त्याग

बहुत पुरानी बात है।दादाजी और गांव के कुछ लोगों से सुना था।
हमारे गांव में गोमती नदी के किनारे एक बहुत ही विशाल पीपल का वृक्ष है जिसके नीचे डीह बाबा का मंदिर है।लोगों की बड़ी श्रद्धा है उनमें।

हुआ यूं था कि गांव में एक जमींदार साहब रहते थे।भरा पूरा घर था उनका।उनके घर में कुल मिलाकर छह प्राणी थे।जमींदार साहब के माता पिता, जमींदार साहब उनकी पत्नी और एक बेटी और बेटा।बेटी की उम्र लगभग  आठ साल की और बेटे की 3 साल रही होगी।

सबकुछ बहुत अच्छी तरह से चल रहा था।जमींदार साहब की उस क्षेत्र में बहुत ही इज़्ज़त थी।वे हमेशा ही दीन दुखियों की मदद किया करते थे।किसी का दुःख उन्हें देखा नहीं जाता था रात हो या दिन, दुपहरी वे हमेशा ही किसी के भी मदद को तैयार रहते थे।कितनी ही गरीब घरों की बेटियों की शादी उन्होंने करवाई थी।जाने कितनों ही गरीब किसानों की आड़े वक़्त काम आए थे।लोगो मे उनकी इतनी श्रद्धा थी कि लोग अपने झगड़ों का निबटारा भी जमींदार साहब के आज्ञा से ही कर लिया करते थे कभी कोर्ट कचहरी की नौबत ही नहीं आयी थी।

जमींदार साहब की गांव के डीह बाबा में बड़ी श्रद्धा थी।हर साल वो डीह बाबा के स्थान पर भव्य पूजन करवाया करते थे।वहीं कुछ दिनों तक मेला भी लगता था दूर दूर से लोग आते,पूजा में सम्मिलित होने।और मेले का भी लुत्फ उठाया करते।

एक वर्ष पूजा चल रही थी उसी दौरान जमींदार साहब के पुत्र को बहुत ही तेज़ बुखार हो गया।इतनी तेज बुखार की उनका पुत्र कोमा में चला गया।हर तरह की दवा दारू की गई पर कोई फायदा नहीं हो रहा था।बड़े बड़े बैध हाकिम से लेकर अंग्रेजी डॉक्टरों को भी दिखाया पर बच्चे की हालत में कोई भी सुधार नहीं हो रहा था।दूसरे के दुःख हरने वाले जमींदार साहब के अपने पुत्र की ये हालात थी, सभी गांव वाले भी उनके दुःख से बहुत दुःखी थे।वो भी पूजा में सम्मिलित होकर उनके लिए दुआ कर रहे थे मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था।

कुछ दिनों से जमींदार साहब का मन पुत्र मोह में ब्याकुल था।पर उनको एक बात और शालती थी।डीह बाबा के आंगन में खड़ा बरसो पुराना पीपल का वृक्ष भी सुख रहा था। जमींदार साहब इस वृक्ष का भी बहुत खयाल रखते थे।पूजा के बाद श्रद्धालु इस वृक्ष में जल चढ़ाते और मन्नत पूरी करने का धागा बांधते थे।ये पीपल उन्हें अपने पुरखों की याद दिलाता था।गांव वाले किसी भी शुभ काम मे इस पीपल वृक्ष का आशीर्वाद लेना नही भूलते।इन दोनों ही बातो से जमींदार साहब दुःखी थे।

पूजा करत करतेे दिन तो जैसे तैसे निकल गया, रात को जब जमींदार साहब अपने पुत्र के सिरहान चिंतित अवस्था में बैठे थे उन्हें एक झपकी सी आयी तभी उन्हें लगा कोई बृद्ध उनके दरवाजे पर कुछ फरियाद लेकर आये हैं।वो बाहर निकले और देखा सही में एक वृद्ध वहाँ खड़े हैं।उन्होंने उनके इतनी रात गए आने का कारण पूछा उन्होंने कहा “मेरा पुत्र बहुत बीमार है उसे आपके मदद की जरूरत है।आप मेरे पुत्र की रक्षा करें” उस वृद्ध ने कहा।

जमींदार साहब उस वृद्ध व्यक्ति का दुःख सुनकर द्रवित हो गए उनकी भी तो यही अवस्था थी उन्होंने कहा “क्या चाहिए आपको,पैसे या कुछ और?” उस वृद्ध ने कहा “आपके पुत्र की जान, वहीं मेरे पुत्र को बचा सकती है” जमींदार साहब ये सुनकर चौंक गए।उन्होंने संयत होते हुए कहा क्या हुआ है आपके बेटे को,कौन है आपका बेटा?

उस वरिष्ठ व्यक्ति ने कहा “मेरा पुत्र दिन ब दिन सूखता जा रहा है।जो डीह बाबा के मंदिर का पीपल है वही मेरा पुत्र है।”
इतना सुनते ही जमींदार साहब की तंद्रा टूट गई।उन्होंने आस पास देखा उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया।और वो अपने पुत्र के सिरहाने बैठे थे।

जमींदार साहब सोच में पड़ गए कि ये क्या था उन्होंने इसे ऊपरवाले का संकेत मानकर विचार करना सुरु किया अपने प्राण प्यारे पुत्र को कैसे एक वृक्ष के लिए त्याग दे।उन्होंने रात में ही अपने पत्नी से विचार विमर्श किया ।एक माँ का दिल अपने पुत्र के मोह में अटका हुआ था।वो कैसे ये बलिदान कर दे।

काफी सोचते विचारते हुए ,रोना धोना करने के बाद जमींदार साहब की पत्नी मान गई।भगवान ने इतने लोगो को छोड़कर उससे कुछ मांगा था आखिर इतने धर्म परायण की पत्नी होने का मोल तो उसे चुकाना ही था।दोनो मन ही मन पुत्र मोह में उलझे हुए ही देवता को अपना पुत्र समर्पित कर दिया।

जैसे जैसे पूजा समापन की ओर बढ़ रही थी पीपल वृक्ष की हरियाली बढ़ रही थी और उसके पुत्र की हालत खराब होती जा रही थी।जमींदार और उनकी पत्नी की हालत भी अपने पुत्र को देखकर खराब होती जा रही थी ।

आखिर वो अंतिम समय भी आ ही गया इधर पूजा की आखिरी आहुति दी गई और उधर उनके पुत्र ने अंतिम सांस ली।

जमींदार साहब और उनकी पत्नी बेटे के गम को बर्दाश्त नहीं कर पाए और धीरे धीरे कुछ ही दिनों में पुत्र विछोह में उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए।उनकी पुत्री घर मे अकेली रह गई थी जिसे उसके मामा अपने साथ ले गए।

अब गांव वाले उस डीह बाबा के बगल में उस जमींदार साहब और उनकी पत्नी की भी प्रतिमा स्थापित करके उनकी विधिवत पूजन करने लगे।

कहते हैं अब भी कोई सवाली जमींदार साहब के दर से खाली नहीं जाता,जो कोई भी कुछ मांगने आता है उसकी मुराद जरूर पुरी होती है।अब जमींदार साहब को जोगी बीर देवता के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

यह तो वो बात है जो सर्वविदित है पर कुछ ज्ञानी लोग कहते हैं कि गांव में आने वाली किसी बहुत बड़ी मुसीबत को जमींदार साहब ने अपने पुत्र का बलिदान देकर रोक दिया था।क्योकि उसी साल अगल बगल गांवो में महामारी फैली थी और कई गांव के गांव साफ हो गए थे।पर इस गांव में एक भी जनहानि नहीं हुई थी।

धन्य है इतने महान लोग जो आमजन के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने से भी पीछे नहीं हटते।नमन उन्हें।

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