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१९४८ में, मैं सिवनी के म्यूनिसिपल स्कूल में छटवी कक्षा का छात्र था। हम लोगों के शिक्षकों में एक विनू सर नाम के थे। इसी साल उन्होंने मेट्रिक पास की थी, और हमारे स्कूल में नौकरी पर लग गए थे।

एक दिन क्लास में, जाने कैसे, भूत के किस्से चल पड़े। विनू सर से भी कुछ बताने कहा गया तो उन्होंने बताया।

वे इसी स्कूल में पढ़ते थे। और शाम के वक़्त हॉकी खेलने भी आते थे।एक दिन उन्हें देर हो गई और अँधेरा घिरने लगा। वह घर जाने को तैयार हुए तो एक व्यक्ति ने उन्हें रोका।

उन्होंने देखा कि उसका मुँह उलटा लगा हुआ था। और पैर भी ऊपर की तरफ़ मुड़े हुए थे । उसने विनू सर को दुबारा वहाँ आने से मना किया।

जब लगातार दो दिन ऐसा हुआ, तो वह घबरा गए।

आगे फिर हॉकी खेलने या शाम के वक़्त स्कूल न आने की क़सम खा ली।

उन दिनों मुझे भी हॉकी खेलने का जुनून सवार था।मैं घर वालों से छुप-छुपाकर यहीं स्कूल के मैदान में हॉकी खेलने आता था।

डर के मैंने भी अपने हॉकी के शौक़ पर लगाम लगा ली। पर मेरा डर इतने से भागने वाला नई था।

घर में ही, इस कमरे से उस कमरे, जाने में बहुत चौकन्ना होने लगा था।

तिस पर मैं ऊपर अटारी पर तो, किसी के साथ भी, नहीं जा सकता था।

धीरे धीरे मेरे भूत से डरने की बात सब पर खुल गई। मुझे जितना भी समझाया जाता; दिलासा दी जाती उतना ही मेरा डर बढ़ता जाता। अब तो शाम से ही दिल धड़कने लगता ।

नौबत यहाँ तक पहुँच गई की अम्माँ और चूल्हे के बीच बैठ कर भी, मैं डरता रहता था।

मेरे इस भूत के भय से, घर में सब परेशान थे। पर मैं किसी की बात सुनता नहीं था।

एक दिन मेरे चचेरे भाई जो रहते अलग थे खाना हमारे घर खाते थे। जब रात खाना खाने आए,तब हमलोग खाकर अंदर कमरे में बैठे थे। उन्होंने मुझे पढ़ने के वक़्त अम्माँ के पास देखा, तो कारण पूछा।

अम्मा ने उन्हें बताया की आजकल इसे भूत का डर परेशान किए हुए है।

यह घड़ी शायद मेरे डर के भागने की तय थी। उन्होंने जिस तरह कहा, कहाँ है भूत? मर्घट में? चलो हम अभी चलते हैं।

कोई भूत वूत नहीं होता।

मेरा साहस लौटने लगा था।मैं उनकी बात पर विश्वास करता दिखा, तो उन्होंने कहा, अभी नहीं तो सुबह चलेंगे।

“कोई भूत नहीं होता, उड़ाई हुई बातें हैं।”

फिर मुझे जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, डर इकबारगी निकल गया।

मैं मेट्रिक करके नागपुर पढ़ने चला गया। हम दो भाई, वहाँ रहते थे। बड़े भाई एक साल आगे पढ़ते थे। कुछ और लोग शहर और आस-पास के थे।परिचय बढ़ाने में ज़्यादा समय नहीं लगा। तमाम तरह के किस्से सुनने मिले।

सिवल लाइन में अंग्रेज़ों के ज़माने से एक बंगला खाली पड़ा था। कहा जाता था, जब कभी रविवार को रात में इस बंगले में रोशिनी होती है, दावत होती है। जश्न मनाया जाता है। उसमें वे सारे अंग्रेज़ भी शरीक होते हैं,जो अब जीवित नहीं है। कभी कभी यह जश्न दोपहर १२ बजे भी होता है ।

एक बार एक परिवार रात ट्रेन से उतरा और टाँगे में बैठकर सदर के उस कोने की तरफ़ आया। उतर कर जब पैसे देने लगा, तो देखा टाँगे वाले का सिर ही है।

सुबह पूरे परिवार की लाशें उस स्थल पर पड़ीं मिलीं।

नागपुर में हाई कोर्ट का भवन भी तब, शहर के बाहर की तरफ़ पड़ता था और उसका एक रास्ता सदर की तरफ़ से भी था। इसी बियाबान टुकड़े से सम्बंधित भी तरह तरह की बातें बताई जाती थीं।

अभिशप्त भवनो के किस्से तो सिवनी में भी सुनने मिला करते थे।

यहाँ घर में न पता लगने का डर था, न डाँट पड़ने का। और बहाना भी था। रात बिरात ग़ायब रह कर “गैस” पता लगाने का। नागपुर में विख्यात स्कूल भी थे और स्कूल बोर्ड का दफ़्तर भी ।

मैं मेट्रिक पास कर चुका था। अतः मेरा धर्म बनता था, की पता चले, तो अपने जूनियर्स को गैस भेजूँ। रात वाली बसों से बात तय कर ली गयी थी। वे लोग भी इस भलाई के कार्य में दिल से सहयोग देने तत्पर थे।

इस इस्थिति का मैंने, पूरा-पूरा लाभ उठाया और उन सारे स्थानों पर दिन के बारह बजे, और रात के बारह बजे, भी भूतों और घटनाओ की सच्चाई जानने की कोशिश की।

पर ईमानदारी से कह रहा हूँ, कि मैंने एक भी घटना को सही नहीं पाया। और न ऐसे व्यक्ति से मिल पाया, जिसने अपनी आँखों से ऐसा कुछ देखा हो।

हां, हां ! मैंने यह नहीं कहा, कि भूत का मुझे कोई अनुभव नहीं हुआ।

हम लोग नागपुर में अपने रिश्ते के चाचा के यहाँ रह रहे थे। उनका बंगला, लॉ कॉलेज के पीछे था। बंगले का आहाता बहुत बड़ा था। बंगले के दोनो तरफ़ एक एक आउट हाउस था। एक तरफ़ के आउट – हाउस में शौच और स्नान की व्यवस्था थी।

हम दोनो भाई दूसरे आउट – हाउस में रहते थे। इसलिए हमें स्नान और शौच के लिए पहले वाले आउट-हाउस में जाना पड़ता था।

हम दोनों ने पढ़ाई पर अधिक ध्यान देने के लिए अपने पढ़ने और सोने के लिए समय का बँटवारा कर लिया था । रात १ बजे तक एक और दूसरा उसके बाद पढ़ाई करता था। हर पंद्रह दिन बाद समय पाली बदल दी जाती थी।

उस रात, मैं पाँच तक पढ़ने के बाद सोने के लिए लेट गया। दादा उठे और स्नान करने चले गए। मैं मच्छरदानी के अंदर लेटा हुआ था। कमरा बड़ा था और उसकी आमने सामने की दीवालों में दरवाज़े थे, और बाक़ी दो दीवारों के आमने सामने दो खिड़कियाँ थीं।

अचानक तेज़ हवा चली और लगा, एक ज़बरदस्त लहर हवा की खिड़की, को खोलती सीधे मेरी मछरदानी को, झकझोरती हुई उसके अंदर, घुस गई। कान के आस पास भुनभुनाते हुए मँडराने लगी। मैं चौंक-सा गया अभी अंदर कोई मच्छड नहीं था। यह कहाँ से आ गया!

इधर उधर ढूँढा। कहीं नहीं दिखा। पर आवाज़ लगातार आती जा रही थी।

दहशत सी हुई। मन में हनुमान चालीसा पढ़ना चाहा, पर बार बार भूल रहा था।

असहाय सा लेटा रहना ही भाग्य रहा।

दूर से दादा के नहाकर आने का अंदाज़ा हुआ। मैं इंतज़ार कर रहा था की वह आ जाएँ तो उन्हें अपनी व्यथा बताऊँ।

पर उनके हनुमान चालीसा की आवाज़ से वह भुन – भुन बंद हो गई, और मैं भी चालीसा बोल सका।

आज भी मैं नहीं जानता, की वह क्या था!

इस भुन – भुन से एक घटना और याद आई।

मेरे एक मित्र थे। मैं उन्हें ‘शुकुल जी’ कहता था। वह गाना बहुत अच्छा गाते थे। और खुल कर गाना पसंद करते थे।

वह ज़माना था जब, सिनमा के गाने गाना अच्छा नहीं समझा जाता था।

एक बार वह एक अन्य मित्र के साथ गाने के उद्देश्य से शहर के बाहर कटंगी नाके के पार, मर्घट के क़रीब निकल गए ।

सड़क के बाईं ओर मर्घट था। वे लोग सड़क के दाहिनी ओर जाकर एक पुलिया पर बैठ गए। गाना आरम्भ हुआ, की उन्होंने देखा; सफ़ेद साड़ी पहने हुए एक स्त्री आयी, और मैदान के लिए बैठ गई। दोनों दोस्तों का ध्यान उसपर एक साथ ही गया ।

दोनों लिहाज में, साथ ही उठकर पीछे पलटने लगे।

‘डिग’, ‘डिग’, ‘डिग’ की आवाज़ सुनकर पीछे देखा तो घबरा गए।

वह स्त्री, राजा- उस दूसरे मित्र का नाम राजा था – उसके बिलकुल क़रीब होकर उनलोगों के साथ चल रही थी।

दोनो जान छोड़कर भागे।

भागते गए; भागते गए।

दूर-से बैलगाड़ी के दौड़ते आने की आवाज़ आयी।

गाड़ी पास आयी तो वो दोनों छलाँग लगाकर उसमें बैठ गए।

गाड़ीवान ने आहट सुनी तो पलट कर देखा। जाने क्या समझा गाड़ी तेज़ी से दौड़ा दी।

गाड़ी तेज़ी से दौड़ती जा रही थी। इन लोगों को लगा, कि घर की ओर का मोड़ आ गया है। और वह उतर पड़े। देखा, तो ये लोग मर्घट के अंदर जो एक नाला है, उस तरफ़ मुड़ गए हैं।

दोनो जान छुड़ा कर भागे, और घर पहुँचकर ही दम लिया।

क्या था? वह स्त्री कौन थी, जो जानते बूझते, इनके सामने मैदान को, बैठी ?

और यह कैसा भ्रम था !

नागपुर में मुझे एक बार और, भूत का भ्रम हुआ।

लॉ कॉलेज के बाजू में कामर्स कॉलेज की बिल्डिंग का आधा हिस्सा बन गया था। दूसरी तरफ़ का हिस्सा अधबना रह गया था।

मैंने रात में, पढ़ना क्या था, घर की याद आ रही थी। सो पत्र लिखा। और सवेरे ४ बजे अंधेरे में लॉ कॉलेज के आहाते में लगे लेटर बॉक्स में छोड़ने चला गया। लौटने लगा, तो सोचा, चलो टहलता हुआ थोड़ा आगे बढ़ कर, कामर्स कॉलेज के बग़ल वाले रास्ते से निकल जाऊँगा, घूमना भी हो जाएगा।

मैं लॉ कॉलेज के सामने पहुँचा ही था कि कामर्स कॉलेज के आधे बने भवन के बाजू में जो ज़मीन ख़ाली पड़ी थी उसमें एक बड़े लम्बे आदमी का साया दिखाई पड़ा। उसने सफ़ेद कपड़े और सफ़ेद पगड़ी पहन रखी थी ।उसका क़द सामान्य से दुगना रहा होगा।

मैं आगे बढ़ता जा रहा था, और उसे लगातार देख रहा था। लगा जैसे वह लम्बे क़दम उड़ता-सा चलता हुआ मेरी ओर आ रहा है।

इतने में अंधेरे में साइकल की घंटी सुनाई दी और उसके पीछे से साइकल के खड़खड़ाने की सी आवाज़ आयी।

शायद तेलनखेड़ि से कोई दूध वाला, दूध लेकर शहर आ रहा था।

अचानक वह सफ़ेद छाया मुड़ा, और कामर्स कॉलेज के, आधे से बने भवन में प्रवेश कर गया।

एक बार जबलपुर में हम लोग कलानिकेतन की बस से, अमरकण्टक जा रहे थे।

बरसात के दिन ख़त्म हो गए थे, पर कभी-कभी बादल हो आते। और थोड़ी बहुत बारिश हो जाती थी।

पूर्णिमा की रात थी और रास्ते में बादल भी हो गए तथा थोड़ा बहुत पानी भी मिला।

हमारी बस अचानक रुक गयी!

लाख कोशिश करने पर भी नहीं चली, सारे लोग नीचे उतर कर खड़े हो गए। हम सबने देखा; दूर एक सी ही बड़ी, लम्बे क़द की सफ़ेद पगड़ी और वस्त्र धारी आक्रतियाँ खड़ी हैं। धीरे-धीरे आगे बढ़ कर वह अध्र्श्य हो गयीं।

और तब, हमारी बस आगे बढ़ सकी।

एक दो विचित्र बातें हमने और सुनी थी।

कलानिकेतन में हमारे एक साथी थे; पूरन सिंह खत्री। उन्होंने जबलपुर के अरझरिया जी के बारे में बताया!

अरे, अरझरिया जी ने किसी गंगाराम नाम के प्रेत को अपने अधीन कर रखा था। जब जो चाहते अजीबो-ग़रीब काम गंगाराम से करवा लेते थे।

खत्री परिवार पहुँचा तो उन्होंने गंगाराम को उनके लिए गरमा-गरम खाना लाने का आदेश दिया।

उसने बहुत ढूँढा, सारी होटेल बंद हो चुकी थी तो वह ट्रेन से किसी यात्री का बड़ा सा टिफ़िन बॉक्स ले आया।

खत्री साहेब ने बताया कि हमलोगों ने उस भोजन को पाया।

गंगाराम को आदेश दिया गया कि सुबह सवेरे किसी मिठाई की दुकान से गरमा गरम मिठाई से टिफ़िन बॉक्स को भर कर ट्रेन में वापस रख आए।

खत्री साहेब की पत्नी बहुत परेशान थीं कि एक जिन्न हमेशा उनके साथ हो लेता था, जहाँ भी जातीं वो उनके बग़ल में मौजूद रहता। इस बात से वह बहुत डरी हुई थीं और किसी तरह इसका निवारण चाहतीं थीं।

जिन्न उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाता था, केवल उनके साथ रहने की इजाज़त चाहता था। उनसे कहता था कि मैं तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा, केवल इसी तरह साथ रहूँगा। और तुम्हें धन से मालामाल कर दूँगा।

इस बात से परेशान होकर वो खत्री परिवार अर्जरिया जी से मिला था।

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