लोककथा भाग 3

शातिर चोर

किसी ज़माने में एक बहुत शातिर चोर था। वह बड़ा ही चतुर था। उसका मानना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उड़ा सकता था। एक दिन उस ने सोचा कि जब तक वह राजधानी में नहीं जायगा और अपना जलवा नहीं दिखायेगा, तब तक बाकी चोरों के बीच उसकी इज्जत नहीं होगी।

यह सोचकर वह राजधानी को निकल पड़ा और वहां पहुंचकर उसने नगर का चक्कर लगाया और पता किया कि कहां क्या क्या कर सकता है? उसने सोचा कि राजा के महल से चोरी शुरू करेगा। रातदिन महल की रखवाली के लिए बहुतसे सिपाही तैनात कर रख गएे थे। बिना नजर मे आये कोई भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बड़ी घड़ी लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी। 

चोर ने लोहे की  कीलें इकट्ठी कीं ओर जब रात को घड़ी में घण्टे बजट तो घंटे की हर आवाज़ के साथ वह महल की दीवार में कील ठोकता गया। इस तरह बिना शोर किये उसने दीवार में कीलें लगा दीं, फिर उन्की मदद से वह ऊपर चढ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से क़ीमती समान चुराया और राजा के कक्ष में जाकर राजा और रानी के कपड़ें और गहने भी चुरा लिया।

     अगले दिन जब राजा को इस चोरी का पता लगा तो राजा ने सारे लोगो को इसकी खबर दी। राजा बहूत नाराज़ हुआ। उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि महल में और नगर की सडकों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या बढ़ा दी जाय और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाय तो उसे चोर समझकर पकड़  लिया जाय और उसे चौराहे पर फाँसी पर लटका दिया जाए। 

जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर वहीं उपस्थित था। उसे सारी योजना की हर बात का पता चल गया। उसे फौरन यह भी मालूम हो गया कि कौन से 100 सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं। वह घर गया और साधु का वेश धारण करके उन सारे सिपाहियों की धर्मपत्नी से जाकर मिला। उनमें से हरेक इस बात के लिए मनौतियां मांग रहीं थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से खूब इनाम मिले।    

       एक एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ को देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बड़ी अच्छी है। उसके पति के रूप में चोर उसके घर आयेगा, लेकिन, देखो, चोर को अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबोच लेगा। घर के सारे दरवाज़े बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज़ में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर खौलता तेल फेंकना और जब वह घायल हो जाये तो मुशलो से उनकी जमकर कुटाई कर देना। इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकडा जायगा नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा। सारी महिलाओं ने चोर की बातों में है में हाँ मिलाया।

सारी महिलाएं रात को चोर के स्वागत के लिए तैयार हो गईं। अपने अपने पतियों को उन्होंने कुछ भी नहीं बताया। इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे तीन बजे तक पहरा देते रहे। हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि अब चोर नहीं आयेगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया। जब वे घर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई  नुस्खे अमल में ला दिए।जब सिपाही ने दरवाजा खटखटाया तब उनकी पत्नियों ने उसके ऊपर खैलते तेल का कड़ाह पलट दिया।जिससे सारे सिपाही बुरी तरह जल गए अभी वे कुछ समझ पाते उससे पहले ही मुशलो का जबरदस्त वार होना शूरु हो गया।        

 परिणाम यह हुआ कि सारे सिपाही जल गये और वही अपने घर के द्वार पर चारो खाने चित हो गए।बड़ी मुश्किल से सुबह होने पर स्त्रियों को विश्वास हुआ कि वे ही उनके असली पति हैं । सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया। 

दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल बताया गया। सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े। उस रात कोतवाल ने तैयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया। जब वह एक गली में जा रहा रहा था उसने एक लड़की को घूमते देखा, कोतवाल ने उससे पूछा तुम कौन हो ।चोर ने लड़की के वेश में जवाब दिया, ‘मैं चोर हूं।″ कोतवाल समझा कि लड़की उसके साथ मजाक कर रही है। उसने कहा, ″मजाक छोड़ो और अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें काठ के बंधन में डाल दूंगा।″ चोर बाला, ″ठीक है। इससे मेरा क्या बिगड़ेगा!″ और वह कोतवाल के साथ काठ डालने की जगह पर पहुंचा।   

        वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काठ को आप इस्तेमाल कैसे किया हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए।″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओं तो ?″ चोर बाला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है। मैं भाग क्यों जाऊंगी?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि काठ कैसे डाला जाता है। ज्यों ही उसने अपने हाथ-पैर उसमें डाले कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया। जाड़े की रात थी। दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया। 

सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल काठ में फंसे पड़े हैं। उन्होंने उनको उस में से निकाला और अस्पताल ले गये।           अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया। राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया। चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था। रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया।

राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा। तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है?″ साधु ने जवाब दिया कि “वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं। यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं।″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे।           आपस में काफ़ी सोच विचार और दो-तीन बार इंकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया और उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये। चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा और राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा। सवेरे के कोई चार बजने आये। राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया।

लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है। उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया। राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी। दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया और मारे डर के थरथर कांपने लगा। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा। राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया। उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया।         

  अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हैरान था। उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थित हो जायगा तो उसे माफ कर दिया जायगा और उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जायगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा। चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, “महाराज, मैं ही वह अपराधी हूं।″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी। राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा। इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा।

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