तूफ़ान के घर दावत खाने गए थे। उनकी माँ, जो दूर सितारों में से एक थी , अपने बच्चों का वापस आने का इंतज़ार कर रही थी। दावत में, तरह तरह के पकवान थे। सूरज और पवन ने जम के दावत के मज़े उड़ाए। पर चन्द्रमा को अपनी अकेली माँ का ध्यान था इसलिए उसने खाने के साथ साथ थोड़े से पकवान माँ के लिए भी रख लिए।

घर वापस आने पर जब माँ ने अपने बच्चों से पूछा की वह उसके लिए क्या लाये तो सूरज और पवन बोले की हम दावत खाने गए थे, आप के लिए कुछ लाने नहीं। तभी चन्द्रमा ने अपनी माँ से कहा की आप थाली ले कर आइये में आप के लिए बहुत से व्यंजन ले कर आया हूँ। यह सुन कर सितारा माँ खुश हो गयीं। पर वह सूरज और पवन के स्वार्थी व्यवहार से नाराज़ भी थीं इसलिए उन्होंने दोनों को श्राप दिया की गर्मी में धरती पर रहने वाले लोग सूरज और पवन का मुँह भी देखना पसंद नहीं करेंगे। वहीँ उन्होंने चन्द्रमा को आशीर्वाद देते हुए कहा की उसे देख कर लोगों को राहत मिलेगी। आज भी गर्मी में सूरज और पवन यानी गरम लू से लोग बचते हैं लेकिन शांत शीतल चन्द्रमा को देख कर उन्हें सुकून मिलता है।

शनि देव का आशीर्वाद
यह बच्चों के लिए एक दक्षिण भारतीय लोक कथा है |

एक छोटे से कस्बे में एक गरीब ब्राह्मण अपनी 3 बेटियों के साथ रहता था। वह लोग खेती कर के अपना जीवन बिताते थे। एक बार सावन के शनिवार को, ब्राह्मण सुबह जल्दी उठा और अपनी सब से छोटी बेटी से खाना बना के रखने का बोल कर अपनी दोनों बड़ी बेटियों के साथ खेत पर निकल गया। ब्राह्मण के जाने के बाद शनि देव वहां भिखारी के भेष में आये और छोटी बेटी से नहाने का पानी, थोड़ा तेल और कुछ खाने को माँगा। छोटी बेटी ने जो कुछ शनि देव ने माँगा वह सब उन्हें दे दे दिया। शनि देव ने प्रसन्न हो कर ब्राह्मण का घर खाने के सामान से भर दिया और जिन पत्तलों में खाना खाया उन्हें मोड़ कर छत में फंसा कर चले गए। ब्राह्मण वापस आया तो वह बहुत खुश हुआ।

अगले 2 शनिवार को किसान की बड़ी बेटियां बरी बरी से घर पर रुकी। पर दोनों ने ही भेष बदल कर आये शनि देव को खाली हाथ लौटा दिया। इस पर शनि देव नाराज़ हुए और उनके श्राप से ब्राह्मण के घर जो कुछ था वह भी खाली हो गया। ब्राह्मण को जब यह बात पता चली तो उसे अपनी दोनों बड़ी बेटियां पर बहुत गुस्सा आया। अगले शनिवार को वह फिर से अपनी सब से छोटी बेटी को घर में छोड़ कर गया। शनि देव भिखारी के भेष में आये और उन्होंने जो जो माँगा छोटी बेटी ने उन्हें दे दिया। शनि देव ने प्रसन्न हो कर ब्राह्मण का घर फिर से खाने के सामान से भर दिया। ब्राह्मण ने अपनी दोनों बेटियों के साथ मिल कर शनि देव से मांफी मांगी और जब छत पर उस जगह जा कर देखा जहाँ शनि देव खाने के बाद पत्तल रखते थे तो वहां उन्हें हीरे जवाहरात मिले। ब्राह्मण की सारी गरीबी दूर हो गयी और वह ख़ुशी ख़ुशी रहने लगा।

नियति का फेर

सुबह उठते ही फिर वही शोर शराबा सुनाई दिया। पड़ोस के घर में हीरा अपनी ९० वर्षीय माँ को भला बुरा सुना रहा था|
”आज फिर से लघुशंका बिस्तर में इतनी ठण्ड है, कौन धोएगा, कहाँ सूखेगा तुम्हे तो कुछ करना नहीं माँ बस बैठ के तमाशा भर देखना है, हमें तो पूरा दिन खटना होता है”
हीरा बराबर बोले जा रहा था। ये भी नहीं के माँ को कम से कम सूखे में तो कर देता आखिर इसी माँ ने ही सर्द की रात में खुद गीले को अपना कर इसे सूखे बिस्तर पर सुलाया था | माँ चुपचाप बिस्तर में पड़ी सब सुने जा रही थी क्या करती और कोई विकल्प भी तो नहीं था,बस अपनी किस्मत को कोसती रहती थी |
हीरा बराबर डांट, फटकार की बौछार किये जा रहा था कि, तभी अचानक से उसकी पत्नी की उससे भी बुलंद आवाज़ आयी …
ये लो संभालो अपनी माँ को मैंने कहा था कि, रात में इन्हें खाने को रोटी मत ही दो, लेकिन तुम्हारा मातृप्रेम जाग उठता है न, लो कर दी हैं दीर्घ शंका धोती में, पूरा गंध मचा के रख दी हैं, मेरे बस का नहीं है अब ये नरक साफ़ करना, तुमने खिलाया है तुम्ही धोओगे ले जाकर |
हीरा का क्रोध था के सातवें आसमान पर चला गया अब तो जो उचित वो भी जो नहीं वो भी खूब खरी खोटी सुनायी माँ को|
जैसे ही वह माँ के पास पहुँचा सफाई के लिए, माँ टूटे फूटे शब्दों में बोलीं- बेटा मैं बहुत देर से आवाज़ लगा रही थी तुम सब सोए हुए थे , मैंने नीचे उतरने की बहुत कोशिश करी थी पर उतर नहीं पाई और बिस्तर पर ही ….. कहते हुए सुबक सुबक के किसी बच्चे की तरह रो पड़ीं।
२ वर्ष पूर्व की बात है। हीरा की माँ लकवा से ग्रसित होने के बाद चलने फिरने में असमर्थ हो गयी थी | उन्हें उठने बैठने के लिए भी किसीके सहारे की ज़रूरत पड़ती थी |अब वह पूरी तरह बहू बेटे पर ही आश्रित हो चुकी थीं| एक पोता है, श्रेयश जो बड़े शहर में ऊँचे पद पर अधीनस्थ है। ऊँचा पद और बार बार के तबादले के चलते वह घर कम ही आता, पर दादी से उसे बड़ा स्नेह है दादी की तीमारदारी और ज़रूरत की चीजें वह वक्त से पहले ही पहुँचा दिया करता है| घर का सारा खर्चा भी लगभग उसी ने सम्भाल रखा है|
पर उमर भर अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने वाली सावित्री जी के ये दिन काटे नहीं कट रहे थे |दिन रात प्रभु से प्रार्थना करती कि, हाथ पैर से तो हीन कर ही दिया है जैसे तैसे अब ये साँसें भी ले लेते तो उद्धार हो जाता।

एक दिन हीरा सपत्निक किसी रिश्तेदार के यहाँ माँ को इसी हालत में अकेला छोड़ कर चला गया। हीरा की पत्नी सफाई के चलते सावित्री जी की खटिया घर के बाहर टिन की छप्पर के नीचे ही लगाती थी| आज भी यही किया बस जाते वक्त उनकी सुरक्षा के हेतु एक और खटिया उनके सिराहने पर लगा दी थी ताकि कोई कुत्ता बिल्ली करीब न आए|
सावत्री जी का दुर्भाग्य कहें या इत्तेफाक ,उसी दिन अचानक रात में जोर की आँधी आयी जिसका वेग वास्तव में भयंकर था। इस आंधी ने सावित्री जी के सर की फूस से बनी छत भी उड़ा के दूर फेंक दी| जाने क्या हुआ और कैसे पता नहीं? पर सुबह वह सड़क के किनारे राहगीरों को बेहोश पड़ी मिलीं| आस पास वाले खबर लगते ही उन्हें उठाकर अपने घर ले गये| उनकी उचित तीमारदारी की | और उनके पोते को फोन करके बुलवा लिया|
पोते ने जब दादी की ये हालत देखी तो बहुत दुखी हुआ| अपने माँ पिता जी के इस कृत्य से वह बहुत ही आहत हुआ।
सावित्री जी ने जैसे ही अपने पोते को देखा उनके चेहरे पर एक सुकून सा नज़र आया, मानो उन्हें अब किसी से कोई शिकायत न थी बस सिराहने बैठे पोते की गोद में अपना सर रख लीं, और सर पर फिरते पोते के स्नेह भरे हांथों के सहारे अपनी आँखें मूँद लीं| जैसे इसी गोद का इन्तजार था उन्हें स्वयं को इस काया से मुक्ति दिलाने के लिए|
सावित्री जी नहीं रही…; ये खबर सुनके हीरा और उनकी पत्नी भागे हुए आये,और घड़ियाली आंसू बेटे के सामने निकालने लगे| पहले से ही आहत हुआ बेटा उन्हें फूटी आँख भी न देख पाया और ये बोलकर वहाँ से चले जाने के लिए कहा कि, अब उन्हें दादी को छूने तो क्या उनके लिए आंसू भी बहाने का हक नहीं है और साथ में यही उम्मीद अपने बेटे के लिए भी साथ लेते हुए जाएं|
वक्त पंख लगा के उड़ता गया किन्तु पदचिन्ह भी साथ में छोड़ता गया| अब हीरा के दिन पहाड़ जैसे कट रहे थे| हीरा टीबी रोग से ग्रसित हो चुका था। लोग उसके पास बैठना भी पसंद नहीं करते थे। यहाँ तक कि, उसकी पत्नी भी उससे सौतेला व्यवहार करने लगी।रोटी तक भी उसे दूर से फेंक कर देती थी। घर की किसी भी वस्तु को छूने न देती और यदि इत्तेफाक से छू भी गया तो वह उसे दसियों बार पानी से धोती पोंछती। साथ में झिड़कती अलग से ।
हीरा की आँखों में पश्चाताप के आँसू भर आते। वह उन दिनों को याद करता जब छोटा था तो उसे खाज हो गया था सबने माँ को हिदायत दी थी कि, सावधानी बरतें और हीरा से साफ सफाई के साथ उचित दूरी बना के रखे । पर माँ ने सबकी बातों को नजरअंदाज करते हुए हीरा को पल भर भी खुद से अलग नहीं किया बल्कि उसका मानना था कि हीरा जितना उनके करीब रहेगा उतनी ही जल्दी स्वस्थ होगा।
दादी का अंतिम संस्कार करने के बाद श्रेयस तो अपने गंतव्य को चला गया था।अपनी गृहस्थी भी अपने हिसाब से वहीं जमा ली, उसने दुबारा अपने घर मुड़कर देखने की कोशिश भी नहीं की| हाँ बस इतना ज़रूर करता कि, हर महीने अपने माँ बाप को खर्चा और आवश्यक सामग्री भर भिजवा दिया करता था, वह स्वंय कभी घर की ओर मुड़कर नहीं देखा।
किन्तु उसे जब पिता की अवस्था का भान हुआ और माँ द्वारा उचित व्यवहार न किये जाने के चलते वह हीरा को अपने पास ले आया। क्योंकि , वह उनकी तरह बेरहम और इंसानियत से हीन नहीं था। उचित इलाज और बेहतर तीमारदारी से हीरा स्वस्थ होने लगा था। बेटे और बहू ने सेवा में कोई कमी न छोड़ी । उन्होंने पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का पूर्ण निर्वहन किया । पर आत्मग्लानि से भरा हीरा अपने ही बच्चों से नजर बचाता रहता। उसके मन मे यही खयाल आता के काश माँ एक बार आ जाती और वह स्वयं द्वारा किये कृत्यों की एक बार माफी भर माँग लेता । किंतु अब यह कत्तई सम्भव न था ।।

भले घर की औरतें

माननीय धुरेन्द्र जी के यहाँ बेटे के ब्याह की धूम थी। घर के भीतर हो या बाहर हर जगह जबरदस्त रौनक लगी हुई थी। इस रौनक और धुरेन्द्र जी के रुतबे में बहुगुणा वृद्धि करते हुए उनके दरवाजे पर शानदार चमचमाते मंच पर चन्द किशोरियों का नृत्य अलग ही शमा बाँधे हुए था। क्या प्रौढ़, क्या वृद्ध और क्या युवा सब के सब उन किशोरियों का नृत्य देख कर विह्वल हुए जा रहे थे। साथ ही उन पर बड़ी ही बेफिक्री से हजारों के नोट उड़ाए जा रहे थे।

इतना सब कुछ चहल पहल लेकिन क्या मजाल कि, उन नृत्यांगनाओं के अतिरिक्त कोई भी अन्य महिला वहाँ उपस्थित होती।

इतने में धुरेन्द्र जी के रिश्तेदारी में आयी हुई नववधू दरवाजे पर सजी महफ़िल से आकर्षित होकर वहीं दालान में खड़ी होकर इस रंगारंग कार्यक्रम का नजारा लेने लगी।
उसने शायद पहली बार ऐसा मंजर देखा था। उसे बड़ा अजीब लग रहा था जब अपनी बेटी से भी कम आयु की नृत्यांगना के ठुमकों पर लोग नोट उड़ा रहे थे।

तभी धुरेन्द्र जी वहाँ से गुजरते हैं और जोर से अपनी पत्नी को सम्बोधित करते हुए दहाड़ते हैं, अरे किसी ने इसे बताया नहीं क्या……? ये कोई कायदा होता है क्या भला…..? जाने किस देश से आई है कि, इसे इतना भी नहीं पता कि, ऐसे पुरुषों की सभा में ताक झाँक करना ये भले घर की औरतों को शोभा नहीं देता। औरत हैं तो मर्यादा में रहें…….

धुरेन्द्र जी लगातार दहाड़े जा रहे थे।
सहमी नववधू विचारों के प्रश्नवाचक घेरे में घिर गयी और मर्यादा के अदृश्य बन्धन में जकड़ कर स्वयं के ही प्रश्नों के जाल में कसमसाने लगी।
भला कौन सी औरत को ये सब पर्दे में रखने को आतुर है..?
आखिर जिसके नृत्य के लिए सारा पुरुष समाज पगलाया हुआ है वो भी तो एक औरत ही है…?

सेठ और चोर:लोक कथा

किसी गाँव में एक मालदार सेठ था. जितना मालदार उतना ही चतुर और कंजूस. एक दिन शाम के वक़्त सेठ को शौच जाने की जरूरत महसूस हुई. उस जमाने में घरों में शौचालय तो होते नहीं थे सो सेठ ने पानी से भरा लोटा लिया और चल दिया खेत की ओर.

रास्ते में कुछ दूरी पर एक पेड़ के नीचे दो चोर खड़े नजर आये. चोरों ने सोचा कि चलो इस सेठ का लोटा छीन लेते हैं. जैसे ही चोर धीरे-धीरे सेठ की ओर बढ़े, वह चोरों के मनसूबे को ताड़ गया और तुरंत पानी फेंककर लोटे की ओर देखता हुआ बोला – “अरे ! आज यह कमबख्त फूटा हुआ टीन का लोटा कैसे आ गया ! मैं तो हमेशा चांदी का लोटा लाया करता हूँ. अभी वापस जाकर चांदी वाला लोटा लेकर आना पड़ेगा वरना मेरा तो पेट ही साफ़ नहीं होगा.”

इतना कहकर सेठ वापस घर की ओर लौट दिया. चोरों ने भी सोचा सेठ को चांदी का लोटा लेकर आने दो तभी छीनेंगे. लेकिन सेठ एक बार जो घर की ओर गया तो फिर नहीं लौटा.

चोर समझ गए कि सेठ चालाकी से निकल गया. लेकिन उन्होंने भी ठान लिया कि आज तो इस सेठ को लूटकर ही रहेंगे. वे चुपचाप आकर सेठ के घर के दरवाजे के बाहर छिपकर खड़े हो गए. सेठ ने यह देखने के लिए कि बाहर चोर तो नहीं हैं, जरा सा दरवाजा खोलकर बाहर झाँका तो पहले से तैयार खड़े चोरो ने उसकी मूंछे पकड़ लीं.

सेठ ने तत्काल सेठानी को आवाज लगाईं – “अरी ओ सुशीला की माँ, जल्दी से सौ रुपये लाना, चोर जी ने मूँछ पकड़ ली है तो वे सौ रुपये लेकर ही छोड़ देंगे, अगर कहीं नाक पकड़ ली तो फिर दौ सौ से कम में नहीं छोड़ेंगे.”

चोरों ने सोचा, मूंछ पकड़ने की अपेक्षा नाक पकड़ना फायदे का सौदा है. उन्होंने तुरंत मूँछ छोड़कर नाक पकडनी चाही लेकिन इससे पहले ही सेठ ने बड़ी फुर्ती से मुँह अन्दर कर के दरवाजा बंद कर लिया.

फिर अन्दर से व्यंग्यपूर्वक चोरों से बोला – “मूर्खो, मैंने तुम्हें आठ आने का फूटा हुआ लोटा नहीं दिया तो दौ सौ रुपये क्या दूंगा … चुपचाप यहाँ से चले जाओ, यहाँ तुम्हारी दाल नहीं गलने वाली !!”

बेचारे चोर अपना सिर पीटते हुए चले गए.

दो गज जमीन – लियो टॉलस्टॉय

एक बार रूस में दो बहनें रहती थीं. बड़ी बहन की शादी शहर में रहने वाले एक अमीर व्यापारी से हुई थी जबकि छोटी बहन की शादी गाँव में रहने वाले एक किसान से हुई थी.

एक बार बड़ी बहन अपनी छोटी बहन से मिलने उसके गाँव आई. फुर्सत के पलों में जब दोनों बहनें बतियाने बैठीं तो बड़ी बहिन अपनी अमीरी की शेखी बघारते हुए कहने लगी – “शहर में हम बड़े ठाठ से रहते हैं. बड़ा सा घर, बाग़ बगीचे, सुन्दर नए नए फैशन के कपड़े, खाने को ढेरों नए नए स्वाद वाली वस्तुएं, तमाशे, थिएटर, घूमने को बहुत सारी जगहें ! सच में बहुत आनंद आता है!! मैं तो कहती हूँ हमारा जीवन तुम्हारे इस गाँव के जीवन से बहुत बेहतर है.”

गाँव में रहने वाली छोटी बहन को बड़ी बहन की बात चुभ गई. वह भी अपने ग्रामीण जीवन की तारीफ करते हुए बोली – “ये सच है कि गाँव का जीवन उतना सुन्दर और स्वच्छ नहीं है जितना आपका शहर में है. हमें कहीं अधिक मेहनत करनी पड़ती है लेकिन हमारा जीवन शांत और सुरक्षित है. जमीन हमें हमेशा खाने को पर्याप्त दे देती है जबकि शहर में अमीर से गरीब होने में वक़्त नहीं लगता है. तुम्हारे पति को जुए और शराब की लत लग सकती है. उसे कोई प्रेमिका मिल सकती है. लेकिन गाँव में ऐसा कोई प्रलोभन नहीं है. मेरे पति मेहनतकश इंसान हैं और बुरी चीज़ों से दूर हैं.”

छोटी बहन का पति, जिसका नाम पखोम था, वहीं पास ही में ओसारे में लेटा हुआ था और दोनों बहनों की बातें सुन रहा था. वह अपनी पत्नी की बात सुनकर सोचने लगा कि उसकी पत्नी कुछ गलत नहीं कह रही है. गाँव का जीवन सचमुच शहर की तुलना में बेहतर है लेकिन उसके पास बस एक ही कमी है और वह है जमीन. अगर उसके पास थोड़ी और जमीन होती तो उसका जीवन और भी सुख शान्ति से भरा होता.

फिर एक दिन उसने सुना कि उसके इलाके का जमींदार अपनी जमीन किसानों को बेच रहा है. खुद उसका पडोसी पचास एकड़ जमीन का सौदा करके आया था. पखोम ने अपनी पत्नी से कहा – “देखो हमारा पडोसी जमींदार से जमीन खरीद रहा है. हमें भी कुछ जमीन खरीदनी चाहिए.”

अब उसने जमीन के लिए पैसों का इंतजाम शुरू किया. कुछ पैसे अपने साले से उधार लिए. अपने बेटे को दूसरे किसानों के यहाँ काम पर लगाकर वहां से पेशगी रुपये लिए और पच्चीस एकड़ जमीन का टुकड़ा खरीदने में कामयाब रहा जिसपर भोजपत्र के पेड़ों का एक छोटा सा झुरमुट था.

अब पखोम बहुत खुश था. इस बार उसके यहाँ भरपूर फसल हुई जिससे उसने अपना सारा कर्जा चुका दिया. अब उसके घर में शान्ति और ख़ुशी का माहौल था.

लेकिन ये माहौल ज्यादा दिन नहीं टिक सका. अक्सर पड़ोसियों की गायें उसके खेतों में आ जाती थीं और फसलों को नुक्सान पहुंचाती थीं. उसने किसानों से अपने मवेशियों को रोकने के लिए कहा लेकिन ज्यादातर ने सुना-अनसुना कर दिया. एक दिन वह जुर्माना भरने के लिए अपने दो पड़ोसियों को अदालत में खींच ले गया. नतीजा ये हुआ कि पडोसी नाराज हो गए.

एक दिन सुबह पखोम ने पाया कि किसी नाराज़ पडोसी ने उसके प्यारे भोजपत्र के पेड़ों को काट डाला है. इस घटना ने उसे बहुत दुखी कर दिया. उसका शक़ अपने एक पडोसी साइमन पर गया और वह उसके खिलाफ अदालत में पहुँच गया. लेकिन उसके पास कोई पुख्ता सबूत नहीं था इसलिए जजों ने साइमन को छोड़ दिया. इससे पखोम को इतना गुस्सा आया कि वह जजों को ही भला बुरा कहने लगा. कुल मिलाकर पखोम के लिए गाँव में रहना काफी अप्रिय और दूभर हो गया.

एक रोज, एक यात्री किसान ने रात बिताने के लिए पखोम के घर में जगह मांगी. पखोम ने उसका स्वागत किया. रात्रि-भोजन के दौरान किसान ने पखोम से कहा – “मैं लोअर वोल्गा से आया हूँ. वहाँ बहुत अच्छी जमीन है और सस्ती भी. मेरे गाँव के बहुत से लोग वहीं जाकर बस गए हैं और अमीर हो गए हैं. “

किसान की बात सुनकर पखोम ने सोचा कि मैं यहाँ गरीबी में क्यों रहूं. क्यों न वोल्गा में बसकर मैं भी अपनी स्थिति बेहतर कर लूं. और उसने एक बार वोल्गा जाकर वस्तुस्थिति का पता लगाने का निश्चय कर लिया.

अगले पतझड़ में पखोम वोल्गा में था. उसके घर रुकने वाले अजनबी किसान ने जैसा बताया था, वहाँ सब वैसा ही था. बहुत अच्छी और सस्ती जमीन थी.

पखोम ख़ुशी ख़ुशी घर लौटा. आकर अपनी सारी जमीन और संपत्ति बेचीं और बसंत ऋतु के आते आते अपने परिवार को लेकर हमेशा के लिए वोल्गा चला गया.

वोल्गा के किसानों की पंचायत ने पखोम का जोरदार स्वागत किया. जितने पैसे वह लाया था उतने में उसे पहले के मुकाबले पांच गुना अधिक जमीन मिल गयी. अर्थात अब वह 125 एकड़ जमीन का मालिक बन गया था. उसने वहीं अपना घर बनाया, बैल खरीदे और खेती करना शुरू कर दिया.

सबकुछ पहले के मुकाबले अच्छा चल रहा था लेकिन कुछ ही समय बाद पखोम एक बार फिर से खुद को असंतुष्ट अनुभव करने लगा.

बात दरअसल यह थी कि पखोम के खेत इकट्ठे नहीं थे वे दूर दूर फैले हुए थे. उसे एक खेत से दूसरे खेत जाने में कठिनाई होती थी. उसने दूसरे अमीर किसानों को देखा था जिनके खेत इकट्ठे थे और वे अपने खेतों के बीच मकान बनाकर आराम से रहते थे और खेती करते थे.

उसने सोचा कि अगर मैं भी ऐसी ही इकट्ठी जमीन खरीद सकूँ और उसमें अपना मकान बनाकर रह सकूँ तो जीवन में चैन आये. संयोग से उसे एक किसान मिल गया जो अपनी बारह सौ एकड़ जमीन एक हजार रूबल में बेचने को तैयार था. पखोम ने उस किसान से जमीन की बात कर ली और रुपयों का इंतजाम भी कर लिया लेकिन इससे पहले कि सौदा हो पाता, एक अजनबी व्यापारी रात बिताने के लिए पखोम के घर रुकने आ गया…

रात को बातचीत के दौरान व्यापारी ने बताया – “मैं बहुत दूर बश्किर प्रदेश से आया हूँ. वहाँ के लोग बहुत ही अच्छे और मिलनसार हैं. उनके पास इतनी जमीनें हैं कि उन्होंने मुझे मात्र एक हजार रूबल में बारह हजार एकड़ जमीन बेच दी. इतनी सस्ती जमीन धरती पर शायद ही कहीं मिले. और जमीन भी कैसी, एकदम सोना उगलने वाली उपजाऊ, जिसके बगल में ही नदी बहती है.”

व्यापारी की बात सुनकर पखोम ने सोचा कि मैं यहाँ बारह सौ एकड़ के लिए एक हजार रूबल क्यों दूँ जब मुझे इतने ही पैसों में दस गुना ज्यादा जमीन मिल सकती है. उसने जमीन का सौदा स्थगित किया और व्यापारी की बातों की सच्चाई पता लगाने के लिए बश्किर देश जाने का निश्चय कर लिया.

अपने परिवार को वहीं छोड़ और एक विश्वस्त नौकर को साथ लेकर पखोम बश्किर देश की ओर निकल पड़ा. रास्ते में पड़ने वाले एक शहर से उसने बश्किर वासियों के लिए कुछ उपहार खरीदे और कुछ दिनों में वहाँ पहुँच गया.

व्यापारी ने जैसा बताया था, बश्किर को उसने उससे बढ़कर ही पाया. वहाँ के लोग बड़े खुशमिजाज और लापरवाह किस्म के थे. उन्होंने पखोम का बड़े ही दोस्ताना ढंग से स्वागत किया. पखोम ने भी साथ लाये उपहार उन लोगों को बांटे.

रात में उन लोगों ने पखोम को एक आरामदायक तम्बू में ठहराया और पूछा – “आप इतनी दूर से आये हैं, बताइये हम आपके लिए क्या कर सकते हैं ?”

पखोम ने कहा – “मैं यहाँ आप लोगों से जमीन खरीदना चाहता हूँ. मेरे गाँव की मिटटी खराब हो गई है अब उपजाऊ नहीं रही. और जमीन भी मेरे हिसाब से बहुत कम है.”

बश्किरों ने कहा – “हम आपको जितनी चाहिए उतनी जमीन दे देंगे लेकिन इसके लिए हमारे सरदार की अनुमति आवश्यक होगी. वो आते ही होंगे, उनसे पूछकर ही हम कोई जवाब दे सकते हैं.”

तभी सिर पर फर की टोपी पहने एक बुजुर्ग व्यक्ति वहाँ पहुंचा. वही सरदार था. उसने कहा – “अगर आपको जमीन चाहिए तो जितनी चाहिए ले सकते हैं. हमारे पास काफी जमीन है.”

पखोम ने खुश होते हुए सरदार को धन्यवाद दिया और कीमत के बारे में पूछा. सरदार ने कहा – “हमारी एक ही कीमत है. एक दिन का एक हजार रूबल.”

पखोम को कुछ समझ में नहीं आया. उसने पूछा – “एक दिन का एक हजार रूबल ? भला दिन का जमीन की कीमत से क्या ताल्लुक ?”

सरदार ने समझाया – “तुम्हारे पास वो सारी जमीन हो सकती हो जितनी तुम एक दिन में पैदल चलकर घेर सकते हो. उसकी कीमत होगी एक हजार रूबल.”

इस अजीबोगरीब बात से हैरान पखोम ने कहा – “लेकिन एक दिन में तो मैं जमीन के बहुत बड़े टुकड़े पर घूम सकता हूँ … तो क्या वो सारी मेरी हो जायेगी.”

“बिलकुल …”, सरदार ने कहा. “लेकिन शर्त ये होगी कि जहां से तुम चलना शुरू करोगे, तुम्हें शाम होने से पहले उसी स्थान पर वापस आना होगा. अगर नहीं आ सके तो तुम्हारे एक हजार रूबल जप्त हो जायेंगे और जमीन भी नहीं मिलेगी.”

पखोम को लगा कि जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो. उसने तुरंत सौदे के लिए हामी भर दी और तय किया कि वह अगली सुबह जमीन पर घूमने के लिए निकलेगा.

उस रात पखोम सो नहीं सका. वह हिसाब लगाता रहा कि गर्मी के एक लम्बे दिन वह पचास मील तो चल ही सकता है. फिर वह सोचने लगा कि इतनी बड़ी जमीन में कुछ खराब जमीन भी हो सकती है. ऐसी जमीन को वह बटाई पर दे देगा और अच्छी जमीन पर खुद खेती करेगा. खेती के लिए कितने जोड़ी बैल लगेंगे कितने नौकर रखने होंगे आदि सोचते हुए भोर के ठीक पहले उसकी आँख झपक गई.

नींद में उसने सपना देखा. उसने देखा कि बश्किरों का सरदार तम्बू के बाहर बैठा जोर जोर से हंस रहा था. पखोम उसके पास जाकर पूछता है – “आप किस पर हंस रहे हैं ?”. तभी पखोम को वहाँ एक व्यापारी बैठा दिखाई देता है. वह व्यापारी के पास जाकर पूछता है – “आप यहाँ कब से हैं ?”. तभी व्यापारी वोल्गा के किसान में बदल जाता है.

पखोम इधर – उधर देखता है तो use एक लाश पड़ी दिखाई देती है. वो डरते-डरते उस लाश के पास जाता है. देखता है कि ये लाश तो उसी की है. पखोम की. और उसकी आँख खुल जाती है. वह तुरंत खड़ा हुआ और अपने दुःस्वप्न को भूलने की कोशिश करते हुए उसने अपने नौकर और बश्किरों को जगाया और कहा – “चलो, चलते हैं. अब मेरे जमीन पर घूमने का समय हो गया. सूरज जल्द ही उगने वाला है.”

बश्किर लोग पखोम को लेकर एक पहाड़ी के पास गए. बुजुर्ग सरदार ने कहा – “यह सारी जमीन हमारी है. आप इसमें से जितना बड़ा टुकड़ा चाहें उतना ले सकते हैं. “

फिर उसने अपनी फर की टोपी उतार कर जमीन पर रख दी और बोला – “यह आपका निशान है. आपको यहाँ से चलना आरम्भ करना है और शाम होने तक यहीं वापस आना है. जितनी जमीन पर आप चलेंगे वो जमीन आपकी होगी. याद रखिये, यदि आप सूर्यास्त तक इस जगह पर वापस नहीं लौटे तो आप सौदा खो देंगे.”

पखोम ने अपना पैसा टोपी में रख दिया और जैसे ही सूरज की पहली किरण दिखाई दी, पूरब दिशा की ओर चल पड़ा. उसके कंधे पर एक फावड़ा था जमीन पर अपने घूमने के निशान बनाने के लिए. वह चलता रहा, चलता रहा और जगह जगह पर निशान बनाता रहा.

जितना जितना पखोम आगे बढ़ता जाता था, जमीन और और सुन्दर और अच्छी दिखाई देती जाती थी. पखोम ने सोचा कि अभी लौटने के लिए बहुत जल्दी है. अभी मैं और भी आगे तक जाकर अच्छी अच्छी जमीन अपने लिए सुरक्षित कर सकता हूँ. और वह और भी तेजी से आगे बढ़ने लगा.

सूरज सिर पर झुलसा रहा था और वह पसीने से तरबतर था. उसने पीछे मुड़कर देखा तो वह पहाड़ी, जहां से वह चला था, उसे मिटटी के एक ढेले के समान छोटी सी दिखाई दी. वह मुड़ा ताकि अपनी जमीन को चौकोर कर सके. भूख लगने लगी थी. उसने जल्दी जल्दी थोडा सा खाया और फिर से चल दिया. अब उसका शरीर बुरी तरह थक चुका था लेकिन वह आराम करने की बिलकुल नहीं सोच रहा था.

अब उसे अपनी जमीन की तीसरी भुजा चलकर बनानी थी. लेकिन उसने देखा कि पहली दो भुजाएं वह कुछ ज्यादा ही लम्बी बना चूका है. अब उसे तीसरी भुजा छोटी बनानी होगी नहीं तो वह समय पर वापस नहीं पहुँच पायेगा.

अब सूर्यास्त का समय नजदीक आ रहा था. उसने अपनी चाल तेज कर दी. कुछ दूर तेज चलने के बाद उसने दौड़ना शुरू कर दिया क्योंकि सूर्य बड़ी तेजी से अस्ताचल की ओर जा रहा था. पखोम को घबराहट सी होने लगी. वह जल्दी से चौथी भुजा की ओर मुड़ा. अब उसके और शुरूआती बिंदु के बीच करीब पंद्रह मील की दूरी थी. उसने तेजी से दौड़ना शुरू कर दिया. सीधे पहाड़ी की ओर.

अब वो बेतहाशा दौड़ रहा था. टोपी अभी भी बहुत दूर थी और वो बहुत थक गया था. उसके पैरों में बहुत दर्द हो रहा था और वे छालों और खरोंचों से भर गए थे.

“मुझे और जल्दी करनी चाहिए”, उसने खुद से कहा, “मुझे इतनी दूर नहीं जाना चाहिए था अगर मैं समय पर नहीं पहुंचा तो मैं जमीन और पैसे दोनों खो दूंगा.” और एक आखिरी प्रयास के रूप में उसने अपनी पूरी शक्ति दौड़ने में झोंक दी.

अब उसे लगने लगा कि वह समय पर नहीं पहुँच पायेगा. उसे इतनी दूर नहीं जाना चाहिए था. फिर भी वह पूरी शक्ति से दौड़ा जा रहा था. वह पहाड़ी की तलहटी में पहुँच चुका था. सूरज अस्ताचलगामी हो रहा था. टोपी अभी भी दिखाई नहीं दे रही थी.

अब उसे रोना आने लगा था. उसे लगा कि वह पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है. उसके हाथ से जमीन भी गई और पैसे भी. सहसा उसे बश्किरों की पुकारें सुनाई देने लगीं. वे टोपी के पास खड़े हाथ लहरा रहे थे और उसे प्रोत्साहित कर रहे थे.

पहाड़ी की छोटी पर सूरज अभी भी पूरी तरह से डूबा नहीं था. उसने एक बार फिर जोर लगाया. अपनी आखिरी ताक़त के साथ. उसने बुजुर्ग सरदार को देखा. वो हंस रहा था. और वो गिर पड़ा. फिर न उठ सका. लेकिन उसका हाथ टोपी तक पहुँचने में कामयाब रहा.

बश्किर लोग जोर से चिल्लाये – “तुमने अच्छा किया … तुमने बहुत सारी जमीन जीत ली है.” लेकिन पखोम को कुछ भी सुनाई नहीं दिया.

पखोम का नौकर दौड़ा दौड़ा आया और उसने मालिक को उठाना चाहा लेकिन वह उठ न सका. उसके मुंह से खून निकल रहा था. वह मर चुका था….

नौकर ने फावड़ा लिया और अपने मालिक के लिए कब्र खोदी. कुल दो गज जमीन उसके लिए काफी हुई.

कप्तान साहब – मुंशी प्रेमचंद

जगत सिंह को स्कूल जाना कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता और अमरूदों के साथ माली की गालियाँ बड़े शौक से खाता। कभी दरिया की सैर करता और मल्लाहों की डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। गालियाँ खाने में उसे मजा आता था। गालियाँ खाने का कोई अवसर वह हाथ से न जाने देता। सवार के घोड़े के पीछे ताली बजाना, एक्कों को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के विषय थे। आलसी काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब अवसर मिलता, घर से रूपये उड़ा ले जाता। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच न होता था। घर में शीशियॉँ और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दी। पुराने दिनों की कितनी चीजें घर में पड़ी थीं, उसके मारे एक भी न बची। इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालों को आहट तक न मिली।

उसके पिता ठाकुर भक्त सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भक्तसिंह जिन इरादों से यहॉँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहाँ बंद हो गये। यहाँ सबसे पुराना घराँव थां, न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। उन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपके से मार खा लिया करता था। अगर वह अपने पिता के हाथ पकड़ लेता, तो वह हिल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हाँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का भी उस पर असर न होता था।

जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कांव-कांव मच जाती, माँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियाँ देने लगती; मानो घर में कोई साँड़ घुस आया हो। घर वाले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया थां कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहाँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जाता, वही खा लेता।

ज्यों-ज्यों घर वालों को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहाँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गांजे वाले ने धुआंधार तकाजे करने शुरू किये। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झाँक में रहता; पर घात न मिलती थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, तो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाय; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निकल पड़े तो वह बड़े संकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाय और अनजान में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसे भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया।

गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की ऑंखें में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुंदी होगी— इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पाँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा और वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने के लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकाल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हैं ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जायेंगे!

उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दाँव पर दस-दस रूपए रख देता है, नफा न होता, तो वह ठाट कहाँ से निभाता? इस आनन्द-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जायें ओर वह लहरों में बह जाय।

उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया।

2

बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था।

जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा—क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा—जगतसिंह?

‘क्या चाहते हो।‘

‘फौज में भरती कर लीजिए।‘

‘मरने से तो नहीं डरते?’

‘बिलकुल नहीं—राजपूत हूँ।‘

‘बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।‘

‘इसका भी डर नहीं।‘

‘अदन जाना पड़ेगा।‘

‘खुशी से जाऊँगा।‘

कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रहे जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सांस ली और मुँह ढाँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बार उसे प्रियजनों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गांजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहृद-मित्रों के जमघट आँखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार तो वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आया, पानी में कूद पड़े।

3

जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भाँति-भाँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिन पुराने संस्कार फिर जागृत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्ण हो रही थी, लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नैराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानि के कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगी। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ था। अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था—माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किये हैं, आप लोग मुझसे तंग आ गए थे, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आशीर्वाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।‘

यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। उसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता—कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आज वह विक्षिप्तों की भांति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बैठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया था। जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह काँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला और पत्र पढ़ा। लिखा था—‘तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पाँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।‘

जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कहा —‘हुजूर, मेरी माँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।‘

कप्तान ने कठोर आँखों से देखकर कहा—अभी छुट्टी नहीं मिल सकती।

‘तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।‘

‘अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।‘

‘मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।‘

‘रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाम पर जाना पड़ेगा।‘

‘लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहाँ से जायेंगे?’

‘बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।‘

4

चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस मुहिम में सबकी हिम्मतें जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्यौरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर और मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीवन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा—कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निकल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो!

लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है—दो-चार आंसू की बूँदें अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे?

5

सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता है, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल-पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मियाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाला था ही कौन?

एक बूढ़े किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसका कंधा हिलाया और बोला—कहो भगत, कोई घर से आया?

भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा—घर पर है ही कौन?

‘घर तो चलोगे ही?’

‘मेरे घर कहाँ है?’

‘तो क्या यही पड़े रहोंगे?’

‘अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।‘

आज चार साल के बाद भक्तसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीवन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य और दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लिया। न-जाने उस बेचारे की क्या दशा हुई ? लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का है। खानदान की निशानी तो है। मरूँगा, तो चार आंसू तो बहायेगा; दो चुल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं किया। जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भाँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मैंने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उसे तमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न किया उसी का दंड है। जहाँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहाँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है?

6

सबेरा हुआ। आशा का सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियाँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आशा के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर अंधकार था।

जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुल्लित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जाता, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बाँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे।

अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहाँ जायँ?

सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े होकर सलाम किया।

भक्तसिंह ने मन में कहा—एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं।

फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया।

भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले—अरे! बेटा जगतसिंह!

जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा।

दि कॉमेडी ऑफ एरर्स:विलियम शेक्सपियर

कभी दो पड़ोसी देश थे, जिनके नाम थे – साइरेकस और एफेसस। पड़ोसी होने के बावजूद दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेद थे और दोनों देशों के राजा आपस में कट्टर शत्रुता का भाव रखते थे। यहाँ तक कि नागरिकों को भी एक-दूसरे के देश में जाने की आज्ञा न थी। इसके लिए सख्त कानून बनाया गया था। इस कानून के मुताबिक यदि साइरेकस का कोई नागरिक एफेसस की सीमा में पकड़ा जाता था तो उसे एक हजार रुपये का जुर्माना भरना पड़ता था। जुर्माना न भरने की स्थिति में उस नागरिक को मृत्युदण्ड दिया जाता था। इस कानून के कारण लोग सीमा पार करते हुये डरते थे।

साइरेकस में एक व्यापारी था जिसका नाम था एजियन। एक बार एजियन एफेसस में घूमते हुये पकड़ा गया। एफेसस के कानून के मुताबिक उसे एक हजार रुपये जुर्माना भरना था किन्तु उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः अंतिम निर्णय के लिए उसे राजा के दरबार में प्रस्तुत किया गया।

“महाराज़, यह व्यक्ति साइरेकस का रहने वाला है और हमने इसे महल के पास घूमते हुये पकड़ा है। कानून के अनुसार हम इससे जुर्माना भरवाकर इसे छोड़ देते किन्तु इसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। अब आप ही फैसला कीजिये कि इसे क्या दण्ड दिया जाये ?” शहर कोतवाल ने राजा के सम्मुख निवेदन किया।

“तुम्हारा नाम क्या है ?” राजा ने एजियन से पूछा।

“एजियन,” उसने सपाट स्वर में जवाब दिया।

“तुमने हमारे देश में आने की हिम्मत कैसे की ? क्या तुम नहीं जानते थे कि साइरेकस के लोगों के एफेसस में आने पर सख्त प्रतिबंध है ?” राजा ने सख्त स्वर में पूछा।

“जी हाँ, मुझे यहाँ के कानून के बारे में पता था … ” एजियन ने उसी तरह बिना डरे जवाब दिया।

“फिर भी तुमने ऐसा दुस्साहस किया ? एजियन, अब हमारे कानून के अनुसार इस अपराध के लिए तुम या तो जुर्माने की रकम भरो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।” राजा ने फैसला सुनाते हुये कहा।

एजियन करुण स्वर में बोला, “महाराज, जुर्माना भरने के लिए न तो मेरे पास पैसे हैं और न ही मैं भरना चाहता हूँ। आप तो जितनी जल्दी हो सके मुझे मृत्युदण्ड दे दें ताकि मैं इस दुखी जीवन से मुक्त हो सकूँ। मैं और जीना नहीं चाहता हूँ। “

एजियन की बात सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब तक उसके सामने जितने भी अपराधी आए थे सभी किसी न किसी तरह बहाने बनाकर दण्ड से मुक्ति की प्रार्थना करते थे किन्तु एजियन ऐसा पहला व्यक्ति था जो खुद ही दण्ड देने की प्रार्थना कर रहा था। उसके चेहरे पर मृत्युदण्ड के भय का किसी भी प्रकार का कोई चिन्ह दिखाई न देता था।

आश्चर्यचकित राजा ने पूछा, “एजियन, ऐसी कौनसी बात है जिसके कारण तुम मृत्यु को गले लगाना चाहते हो ? मुझे बताओ, मैं तुम्हारे बारे में सबकुछ जानना चाहता हूँ।”

“महाराज, आप मेरे बारे में जानकर क्या करेंगे ? मेरी कहानी इतनी दुख भरी है कि उसे सुनकर आपका मन भी दुखी हो जाएगा। इसलिए आप तो बिना देरी किए मुझे दंडित करें।” एजियन पुनः दुखी स्वर में बोला।

अब तो राजा के मन में एजियन के बारे में जानने की इच्छा और भी तीव्र हो उठी। उसने दरबारियों की ओर देखा। वे सब भी एजियन की कहानी जानने को उत्सुक थे। उन्होने भी पहली बार ऐसा व्यक्ति देखा था जो अपने मुंह से अपने लिए मौत मांग रहा था। दरबारियों की मंशा भाँपकर राजा पुनः बोला, “एजियन, तुम निस्संकोच होकर अपनी बात कहो। तुम्हारी कहानी सुने बिना हम कदापि तुम्हें दंडित नहीं कर सकते। “

मजबूर होकर एजियन अपनी कहानी सुनाने लगा –

एजियन साइरेकस के एक धनी व्यापारी का पुत्र था। उसके पिता का व्यापार कई देशों में फैला था। पिता की मृत्यु के बाद एजियन ने उनका सारा व्यापार संभाल लिया। एक बार व्यापार के सिलसिले में उसे विदेश जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वह अपनी पत्नी को साथ लेकर माल से भरे जहाज के साथ अपिडैमनम नामक नगर में पहुँच गया। वह नगर उसे खूब रास आया। उसके जहाज का सारा माल जल्दी ही बिक गया और उसे खूब धन प्राप्त हुआ। उसने वापस अपने देश लौटने का विचार त्याग दिया और अपनी पत्नी के साथ वहीं रहने लगा।

कुछ समय पश्चात उसकी पत्नी ने दो जुड़वां बेटों को जन्म दिया। दोनों बच्चे आश्चर्यजनक ढंग से रूप, रंग और आकार में बिलकुल एक जैसे थे। उनमें अंतर करना एजियन और उसकी पत्नी के लिए भी बहुत कठिन था।

वहीं उनके पड़ोस में एक गरीब महिला रहती थी। जिस दिन एजियन के बेटों का जन्म हुआ उसी दिन उस गरीब महिला ने भी दो बेटों को जन्म दिया। संयोग से उसके बेटे भी रूप, रंग और आकार में एक समान थे।

वह महिला इतनी निर्धन थी कि पुत्रों के पालन-पोषण के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था। वह स्वयं के खाने का इंतजाम ही बड़ी मुश्किल से कर पाती थी, पुत्रों के भरण-पोषण का इंतजाम उसके लिए असंभव था। उसने एजियन से प्रार्थना की कि वह उसके पुत्रों को गोद ले ले ताकि वे भूख से न मरें। एजियन की पत्नी का दिल पिघल गया और उसके कहने पर एजियन ने उस गरीब महिला के दोनों पुत्रों को गोद ले लिया।

एजियन ने अपने दोनों पुत्रों का एक ही नाम रखा – एंटीफोलस। उसने गोद लिए दोनों बच्चों का नाम भी एक ही रखा – ड्रोमियो। इस प्रकार एजियन दोनों एंटीफोलस और दोनों ड्रोमियो का पालन-पोषण करने लगा।

एक बार एजियन को व्यापार के सिलसिले में फिर विदेश जाने का अवसर मिला। वह अपनी पत्नी और चारों बच्चों से बहुत प्रेम करता था इसलिए उसने उन्हें भी साथ ले लिया और जहाज पर सवार होकर दूसरे देश की यात्रा पर चल पड़ा।

उसका जहाज कई महीनों तक समुद्र में चलता रहा। एक दो दिन की यात्रा और शेष बची थी। एजियन खुश था कि जल्दी ही वह अपने जहाज का माल बेचकर वापस अपने देश चला जाएगा।

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किन्तु होनी को कुछ और ही मंजूर था। रात के समय समुद्र में भयंकर तूफान आया। एजियन का छोटा सा जहाज उस बलशाली तूफान का मुक़ाबला न कर सका और दो हिस्सों में टूट गया। जहाज के यात्री समझ गए कि जहाज डूबने वाला है इसलिए वे जल्दी-जल्दी जहाज पर अपने साथ लाई छोटी-छोटी नावें लेकर समुद्र में उतर गए। एजियन अपने परिवार के साथ जहाज में ही रह गया। किसी ने पीछे मुड़कर उनकी ओर देखना जरूरी नहीं समझा।

किसी तरह एजियन ने जल्दी से लकड़ी के दो तीन फट्टों को जोड़कर दो नावें तैयार कीं। एक नाव में उसने पत्नी के साथ एक एंटीफोलस और एक ड्रोमियों को बैठा दिया और दूसरी में खुद शेष दो बच्चों को लेकर सवार हो गया।

कुछ दूरी तक दोनों नावें साथ-साथ तैरती रहीं। किन्तु कुछ देर बाद तेज जलधाराओं के कारण दोनों नावें एक दूसरे से दूर जाने लगीं। एजियन की आँखों के सामने उसकी पत्नी और दो बच्चे उससे दूर बहे जा रहे थे और वह कुछ कर नहीं पा रहा था। तभी उसे पत्नी के नाव के पास एक बड़ी नाव दिखाई दी। उसने देखा कि नाव में सवार लोगों ने उसकी पत्नी और दोनों बच्चों को अपनी नाव में बैठा लिया है।

उन्हें सुरक्षित देखकर एजियन को असीम शांति का अनुभव हुआ। कुछ देर बाद उसे भी एक नाव ने उसके दोनों के बच्चों के साथ सुरक्षित बचा लिया।

परंतु उसके बाद वह अपनी पत्नी और उसके साथ गए दो बच्चों से बिछुड़ गया। उसने उन्हें ढूँढने का बहुत प्रयास किया परंतु निष्फल रहा।

समय धीरे-धीरे बीतता गया और साथ ही साथ एजियन की अपनी पत्नी और बिछुड़े बच्चों से मिलने की आशा धूमिल होती गई। उसने अपना ध्यान अपने साथ आए दोनों बच्चों पर केन्द्रित कर लिया। अब वे दोनों ही उसका परिवार थे।

समय के साथ एंटीफोलस और ड्रोमियो बड़े हो गए। एक दिन एंटीफोलस ने अपने पिता से अपनी माता के बारे में पूछा। एजियन अपने बेटों को अतीत में घटी घटनाओं के बारे में नहीं बताना चाहता था लेकिन बेटे जब जिद पर अड़ गए तो उसे बताना पड़ा।

पिता से सारी कहानी सुनने के बाद एंटीफोलस जोश में आकर बोला, “पिताजी, जब तक मैं अपनी माँ और दोनों भाइयों को ढूंढ नहीं लेता, मुझे चैन नहीं आएगा। आप मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं उन्हें ढूँढने में सफल हो सकूँ।”

एजियन, जो कि अपनी पत्नी और दो बच्चों को पहले ही खो चुका था, किसी भी तरह एंटीफोलस को अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता था किन्तु एंटीफोलस जिद पर अड़ गया। मजबूर होकर एजियन को अनुमति देनी पड़ी।

दूसरे ही दिन एंटीफोलस अपने साथ ड्रोमियो को लेकर अपनी माता और भाइयों की खोज में निकल पड़ा। एजियन घर पर रहकर उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।

लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी वे नहीं लौटे। एजियन के मन में रह-रह कर किसी अनहोनी की आशंका उठने लगी। जब उससे नहीं रहा गया तो वह भी बेटों को ढूँढने निकल पड़ा। ढूंढते-ढूंढते वह एफेसस देश में आ गया जहां सिपाही उसे पकड़कर राजा के सम्मुख ले आए।

एजियन की कहानी सुनने के बाद राजा का मन द्रवित हो उठा। दरबार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के मन में एजियन से सहानुभूति का भाव उमड़ आया। राजा अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुये बोला, “एजियन, मुझे दुख है कि ईश्वर ने तुमसे सबकुछ छीन लिया। किन्तु उसकी लीला हम मनुष्य कभी नहीं समझ सकते। हम सब उससे प्रार्थना करते हैं कि वह शीघ्र ही तुम्हें तुम्हारे परिवार से मिलाये। फिर भी, मैं कानून को नहीं बदल सकता। किन्तु राजा होने के नाते तुम्हें एक दिन की मोहलत दे सकता हूँ। इस एक दिन में तुम कहीं से भी जुर्माने की रकम का इंतज़ाम करो, उसके तुम आजाद हो।”

राजा का फैसला सुनकर एजियन को कोई खुशी नहीं हुई। यह शहर उसके लिए लिए बिलकुल अंजाना था। यहाँ वह एक दिन तो क्या, एक महीने में भी हजार रुपये इकट्ठे नहीं कर सकता था। यदि कोई दया करके उसके जुर्माने की रकम भर भी दे तो भी अपने परिवार के बिना उसे अपना जीवन व्यर्थ प्रतीत हो रहा था। उसने एक बार और अंतिम प्रयास करने का निश्चय किया। वह जुर्माने का इंतजाम करने की चिंता छोड़ एक बार फिर अपने बेटों को खोजने शहर की गलियों में निकल पड़ा।

उधर, सालों पहले एजियन की पत्नी और दो बच्चों को जिन नाविकों ने डूबने से बचाया था, वे एफेसस देश के इसी शहर के थे। वे अपने साथ उन्हें भी इसी शहर में ले आए थे। शहर के एक दयालु और धनवान आदमी ने दोनों बच्चों को गोद ले लिया था। उसने अपने पुत्रों की तरह उनका लालन-पालन किया, खूब पढ़ाया लिखाया और उनकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखा। जवान होने पर दोनों ही लड़के, अर्थात बड़े एंटीफोलस और ड्रोमियो, सेना में उच्च पदों पर नियुक्त हो गए। दोनों ने शहर की ही सुंदर और कुलीन लड़कियों से विवाह कर लिया और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्हें बिलकुल भी खबर नहीं थी कि उनके पिता और दो भाई भी इस दुनिया में जीवित हैं।

संयोग से, जिस दिन एजियन को बंदी बनाया गया, उसी दिन छोटे एंटीफोलस और ड्रोमियो भी भटकते-भटकते एफेसस के इसी नगर में आ पहुंचे। वहाँ उन्हें पता चला कि एफेसस में गैरकानूनी ढंग से घुसने के कारण एक व्यक्ति को पकड़ा गया है। उन्हें इस बात का सपने में भी भान नहीं था कि वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि उनका अपना पिता, एजियन है।

उन्हें इस शहर में अपनी माता और भाइयों की खोज करनी थी। इसलिए कुछ दिन यहाँ ठहरने का निश्चय करके वे एक सराय में पहुंचे। सराय के मालिक ने उनसे परिचय पूछा तो उन्होने खुद को एफेसस का ही नागरिक बताया। उसने उन्हें रहने के लिए सराय का एक कमरा दे दिया। कुछ देर बाद, एंटीफोलस ने आवश्यक सामान लाने के लिये ड्रोमियो को बाजार भेजा। ड्रोमियो के जाने के कुछ देर बाद वह भी बाज़ार में घूमने निकल पड़ा।

अभी वह सराय से थोड़ी ही दूर पहुंचा था कि उसे सामने से ड्रोमियो आता हुआ दिखाई पड़ा। वह तेज-तेज कदमों से चलता हुआ उसी की ओर आ रहा था। एंटीफोलस सोच में पड़ गया कि मैंने तो इसे बाजार से सामान लाने भेजा था, किन्तु यह इतनी जल्दी कैसे लौट आया ? फिर उसने गौर किया कि ड्रोमियो के हाथ तो खाली हैं। उसके हाथ में कोई भी सामान नहीं है।

इससे पहले कि एंटीफोलस ड्रोमियो से कुछ कहता, ड्रोमियो बड़ी नम्रता से एंटीफोलस से बोला, “कप्तान साहब, आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? चलिये, घर चलिये, आपकी पत्नी भोजन के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं।”

ड्रोमियो की अजीबोगरीब बातें सुनकर एंटीफोलस चौंका, फिर क्रोधपूर्वक बोला, “ड्रोमियो ! तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया ! ये कैसी अजीब बातें कर रहे हो ? जब मेरी शादी ही नहीं हुई तो किसकी पत्नी, कैसी पत्नी ? और तुम तो बाजार से सामान लाने गए थे लेकिन तुम्हारे हाथ खाली हैं। ये क्या मज़ाक है ?”

इस बार ड्रोमियो चौंकते हुये बोला, “मैं भला आपसे मज़ाक क्यों करूंगा, कप्तान साहब ! आपकी पत्नी भोजन के लिए बुला रही हैं तो कृपा करके घर चलिये। और आप किस सामान की बात कर रहे हैं ? आपने मुझसे कौनसा सामान लाने के लिए कहा था ?”

अब तो एंटीफोलस का गुस्सा और भी बढ़ गया, “अच्छा ! तो अब तुम्हें यह भी याद नहीं है कि मैंने तुम्हें क्या सामान लाने को कहा था ? मज़ाक की भी हद होती है, ड्रोमियो ! अब जाकर चुपचाप अपना काम निपटाओ, समझे। और ये बार बार पत्नी पत्नी क्या लगा रखा है ? मेरी कोई पत्नी नहीं है।”

दरअसल, वह बड़ा ड्रोमियो था, जो छोटे एंटीफोलस को बड़ा एंटीफोलस समझ रहा था। वहीं, छोटा एंटीफोलस, बड़े ड्रोमियो को छोटा ड्रोमियो समझकर डांट रहा था। इस प्रकार, दोनों ही एक दूसरे को गलत समझ रहे थे।

एंटीफोलस का अजीब बर्ताव देखकर ड्रोमियो सोचने लगा कि अवश्य ही कप्तान साहब अपनी पत्नी से लड़कर आए हैं, इसीलिए गुस्से में ऐसी बातें कर रहे हैं। लेकिन भाभी ने तो मुझे इन्हें घर लाने के लिए कहा है तो मैं इन्हें लेकर ही जाऊंगा। यह सोचकर वह बार-बार एंटीफोलस से घर चलने का आग्रह करने लगा।

ड्रोमियो के मुँह से बार – बार घर चलने की बात सुनकर आखिरकार एंटिफोलस चिढ़ गया और बोला, “लगता है, तेरा दिमाग सचमुच खराब हो गया है। तू जानता है कि मेरा विवाह नहीं हुआ है फिर भी बार – बार पत्नी – पत्नी की रट लगाए हुये है। चल, पहले उस लड़की से मिलता हूँ जिसे तू मेरी पत्नी बता रहा है। बाद में तुझे सीधा करूंगा।”

इतना कहकर वह ड्रोमियो के साथ चल पड़ा। रास्ते में वे भीड़-भाड़ भरे बाज़ार से होकर गुजरे। इस भीड़ में एंटिफोलस और ड्रोमियो अलग-अलग हो गए। एंटिफोलस ने इधर-उधर देखा तो ड्रोमियो कहीं दिखाई नहीं दिया। वह गुस्से में बड़बड़ाता हुआ आगे बढ्ने लगा तभी उससे छोटा ड्रोमियो आ टकराया। एंटिफोलस उसे डांटता हुआ बोला, “कहाँ गायब हो गया था भीड़ में मुझे छोडकर ? चल, कहाँ लेकर चल रहा है मुझे ?”

छोटे ड्रोमियो को कुछ समझ नहीं आया। वह पलकें झपकाता हुआ बोला, “क्या कह रहे हैं आप ? आपने ही तो मुझे सामान लाने बाज़ार भेजा था ? और आप सराय छोडकर यहाँ बाज़ार में क्या करने आए हैं ?”

एंटिफोलस के गुस्से का पारा और ऊपर चढ़ गया, “ड्रोमियो, सराय से तुम मुझे यह कहकर लाये हो कि मेरी पत्नी खाने के लिए मुझे बुला रही है । और अब तुम कह रहे हो कि तुम सामान लाने आए हो । ऐसा बेहूदा मज़ाक तुम मेरे साथ कैसे कर सकते हो ?”

“मैंने कब कहा कि आपकी पत्नी बुला रही है ? आपकी तो अभी शादी ही नहीं हुई तो पत्नी कहाँ से आई ? मुझे लगता है आपको कोई गलतफहमी हो गई है। ” छोटा ड्रोमियो आहिस्ते से बोला।

इधर ये दोनों आपस में बहस में उलझ रहे थे उधर कप्तान की पत्नी घर पर खाने की थाली सजाये कप्तान की प्रतीक्षा कर रही थी। वह परेशान थी कि ड्रोमियो अभी तक कप्तान साहब अर्थात बड़े एंटिफोलस को लेकर क्यों नहीं आया।

जब काफी देर हो गई तो वह स्वयं पति को खोजने निकल पड़ी।

बाजार में उसने छोटे एंटिफोलस और छोटे ड्रोमियो को आपस में बहस करते देखा। वह उसे अपना पति समझकर पास आई और बोली, “प्रिय, आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? मैं कब से खाने पर आपका इंतज़ार कर रही हूँ ? क्या आप मुझसे नाराज हैं जो बुलाने पर भी नहीं आ रहे ? चलिये, घर चलिये।”

एक अंजान युवती के मुख से अपने लिए ‘प्रिय’ सम्बोधन सुनकर एंटिफोलस चौंक पड़ा। यह उसके लिए असह्य था। वह क्रोध से भड़कते हुये बोला, “तुम कौन हो जो मुझे ‘प्रिय’ कहकर संबोधित कर रही हो ? मेरी कोई पत्नी नहीं है ।”

एंटिफोलस की मुखमुद्रा देखकर युवती पल भर के लिए हतप्रभ रह गई, फिर स्वयं को संयत करती हुई बोली, “ये सच है कि आप मेरे पति हैं। यदि आप किसी बात पर मुझसे नाराज हैं तो भी बाजार में इस तरह झगड़ना उचित नहीं है। अच्छा होगा, हम घर चलें और वहीं शांति से बात करें। चलो ड्रोमियो, तुम्हारी पत्नी भी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

एंटिफोलस की सोच को जैसे लकवा सा मार गया था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ यह सब क्या हो रहा है। यह युवती स्वयं को उसकी पत्नी बता रही है और ड्रोमियो को भी उसकी पत्नी के पास चलने के लिए कह रही है। यह सब हो क्या रहा है ? परदेश में यह कैसी मुसीबत उसके गले आन पड़ी है। वह सोच ही रहा था कि इससे पीछा कैसे छुड़ाया जाये तभी भीड़ में से एक आदमी बोला, “अरे साहब, क्यों घर की बातें बाज़ार में उछाल रहे हैं ? अगर पत्नी से कोई गलती हो गई है तो उसे घर जाकर समझा दें। आप जैसे पढे-लिखे लोगों को इस तरह की हरकतें शोभा देती हैं क्या ?”

भीड़ में से कई और लोगों ने भी उस आदमी की बात का समर्थन किया। स्थिति और विकट हो गई थी। अब तक तो केवल युवती ही उसके पीछे पड़ी थी, किन्तु अब राह चलते लोग भी उसके समर्थन में उतर आए थे। एंटिफोलस समझ गया कि यदि वह युवती के साथ नहीं गया तो मामला बिगड़ सकता है। वैसे भी वह ठहरा परदेसी। कहीं लेने के देने न पड़ जाएं। यही सोचकर वह युवती के साथ जाने को उद्यत हो गया।

युवती ने उसका हाथ पकड़ा और खींचते हुये घर की ओर ले चली। ड्रोमियो भी पीछे-पीछे आ रहा था।

घर पहुँचकर युवती ने बड़े प्यार से एंटिफोलस को खाने की टेबल पर बिताया और ड्रोमियो से बोली, “ड्रोमियो, जाओ तुम भी भीतर जाकर खाना खा लो, तुम्हारी पत्नी तुम्हारी राह देख रही होगी।”

यह कहकर वह एंटिफोलस के बगल में बैठ गई और प्यार भरी बातें करने लगी। एंटिफोलस हक्का-बक्का सा अनमने ढंग से खाने का कौर गले के नीचे उतारने लगा।

उधर, ड्रोमियो जैसे ही घर के भीतर पहुंचा, एक दूसरी युवती ‘प्रिय – प्रिय’ कहकर उसके गले से लिपट गई। छोटा ड्रोमियो छिटककर दूर खड़ा हो गया। युवती आश्चर्य प्रकट करती हुई बोली, “प्रिय, आज तुम्हें क्या हो गया है ? तुम तो ऐसे दूर खड़े हो गए जैसे तुमने किसी और की पत्नी को गले लगाया हो ? चलो अब खाना खा लो। “

बेचारा और करता भी क्या, चुपचाप बैठकर भोजन करने लगा।

जिस समय ये लोग घर के भीतर भोजन कर रहे थे, उसी समय बड़ा एंटिफोलस और बड़ा ड्रोमियो घर लौट आए और दरवाजा खटखटाने लगे। दरवाजा खुलने में देर हुई तो बड़ा एंटिफोलस बोला, “लगता है हम लोगों को आने में देर हो गई है इसलिए हमारी बीवियाँ हमसे नाराज हो गई हैं। चलो उन्हें खुश करने के लिए बाजार से कुछ उपहार ले आयें।”

ड्रोमियो ने सहमति में सिर हिलाया और वे दोनों दरवाजे से ही वापस फिर बाज़ार की ओर चले गए।

इधर, भोजन करने के बाद छोटा एंटिफोलस और छोटा ड्रोमियो वहाँ से निकल भागने की बात सोचने लगे। दोनों स्त्रियाँ जब गहरी नींद में सो गईं तो वे चुपके से वहाँ से निकल आए।

अभी छोटा एंटिफोलस थोड़ी दूर ही निकला था कि एक सुनार उससे टकरा गया। वह मुसकुराते हुये उसके पास आया और एक डिब्बा उसके हाथ में पकड़ाते हुये बोला, “लीजिये कप्तान साहब अपनी अमानत संभालिए। मैं इसे देने के लिए आपके घर ही जा रहा था। अच्छा हुआ आप यहीं मिल गए। ऐसा सुंदर सोने का हार आपको शहर में दूसरा नहीं मिलेगा। आप इसकी कीमत दुकान पर ही भिजवा देना। ” इतना कहकर सुनार चला गया।

एंटिफोलस डिब्बा हाथ में लिए हैरान सा खड़ा हुआ था। बार बार उसके दिमाग में सुबह से घटित होने वाली घटनाएँ घूम रहीं थीं। वह इस शहर में पहली बार आया था लेकिन यहाँ हर कोई उसके साथ ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे वह उसे वर्षों से जानता हो। यह सुनार भी इतना बेशकीमती हार उसे बिना जान पहचान के सौंपकर चला गया।

वह खड़ा-खड़ा सोच ही रहा था कि तभी वहाँ से एक वृद्धा गुजरी। एंटिफोलस को देखते ही वह आशीर्वाद देते हुये बोली, “बेटा, भगवान तुम्हें लंबी उम्र दे। आज तुम्हारे कारण ही मेरा बेटा निर्दोष साबित होकर छूटा है।”

वृद्धा के जाने के बाद एक युवक उसके पास आया और उससे परिचितों की तरह मिला। इतने में एक व्यक्ति ने आकर अपने पुत्र की शादी का निमंत्रण-पत्र उसके हाथ में दिया और परिवार सहित समारोह में आने का आग्रह किया। वह व्यक्ति अभी गया ही था कि एक और व्यक्ति ने आकर उसके हाथों में मुहरों से भरी एक थैली थमा दी और कृतज्ञता पूर्वक बोला, “कप्तान साहब, आपने समय पर मेरी मदद करके मुझे उबार लिया वरना मैं तो बर्बाद हो जाता। यह लीजिये, आपका धन स्वीकार कीजिये।”

यह सब क्या हो रहा था, एंटिफोलस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। दरअसल, बड़ा एंटिफोलस इसी शहर पला-बढ़ा था, इसलिए शहर के अधिकांश व्यक्ति उसे बहुत अच्छी तरह से जानते-पहचानते थे। छोटे एंटिफोलस की शक्ल हूबहू अपने भाई से मिलती थी इसलिए सभी उसे बड़ा एंटिफोलस अर्थात कप्तान साहब समझ रहे थे।

अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि एक लड़की उसके पास आकर बड़े दुलार से बोली, “भैया, आपने मेरा हार बनवा दिया ? लाइये, कहाँ है मेरा हार ? मैं कितनी बेचैनी से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी । अच्छा तो इस डिब्बे में है मेरा हार ?”

यह कहकर वह लड़की एंटिफोलस के हाथों से डिब्बा लेने लगी, तो एंटिफोलस अपने गुस्से को काबू न कर सका, लगभग चीखते हुये बोला, “मैं कल ही इस शहर में आया हूँ और एक ही दिन में यहाँ मेरे इतने रिश्तेदार पैदा हो गए ? कोई खुद को मेरी पत्नी बताती है तो कोई बहन ! सच-सच बताओ तुम कौन हो ? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम सब मिलकर मुझे ठगना चाहते हो ?”

यह कहकर एंटिफोलस वहाँ से तेजी से निकल गया। लड़की ने सोचा कि किसी सदमे के कारण उसका भाई उसे पहचान नहीं पा रहा है। वह उसी समय तेजी से घर की ओर भागी और एंटिफोलस की पत्नी से रोते-रोते बोली, “भाभी, भैया पागल हो गए हैं ? उन्होने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया।”

एंटिफोलस की पत्नी उसे धीरज बँधाती हुई बोली, “ये तुम क्या कह रही हो ? कहाँ मिले तुम्हें कप्तान साहब ? शायद तुम ठीक कह रही हो। आज उन्होने बाजार में मुझे भी पहचानने से इंकार कर दिया था। न जाने कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे थे ? बार-बार कह रहे थे कि मैं शहर में नया आया हूँ, तुम मुझे फँसाने की कोशिश कर रही हो ।”

लड़की बोली, “भैया अभी-अभी बाजार की ओर गए हैं । आप जल्दी से जाकर उन्हें घर ले आइये। कहीं पागलपन में कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठें ।”

कप्तान की पत्नी तुरंत बाजार की ओर भागी। उस समय बड़ा एंटिफोलस अर्थात कप्तान, सुनार की दुकान पर उपहार खरीदने पहुंचा। उसे ही सुनार बोला, “क्या बात है कप्तान साहब, कुछ और चाहिए क्या या फिर हार के पैसे चुकाने आए हैं ? इतनी भी क्या जल्दी थी ?”

यह सुनते ही बड़ा एंटिफोलस चौंका । आश्चर्य से बोला, “कौनसा हार ? मैंने तुमसे कौनसा हार लिया है ?”

सुनार बोला, “अरे साहब, इतनी जल्दी भूल गए ? अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैंने आपको सोने का हार दिया था ?”

“थोड़ी देर पहले ? क्या बात कर रहे हो तुम ?” बड़ा एंटिफोलस बोला, “आज यह हमारी पहली मुलाक़ात है। लगता है तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है।”

“कप्तान साहब, ऐसा मज़ाक अच्छा नहीं है। मैंने खुद अपने हाथों से आपको वह हार सौंपा है। ” सुनार उत्तेजित स्वर में बोला।

अब बड़े एंटिफोलस ने हार लिया हो तो वह स्वीकार करे ! दोनों में बहस होने लगी। कीमती हार का मामला था सो बात पुलिस तक पहुँच गई। थानेदार ने पकड़कर दोनों को हवालात में बंद कर दिया।

उधर कप्तान की पत्नी उसे खोजती हुई सुनार की दुकान पर पहुंची। वहाँ उसे पता चला कि उसके पति को पुलिस पकड़कर ले गई है। वह भागी-भागी थाने पहुंची और थानेदार से बोली, “मेरे पति बिलकुल निर्दोष हैं। वे कोई अपराध नहीं कर सकते। आज सुबह से वे अजीब सा व्यवहार कर रहे हैं। लगता है उन्हें पागलपन का दौरा पड़ा है। इसी वजह से उनसे कोई भूल हो गई होगी। आप उन्हें छोड़ दीजिये ताकि मैं उनका इलाज करवा सकूँ !”

थानेदार को उसकी बातों पर विश्वास हो गया और उसने कप्तान को छोड़ दिया। कप्तान की पत्नी उसे घर लेकर आई और नौकरों से बोली, “कप्तान साहब को तुरंत रस्सियों और जंजीरों से बांधकर एक कमरे में बंद कर दो। वे पागल हो गए हैं। मैं डॉक्टर को बुलाकर उनका इलाज करवाती हूँ।”

एंटिफोलस चिल्ला-चिल्लाकर कहता रहा कि वह पागल नहीं है किन्तु किसी ने उसकी एक न सुनी। उसे पकड़कर एक कमरे में बंद कर दिया गया और उसकी पत्नी डॉक्टर को लेने चली गई।

जब वह डॉक्टर को लेकर घर की ओर लौट रही थी तभी उसने बाजार में छोटे एंटिफोलस को देखा। उसने समझा कि उसका पति किसी तरह खुद छुड़ाकर भाग आया है।

वह तुरंत चिल्लाकर डॉक्टर से बोली, “डॉक्टर साहब, वे रहे मेरे पति,” फिर आवाज लगाती हुई एंटिफोलस की ओर दौड़ी, “कप्तान साहब, कप्तान साहब”।

छोटे एंटिफोलस ने यह आवाज सुनी और कप्तान की पत्नी को अपनी ओर भागते देखा। यह देखते ही उसके होश उड़ गए। वह समझ गया कि यह स्त्री फिर उसे अपने साथ अपने घर ले जाएगी। वह सिर पर पाँव रखकर वहाँ से भागने लगा।

उसे भागते देखकर कप्तान की पत्नी चिल्लाई, “पकड़ो उन्हें, भगवान के लिए कोई पकड़ो उन्हें ! वे पागल हैं !”

छोटा एंटिफोलस अपने लिए ‘पागल’ शब्द सुनकर और भी घबरा गया। वह और भी तेजी से भागा और जाकर एक मंदिर में जा छिपा। मंदिर में एक पुजारिन रहती थी। एंटिफोलस ने अपनी सारी कहानी उसे संक्षेप में बताई और कहा कि एक चालाक औरत जबर्दस्ती उसे अपना पति बनाकर अपने घर ले जाना चाहती है। वह पुजारिन के पैरों में गिर पड़ा और रोते हुये बोला, “माँ, उस दुष्ट औरत से मेरी रक्षा करो !”

‘माँ’ सम्बोधन सुनते ही पुजारिन के मन में प्रेम और ममता का सागर उमड़ आया। उसने एंटिफोलस के सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, “घबराओ नहीं बेटा, वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। तुम जाकर पासवाले कमरे में छिप जाओ। मैं सब संभाल लूँगी।”

छोटा एंटिफोलस दौड़कर साथ वाले कमरे में जा छिपा। तभी कप्तान की पत्नी मंदिर में आई और पुजारिन से कहने लगी, “माताजी, मेरे पति भागते हुये इसी तरफ आए हैं। आपने उन्हें जरूर देखा होगा। कृपया बताइये वे कहाँ हैं ? उनकी मानसिक दशा ठीक नहीं है। मैं उन्हें घर ले जाना चाहती हूँ।”

पुजारिन उसे समझाते हुये कहने लगी, “बेटी, वह तुम्हारा पति नहीं है। तुम्हें जरूर कोई गलतफहमी हुई है। मैं उसे तुम्हारे हवाले कदापि नहीं कर सकती। तुम यहाँ से चली जाओ।”

किन्तु कप्तान की पत्नी जिद पर अड़ गई कि वह अपने पति लिए बिना वहाँ से नहीं लौटेगी। उसने ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। उसका रोना सुनकर वहाँ भीड़ लगने लगी। लोग आपस में काना-फूसी करने लगे। अब तक कप्तान के पागल होने की बात पूरे नगर में फैल चुकी थी। एक तरह से सारे शहर में हड़कंप मच गया था।

उधर, राजा ने एजियन को जुर्माना अदा करने के लिए जो समय-सीमा दी थी वह समाप्त हो रही थी। वह जुर्माना नहीं भर पाया था इसलिए राजा ने उसे फांसी पर चढ़ाने का निश्चय कर लिया था। लेकिन उस देश का नियम था कि फांसी की सजा राजा की मौजूदगी में ही दी जाती थी। अतः राजा को फांसी के समय फाँसीघर में पहुंचना आवश्यक था।

संयोग से वह फाँसीघर, उस मंदिर के पास ही बना हुआ था, जहां पुजारिन और कप्तान की पत्नी के बीच विवाद चल रहा था। आसपास खड़ी भीड़ तमाशे का आनंद ले रही थी।

उधर, बड़ा एंटिफोलस, घर पर नौकरों को चकमा देकर भाग निकला था और नौकर उसका पीछा कर रहे थे। उनकी नजरों से बचने के लिए वह मंदिर के पास खड़ी उस तमाशबीन भीड़ में जा घुसा। तभी कप्तान की पत्नी की नजर उस पर पड़ गई। वह प्रसन्न होकर चिल्लाई, “मुझे मेरे पति मिल गए ! मुझे मेरे पति मिल गए !”

एंटिफोलस को देखकर पुजारिन भी चकित रह गई। उसने तो उसे कमरे में छिपाया था और दरवाजा बंद था, जिसके बाहर वह खड़ी हुई थी, फिर यह बाहर कैसे आ गया। वह हैरान-परेशान सी कमरे के भीतर गई तो छोटा एंटिफोलस वहाँ मौजूद था। वह उसे लेकर बाहर आ गई।

छोटे एंटिफोलस के बाहर आते आसपास खड़े लोग स्तब्ध रह गए। कप्तान की पत्नी कभी अपने पति को देखती तो कभी पुजारिन के साथ खड़े एंटिफोलस को। उसका चेहरा घबराहट और आश्चर्य के मारे पीला पड़ गया था। दो सर्वथा अपरिचित व्यक्तियों के रूप-रंग, चेहरे, कद-काठी हूबहू एक समान कैसे हो सकते हैं ? सभी लोग इन दोनों हमशकलों का रहस्य जानने को उत्सुक हो रहे थे किन्तु किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

तभी राजा का काफिला मंदिर के सामने से गुजरा। वे लोग एजियन को फाँसी चढ़ाने ले जा रहे थे। सबसे आगे कैदियों की वेषभूषा में एजियन चल रहा था। छोटे एंटिफोलस ने जब अपने पिता को देखा तो वह तुरंत पहचान गया और दौड़कर उनके गले लग गया। पुत्र को देखकर एजियन की आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली।

बड़ा एंटिफोलस अपनी पत्नी के साथ दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसने होश संभालने के बाद कभी अपने पिता को नहीं देखा था इसलिए उसके द्वारा एजियन को पहचानने का सवाल ही नहीं था।

लेकिन पिता-पुत्र के इस मिलन को देखकर राजा सारी बात समझ गया क्योंकि वह एजियन के मुँह से उसकी पूरी कहानी सुन चुका था। वह समझ गया कि कप्तान एंटिफोलस और कोई नहीं बल्कि एजियन का समुद्री तूफान में खोया हुआ पुत्र है।

उसने बड़े एंटिफोलस को अपने पास बुलाया और एजियन की पूरी कहानी सुनाई। अब कप्तान एंटिफोलस भी भावुक हो उठा और अपने पिता के गले से लग गया।

तभी पास खड़ी वृद्धा पुजारिन, जो इतनी देर से एजियन के चेहरे को गौर से देखे जा रही थी, रोते हुये आई और एजियन से बोली, “स्वामी, आप कहाँ चले गए थे ? मेरे बेटे भी मुझसे दूर न जाने कहाँ चले गए ? मैं आपकी अभागी पत्नी हूँ जो आपके वियोग में तड़प-तड़प कर दिन गुजार रही हूँ।”

एजियन ने वृद्धा पुजारिन की ओर गौर से देखा तो तुरंत पहचान गया कि वह उसकी खोई हुई पत्नी है। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। तभी दोनों ड्रोमियो भी वहाँ आ गए। एजियन और उसकी पत्नी ने उन दोनों को भी गले से लगा लिया। एक बिछुड़े हुये परिवार का पुनर्मिलन हो गया। कप्तान की पत्नी भी पूरी बात समझ चुकी थी। वह भी जाकर अपने सास-ससुर के गले से लग गई।

फिर कप्तान एंटिफोलस ने राजा से प्रार्थना की कि वह पूरा जुर्माना भरने के लिए तैयार है। कृपा करके उसके पिता को छोड़ दिया जाये। लेकिन राजा ईश्वर की इस लीला को देखकर इतना चकित था कि उसने बिना जुर्माना लिए ही एजियन को मुक्त कर दिया।

इसके बाद पूरा परिवार खुशी-खुशी एकसाथ रहने लगा।

गवैया गधा और गीदड़

एक गधा और गीदड़ आपस में मित्र थे. गधा एक धोबी के यहाँ दिन भर काम करता और रात होने पर धोबी उसे स्वतंत्र छोड़ देता. तब गधा और गीदड़ मिलकर रात भर ककड़ियों के खेतों में खूब ककड़ियां खाते.

एक रात चन्द्रमा अपने पूरे तेज से चमक रहा था. मंद मंद शीतल बयार बह रही थी. गधा और गीदड़ अपनी रोज की आदत के अनुसार ककड़ियां खा रहे थे. गधा जब पेट भर कर खा चुका तो गीदड़ से बोला – “अहा हा, कैसी सुन्दर रात है. आकाश में चन्द्रमा हँस रहा है. चारों ओर चाँदनी दूध सी बिखरी हुई है. ऐसे वातावरण में मेरा मन गाने को कर रहा है.”

गधे की बात सुनकर गीदड़ बोला – “गधे भाई, ऐसी भूल मत करना. गाओगे तो खेत का रखवाला सुन लेगा और हमें लाठी से मारेगा. “

गधा बोला – “वाह, मैं क्यों न गाऊँ ? मेरा कंठ-स्वर बड़ा सुरीला है. तुम्हारा कंठ-स्वर सुरीला नहीं है इसीलिए ईर्ष्या के कारण तुम मुझे गाने से मना कर रहे हो. मैं तो गाऊँगा और अवश्य गाऊँगा.”

गीदड़ ने फिर समझाया – “गधे भाई, मेरा कंठ-स्वर तो जैसा है, वैसा है. लेकिन इतना समझ लो कि तुम्हारा कंठ-स्वर सुनकर खेत का रखवाला प्रसन्न होने वाला नहीं है. वह लाठी लेकर आएगा और इतना मारेगा कि हड्डी पसली एक कर देगा.”

लेकिन गीदड़ के समझाने का गधे के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह बोला – “तुम कायर और ईर्ष्यालु हो. मैं तो इस सुहाने मौसम का पूरा आनंद उठाऊँगा और अवश्य गाऊँगा.”

गधा सिर ऊपर उठाकर रेंकने के लिए तैयार हो गया. गीदड़ बोला – “गधे भाई, जरा ठहरो, मुझे खेत से बाहर निकल जाने दो, फिर खूब गाना. मैं खेत से बाहर तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा.”

इतना कहकर गीदड़ खेत से बाहर भाग गया और गधे ने अपनी मस्ती में गाना (रेंकना) शुरू कर दिया. गधे की आवाज चारो ओर गूँज उठी और खेत के रखवाले कानों तक पहुँच गई.

वह फ़ौरन डंडा लेकर दौड़ा और खेत में खड़े होकर गा रहे गधे को पीटने लगा. उसने गधे को मार मार कर अधमरा कर दिया. इतना ही नहीं उसने उसके गले में ऊखल भी बाँध दिया. दर्द के मारे बेचारा गधा बेहोश होकर वही गिर गया.

काफी देर बाद जब गधे को होश आया तब वह लंगड़ाता हुआ खेत से बाहर निकला. वहाँ गीदड़ उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. वह गधे को देखकर बोला – “क्यों गधे भाई, तुम्हारे गले में यह क्या बंधा हुआ है ? क्या तुम्हारे गाने से खुश होकर रखवाले ने यह पुरस्कार दिया है ?”

गधा लज्जित होकर बोला- “अब और लज्जित मत करो गीदड़ भाई, अपनी मूर्खता का दंड मैं पहले ही भुगत चुका हूँ. अब तो इस ऊखल से किसी तरह मेरा पिंड छुडाओ.”

गीदड़ ने रस्सी काटकर ऊखल को गधे के गले से अलग कर दिया और वे दोनों फिर मित्र की तरह घूमने लगे. इसके बाद फिर कभी गधे ने अनुचित समय पर गाने की मूर्खता नहीं की.

सोने की कीमत : लोक कथा

बहुत पुरानी बात है, रूस में एक गाँव था जिसके ज़्यादातर निवासी गरीब किसान थे। गाँव में केवल एक ही आदमी अमीर था और वह था उस गाँव का जागीरदार। वह बड़ा लालची और कंजूस प्रवृत्ति का व्यक्ति था और कभी किसी के ऊपर एक पैसा खर्च न कर सकता था। कभी किसी को मुफ्त में पानी तक पिलाने में उसकी जान निकलती थी।

एक रोज गाँव के कुछ किसान मित्र आपस में बैठे गप्पें लड़ा रहे थे। लोग अपने-अपने बारे में लंबी-लंबी हांक रहे थे कि मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, मैंने यह किया, मैंने वह किया वगैरा वगैरा। तभी एक किसान बोल उठा – “पहले तुमने क्या किया वह जाने दो, आगे क्या कर के दिखा सकते हो वह बताओ ?”

इस पर एक किसान बोला – “मैं जागीरदार के घर खाना खाकर दिखा सकता हूँ !”

“असंभव ! एक बार आसमान से तारे तोड़ लाने को कहते तो मान भी लेते मगर हमारे परम कंजूस जागीरदार के घर भोजन करने की बात तो संभव ही नहीं हो सकती !” एक दूसरा किसान हँसते हुये बोला।

“लगाते हो शर्त ? मैंने जो कहा वह करके दिखा सकता हूँ ! अगर मैंने जागीरदार के घर भोजन करके दिखा दिया तो तुम्हारा घोडा मेरा हो जाएगा और अगर न कर सका तो मैं तुम्हारे खेतों में एक साल तक मुफ्त मजदूरी करूंगा।”

“तुम्हारी शर्त मंजूर है …. ! तुम जरूर हारोगे !” दूसरे किसान ने हँसते हुये कहा।

अगले दिन वह किसान अपने मित्रों के साथ जागीरदार की बैठक में पहुंचा और बैठ गया। इधर-उधर की बातें होने लगीं तभी वह किसान धीरे से उठा और जाकर जागीरदार के कान में फुसफुसाया – “हुजूर, आपसे एक बात पूछनी थी !”

“क्या ?” जागीरदार ने पूछा।

किसान ने अपना टोप उतारा और उसे जागीरदार के सामने करते हुये उसके कान में बोला- “हुजूर, मेरे इस टोप के बराबर सोने के पिंड की कीमत कितनी होगी ?”

‘सोना’ सुनते ही जागीरदार के कान खड़े हो गए। वह सोचने लगा इस किसान के पास इतना बड़ा सोने का पिंड कहाँ से आया ? जरूर इसे खेतों में काम करते हुये कहीं गड़ा हुआ मिल गया है, तभी पूछ रहा है। मुझे वह सोने का पिंड इससे हड़पना होगा।

उसने किसान के कान के पास मुंह ले जाकर धीरे से कहा – “अभी थोड़ी देर में बताता हूँ … तब तक चुपचाप बैठ जाओ।”

यह सुनकर किसान धीरे से बोला – “अच्छा तो हुजूर तब तक मैं अपने घर हो आता हूँ। भूख लग रही है, भोजन करके आऊँगा तब पूछ लूँगा।” इतना कहकर वह चलने को उद्यत हो गया।

जागीरदार ने सोचा, अगर यह यहाँ से गया तो सोने के पिंड की बात किसी और को बता सकता है। एक बार बात सबको मालूम हो गई फिर वह सोने का पिंड हड़पना मुश्किल हो जाएगा। अभी तक तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इसने किसी को बताया नहीं है अन्यथा यह मेरे कान में इस तरह फुसफुसाता क्यों ?

उसने तुरंत का किसान का हाथ पकड़कर कहा – “अरे, भूख लग रही है तो घर जाने की क्या जरूरत है ? क्या एक दिन मेरे घर खाना नहीं खा सकते ?” इतना कहकर उसने नौकर को बुलाया और कहा – “देखो इसे भीतर ले जाकर बढ़िया भोजन कराओ। मैं अभी थोड़ी देर में आता हूँ।”

नौकर किसान को भोजन कराने के लिए भीतर ले गया। उधर किसान के मित्र यह देखकर हतप्रभ थे कि इसने आखिर जागीरदार के कान में ऐसा क्या कह दिया जो वह इसे अपने घर ससम्मान भोजन करा रहा है ?

कुछ ही देर में जागीरदार ने किसान के मित्रों को चलता कर दिया और घर के भीतर वहाँ पहुंचा जहां किसान भोजन कर रहा था। उसे देखकर जागीरदार बोला – “खाओ, खाओ, जी भर के खाओ … इसे अपना ही घर समझो।”

किसान ने छककर खाना खाया और अंत में डकार लेकर जागीरदार को प्रणाम करके चलने को हुआ। जागीरदार बोला – “अरे वह सोने के पिंड वाली बात तो कर लो !”

किसान चौंकने का अभिनय करता हुआ बोला – “अरे हाँ हुजूर, वह तो मैं भूल ही गया ? तो बताइये, मेरे इस टोप के बराबर के सोने के पिंड की कीमत कितनी होगी ?”

जागीरदार बोला – “पहले मुझे वह सोने का पिंड दिखाओ तो !”

किसान – “कौनसा सोने का पिंड ?”

जागीरदार – “वही, जिसकी कीमत तुम जानना चाहते हो ?”

किसान हँसते हुये बोला – “अरे हुजूर …. मेरे पास ऐसा कोई पिंड नहीं है … मैं तो बस अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए जानना चाहता था !”

यह सुनते ही जागीरदार आगबबूला हो गया और गालियां बकता हुआ किसान को मारने दौड़ा। हँसता हुआ किसान वहाँ से फौरन नौ-दो-ग्यारह हो गया।

इस तरह किसान ने अपनी चतुराई से न सिर्फ कंजूस जागीरदार के घर स्वादिष्ट पकवानों का आनंद उठाया बल्कि शर्त के मुताबिक अपने मित्र का घोडा भी जीत लिया।

राजा युवराज और अमरफल : लोक कथा  LOK KATHA IN HINDI

बहुत समय पहले की बात है. एक राजा के तीन पुत्र थे. वह उन तीनों में से सबसे योग्य को ही अपना युवराज बनाना चाहता था. एक दिन उसने राजकुमारों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपने पास बुलाया.

राजा जानना चाहता था कि उसके पुत्रों में न्याय करने की योग्यता सबसे अधिक किसके पास है. उसने तीनों पुत्रों से एक प्रश्न पूछा – “मान लो, अगर मैं अपने जीवन और सम्मान की रक्षा का दायित्व किसी आदमी को सौंपूं और वह विश्वासघाती निकले तो उसे क्या सजा दी जानी चाहिए ?”

सबसे बड़े पुत्र ने तुरंत जवाब दिया – “ऐसे आदमी का सर फ़ौरन धड़ से अलग कर देना चाहिए !”

दूसरे पुत्र ने कहा – “बिलकुल, ऐसे आदमी को एक मिनट भी जीवित नहीं छोड़ना चाहिए. उसके साथ किसी भी तरह की दया दिखाना व्यर्थ है.”

तीसरा पुत्र चुप बैठा रहा.

जब राजा ने उससे पूछा कि उसका क्या विचार है तो उसने उत्तर दिया- “यह ठीक है कि ऐसे व्यक्ति को मृत्यु दंड मिलना ही चाहिए. लेकिन उससे पहले यह बात अच्छी तरह से जांच लेनी चाहिए कि वह सचमुच ही दोषी है या नहीं.”

“तुम्हारे कहने का अर्थ है कि दण्ड देने के पहले जांच करना जरूरी है ताकि किसी निर्दोष को सजा न भुगतना पड़े.” राजा ने कहा.

“बिलकुल”, छोटे पुत्र ने कहा, “उदाहरण के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ.”

एक दिन तोता बाग़ में से उड़ते उड़ते जंगल की ओर निकल गया जहां उसकी भेंट अपने पिता से हो गई. पिता अपने पुत्र से मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ. साथ ही उसने यह भी कहा कि उसकी माता उसे बहुत याद करती है. उसे एक बार अपनी माता से मिलने घर चलना चाहिए और उसके साथ कुछ दिन बिताना चाहिए.

“माता से तो मैं भी मिलना चाहता हूँ और कुछ दिन उनके साथ घर में रहना चाहता हूँ,” तोते ने कहा, “लेकिन इसके लिए मुझे राजा से अनुमति लेनी पड़ेगी, अन्यथा वे मुझे खोजेंगे और परेशान होंगे.”

महल में आकर तोते ने राजा से अपने घर जाने की अनुमति मांगी. पहले तो राजा अपने प्यारे तोते को जाने की अनुमति देने को तैयार नहीं हुए, लेकिन जब उन्होंने तोते को उदास देखा तो सशर्त अनुमति दे दी कि उसे पंद्रह दिनों में वापस आना होगा.

“मैं पंद्रह दिनों के भीतर ही वापस आ जाऊँगा,” तोते ने चहक कर कहा और राजा को प्रणाम कर अपने घर की ओर प्रस्थान कर गया.

इतने दिनों बाद जब तोता अपने घर पहुंचा तो उसके माता पिता बहुत प्रसन्न हुए. एक पखवाड़े तक वह ख़ुशी ख़ुशी अपने परिवार के साथ रहा. जब उसका वापस महल में लौटने का दिन आया तो उसके पिता ने कहा – “राजा तुम्हें इतने प्यार से रखता है इसलिए हम बहुत प्रसन्न हैं. हम राजा के लिए कुछ उपहार भिजवाना चाहते हैं, पर समझ में नहीं आ रहा कि क्या भिजवायें ?”

तभी उसकी माँ ने कहा – “क्यों न हम राजा के लिए पहाड़ी पर जो अमरफल का पेड़ लगा है उसका फल भिजवायें. उस फल की विशेषता है कि जो उसे खाता है वह कभी बूढा नहीं होता और सदा जवान रहता है !”

माँ की बात सुनकर तोते का पिता तुरंत अमरफल लेने के लिए चल दिया और कुछ ही देर में एक फल लेकर लौट आया. वह फल अपने पिता से लेकर तोता वापस राजा के महल की ओर चल दिया.

उड़ते उड़ते रास्ते में जब वह बहुत थक गया तो उसने कुछ देर सुस्ताने की सोची. पर समस्या यह थी कि उसके पास जो बेशकीमती फल था उसे वह कहाँ रखे. कहीं नींद आ गई और कोई इस फल को चुरा ले गया तो ? यह सोचकर वह फल को छुपाने के लिए कोई सुरक्षित जगह खोजने लगा.

भाग्य से एक पेड़ के खोखले तने में उसे एक सूराख मिल गया. उसने फल को उस सूराख में रख दिया और पास में ही एक डाल पर सो गया.

संयोग से वह सूराख एक विषधर नाग का घर था और उस वक़्त वह उसके भीतर ही मौजूद था. उसने जब वह फल देखा तो उसे खाना चाहा, लेकिन उसका स्वाद उसे अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने फल को वैसा ही छोड़ दिया. लेकिन तब तक उसके दांत उस फल पर गड चुके थे और उसके विष की कुछ मात्रा फल के भीतर पहुँच गई थी.

उधर तोता अपनी थकान मिटाकर जब जागा तो फल को पुनः सूराख से उठाकर अपनी चोंच में दबाकर महल में राजा के पास पहुँच गया. राजा तोते को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ.

तोते ने अपने पिता द्वारा दिया हुआ फल राजा को दिया और उसकी विशेषता बताई. फल के बारे में जानकर राजा तुरंत उसे खाने को तत्पर हो गया लेकिन तभी वहाँ मौजूद एक मंत्री ने टोक दिया – “जरा ठहरिये महाराज ! आप राजा हैं ! एक राजा होने के कायदे क़ानून आपको पालन करने चाहिए !”

“क्या मतलब ?” राजा ने कहा.

मंत्री बोला – “मेरा मतलब हैं आप इस फल को ऐसे ही मत खाइए. पहले इसका एक टुकड़ा किसी जानवर को खिलाकर देख लीजिये. अगर उसे कुछ न हो तो फिर आप इसे खा लीजिये.”

राजा को अपने तोते पर बहुत विश्वास था लेकिन फिर भी अपने वरिष्ठ मंत्री की बात टालना उसे उचित नहीं लगा. उसने फल का एक टुकड़ा काटकर दूर फेंका तो वहाँ बैठे एक कौवे ने लपक लिया और खा लिया. अब फल तो नाग के विष के कारण जहरीला हो चूका था इसलिए कौवा कुछ ही मिनटों में वहीं ढेर हो गया.

यह देखकर मंत्री तुरंत बोला – “महाराज, आज आप बाल-बाल बच गए. यह तोता आपको जहरीला फल खिलाकर मारना चाहता था.”

तोता कुछ कहे, इससे पहले ही क्रोध से उबल रहे राजा ने उसकी गर्दन पकड़ कर मरोड़ दी और मार डाला. इसके बाद उसने आदेश दिया कि इस जहरीले फल के बचे भाग को नगर के बाहर गहरे गड्ढे में दफ़न कर दिया जाए ताकि इसे खाकर किसी और की जान न जाए.

आदेशानुसार फल को जमीन में गहरा गाड़ दिया गया. मगर होनहार की बात, कुछ ही महीनों में उस फल में मौजूद बीजों में अंकुरण हुआ और वहाँ अमरफल का पौधा उग आया. पौधा देखते ही देखते पेड़ बन गया और उस पर सुन्दर चमकदार फल लगने लगे.

राजा को जब उस विचित्र पेड़ के फलों के बारे में पता चला तो उसने राज्य भर में मुनादी करवा कर कहा कि वे फल जहरीले हैं, मृत्युफल हैं, कोई भी उन्हें न खाए. उसने पेड़ के चारों तरफ एक बाड़ भी बनवा दी ताकि कोई जानवर भी पेड़ के आसपास न फटक पाए.

उसी नगर में एक निर्धन बूढ़ा और बुढ़िया पति-पत्नी रहते थे जिनकी कोई भी संतान नहीं थी और न ही कोई अन्य मददगार था. बुढ़ापे के चलते शारीरिक रूप से भी वे दोनों इतने कमजोर हो चुके थे कि भीख मांगने भी नहीं जा पाते थे. आये दिन फाके कर कर के वे दोनों अपने जीवन से बहुत निराश हो चुके थे और सोचने लगे कि इस तरह जीने से तो मरना श्रेयस्कर है.

मरने के आसान तरीके के बारे में उन्होंने सोचा कि उस पेड़ के जहरीले फल खा लिए जाएँ. यही सोचकर एक रात बूढ़ा किसी तरह चुपके से उस पेड़ के पास गया और दो फल तोड़ लाया. घर पहुंचकर उसने और उसकी बुढ़िया पत्नी ने एक एक फल खा लिया और मरने के इंतज़ार में लेट गए.

सुबह जब उनकी आँख खुली तो पता चला कि वे दोनों न सिर्फ जिंदा हैं बल्कि उनका बुढापा भी जाता रहा है और वे जवान हो गए हैं. उनके शरीर में नौजवानों जैसे चुस्ती और ताक़त लौट आई थी.

यह बात जब राजा के कानों तक पहुंची तो वह भी उन दोनों को देखने आया और देखकर दंग रह गया. अब जाकर उसे समझ में आया कि उसका तोता जो फल लाया था वह असली अमरफल था. किसी कारणवश उस फल में ज़हरीली मिलावट हो गई थी, जिसमें संभवतः तोते की गलती नहीं थी.

अब उसे अपनी जल्दबाजी पर, अपने प्यारे तोते को बिना उसकी बात सुने, बिना कोई जांच किये मार देने पर अफ़सोस होने लगा.


छोटे राजकुमार ने आगे कहा – “इसीलिए मैं कहता हूँ कि किसी को भी सजा देने के पहले यह पता लगा लेना बहुत आवश्यक है कि वह सचमुच अपराधी है या नहीं.”

राजा अपने छोटे राजकुमार की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे ही अपना युवराज घोषित कर दिया.

भूत और खुफिया कैमरा

एक गांव में मीरा नाम की एक लड़की थी वो पढ़ाई मे बहुत होशियार थी । मोना ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक बडी सी कंपनी नौकरी मिल गई वो अब शहर मे रहने लगी थी । कंपनी मे मीरा को एक लडका मिला उसका नाम राहुल था । मीरा और राहुल दोनो के बीच मे दोस्ती हो जाती है ।
अक्सर वो दोनो आपस मे बैठ के बाते किया करते थे । वो दोनो कि दोस्ती अब प्यार मे बदल गई थी वो दोनो एक दूसरे को प्यार करने लगे थे । एक साथ ऑफिस मे बेठा करते थे ऑफिस मे सभी लोगो को इन दोनो के प्यार के बारे मे पता चल गया था ।

एक दिन उन दोनो ने बाहर घूमने का प्लान बनाया वो दोनो बहार घूमने के लिये गये लेकिन घूमते घूमते काफी समय निकल गया । वो दोनो ने सोचा हम यही पे किसी होटल मे एक रूम ले लेते है । राहुल ने एक होटल रूम लिया और वो दोनो रुम मे गये और फ्रेश हो गये । दोनो बैठ कर बात करने लगे बात करते करते वो दोनो एक दूसरे के करीब आ गये दोनो एक दूसरे को प्यार करने लगे।

राहुल ने मीरा से खा क्यो ना हम दोनो एक साथ रहने लगे क्यो की अब मुझे ये दूरी बर्दाश्त नही हो रही है । मीरा ने कहा राहुल थोडे समय ऐसे ही निकाल ना होगा । अभी मेरी नौकरी लगी है इस लिये मे अभी शादी नही करना चाहती हुं । थोड़ी ही देर के बाद मोना को पानी की गिरने की आवाज़ सुनाई देती है । वो सोच मे पड जाती है । मोना को लगता है शायद नल खराब होगा है या बाथरूम का नल खुला रह गया होगा इस लिये पानी टपक रहा है ।

मीरा को एक दुसरी आवाज भी सुनाई देती है । मीरा ने तुरंत राहुल को बताया राहुल देखने के लिये गाया तो वहां पर एक बिल्ली थी । राहुल ने कहा ये तो एक बिल्ली है तुम्हें खामोखा डर लग रहा है । दोनो बिस्तर मे सो गये । लेकिन अब राहुल को भी आवाज़ सुनाई दे रही थी । वो दोनो ने उस होटल से बहार निकल जाने का फैसला किया । वो दोनो अपने कपड़े पहन के बहार निकल ने जा ही रहे थे तब राहुल को एक भुत ने पकड लीया ।

भुत राहुल को गले मे पकड़ ने उपर उठा रहा था । तब भूत राहुल को कहता है सच बोल । तुम्हारा मकसद क्या है । राहुल कहता है मुझे कुछ नही पता आप क्या कहना चाहते है । भूत ने कहा कैमरा तुमने क्यों छुपाया है । तब राहुल सच बोलने लगा हाँ मैंने छुपाया है केमेरा । मे मीरा को ब्लैकमेल करना चाहता हुं उसकी वीडियो बना कर । मीरा मुझसे जल्द से जल्द शादी कर ले इस लिये मैंने केमेरा छुपाया है ।

भुत ने राहुल को बहुत मारा । राहुल वही पे बेहोश हो गया । तब भुत ने मोना से कहा मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था इस लिये मे ने अत्महात्या कर लीया था । मेरे साथ हुवा है ये सब दुसरी लडकी के साथ ना हो इस लीये मे सभी को भुत बनके डराती हुं ।मीरा ने केमेरा ले लीया और वहा से लोट के आ गई और मीरा अब शहेर छोड के गांव मे आ गई । और मीरा खुशी खुशी रहने लगी ।