हाइवे का हत्यारा

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आदेश ने अब तक 34 हत्याएं करने का जुर्म कबूला है. मुमकिन है कि उस की लिस्ट में और नाम बढ़ें. लेकिन अब किसी को उतनी हैरानी नहीं होगी, जितनी सितंबर के दूसरे हफ्ते में हुई थी. इस सनकी हत्यारे ने एक के बाद एक ट्रक ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्याओं की बात कबूली थी और यह भी बताया था कि उस ने कब कहां किस की हत्या की थी.

आदेश जब भोपाल में पकड़ा गया था, तब पुलिस को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस के हत्थे कोई मामूली मुलजिम नहीं, बल्कि एक ऐसा सीरियल किलर चढ़ा है, जिस का कत्ल करने का अपना एक अलग स्टाइल और अंदाज है. जब 34 हत्याओं की बात उस ने स्वीकारी थी तो इस स्वीकारोक्ति की गूंज न केवल देश बल्कि विदेशों तक भी पहुंच गई थी.

हर किसी की दिलचस्पी आदेश खांबरा में है, खासतौर से मनोविज्ञानियों की, जिन के लिए यह कातिल शोध का विषय हो सकता है. मध्य प्रदेश पुलिस उस के द्वारा की गई हत्याओं में सिर खपा रही है कि कैसे इस दुर्दांत और बेरहम हत्यारे द्वारा की गई हत्याओं को सूचीबद्ध कर के ऐसी चार्जशीट तैयार करे कि उस के फांसी के फंदे से बचने की रत्तीभर भी गुंजाइश न रहे.

लगभग 50 वर्षीय आदेश खांबरा मामूली शक्तसूरत वाला अधेड़ आदमी है. उस के चेहरे से अगर अपने जुर्मों के अनुपात में क्रूरता नहीं टपकती तो मासूमियत भी नहीं दिखती. वह बेहद सपाट चेहरे वाला तटस्थ और लगभग भावशून्य व्यक्ति है. मामूली पढ़ेलिखे आदेश खांबरा की बातों में दर्शन जरूर झलकता है. पकड़े जाने के बाद वह शायद खुद की अहमियत समझने लगा है, इसीलिए वह और भी ज्यादा लापरवाह दिखने की कोशिश करता है.

भोपाल के नजदीक औद्योगिक इलाका है मंडीदीप जो एक छोटा सा कस्बा है. यहां की फैक्ट्रियों में काम करने आए देश भर के लोग रहते हैं. इन में से अधिकांश पेशे से मजदूर हैं, जो मंडीदीप में स्थाई रूप से बस गए हैं, खांबरा परिवार उन में से एक है.

आदेश खांबरा के पूर्वज भारत पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त भोपाल आ गए थे. उस के पिता गुलाब खांबरा सेना से नायक सूबेदार के पद से रिटायर हुए थे. अपना पेट पालने के लिए आदेश मंडीदीप में दरजी की छोटी सी दुकान चलाता था. उस की शादी हो चुकी है और उस के 5 बच्चे भी हैं जिन्हें वह बेहद प्यार करता है.

पुलिस इस से ज्यादा जानकारी आदेश के बारे में हासिल नहीं कर पाई है या फिर वह किन्हीं वजहों के चलते मीडिया को नहीं दे रही है. हां, पुलिस ने यह बात जरूर प्रमुखता से बताई कि आदेश के अपने पिता से बेहद कटु संबंध थे. खुद आदेश ने भी स्वीकारा कि वह इतना बेरहम हत्यारा इसलिए बना क्योंकि उसे परिवार में कभी किसी का प्यार नहीं मिला.

पिता ने तो उसे कभी चाहा ही नहीं और न ही किसी और ने उस की परवाह की. मां की मौत बचपन में ही हो चुकी थी. पिता सैन्य अनुशासन अपने घर में भी चलाते थे और जराजरा सी बात पर उसे मारते, डांटते थे. कभीकभी तो वह उसे घर से निकाल देते थे, इसलिए अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा उस ने अभावों में रहते रिश्तेदारों के यहां गुजारा था.

किशोर उम्र बड़ी नाजुक होती है आदेश का मासूम मन इन हालात को बरदाश्त नहीं कर पाया. लिहाजा एक गुस्सा उस के अंदर जमा होता गया, जिस का अहसास उसे नहीं हुआ और वह एक बेरहम हत्यारा बन गया

इन दिनों आदेश को ले कर देश भर में जगहजगह घूम रही पुलिस को यह भी नहीं मालूम कि आदेश ने जुर्म की दुनिया में पहला कदम कब रखा था. लेकिन उस ने जो कबूला उस के मुताबिक साल 2010 के बाद से वह लगातार एक नियमित अंतराल से हत्याएं कर रहा था और हिम्मत बढ़ती गई.

आदेश के निशाने पर ट्रक ड्राइवर और क्लीनर ही क्यों होते थे, इस सवाल का जवाब भी उस के बयानों से मिलता है कि ये लोग सौफ्ट टारगेट होते थे. हत्याओं की शुरुआत भी उस ने भोपाल और मंडीदीप के बीच 11 मील नाम के इलाके से की थी, जो होशंगाबाद रोड पर स्थित है. यहां से एक रास्ता प्रसिद्ध भोजपुर के शंकर मंदिर की तरफ जाता है. इस इलाके में रिहायशी मकान और अपार्टमेंट बन रहे हैं, लेकिन इस के बाद भी वह इलाका सुनसान रहता है. खासतौर से रात के वक्त तो आवाजाही न के बराबर रहती है.

पैसों की तंगी दूर करने के लिए आदेश ने मेहनत करने के बजाय जुर्म का रास्ता चुना. मंडीदीप में रहने वाले आपराधिक प्रवृत्ति के कई लोगों से उस के संबंध थे. संगत रंग लाई और एक दिन उस ने 11 मील इलाके में एक ट्रक लूट लिया. अपनी पहली वारदात की वह तारीख नहीं बता पाया, लेकिन उस की बातों से लगता है कि यह बात सन 2007 की रही होगी.

पहले जुर्म में उस ने ट्रक ड्राइवर की हत्या नहीं की थी, बल्कि उसे लूट कर छोड़ दिया था. इस लूट से उस के हाथ काफी माल लगा था. मोटा माल आसानी से हाथ लगने के बाद उसे टेलरिंग बेहद घाटे वाला और बेकार का काम लगा, क्योंकि जितना पैसा वह 3-4 साल मेहनत कर के कमा पाता था, उतना एक रात में उस ने ट्रक की लूट से कमा लिया था. हालांकि लोगों को दिखाने के लिए वह अपने टेलरिंग के पेशे से चिपका रहा.

पहली बार जुर्म करने वालों की हालत अजीब होती है, कुछ दिन वे पुलिस के डर और राज खुल जाने से सहमे रहते हैं लेकिन जब 10-15 दिन गुजर जाते हैं तो फिर बेफिक्र हो जाते हैं. इसी बीच किसी तरह वे चोरीछिपे घटनास्थल का चक्कर जरूर लगाते हैं, इस के कई मनोवैज्ञानिक कारण अपनी जगह हैं.

पहली लूट पर जब कुछ नहीं बिगड़ा तो आदेश के हौसले बढ़े और दूसरी वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने गुना जिले के राघौगढ़ कस्बे को चुना जो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का चुनाव क्षेत्र होने के चलते मशहूर है.

यह भी साल 2007-2008 के दरम्यान की बात है. राघौगढ़ में ट्रक लूट कर उस ने सबूत मिटाने की गरज से ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी थी. इस के बाद उस ने लगभग हर वारदात में ऐसा ही किया, जिस से पकड़ा न जाए. लगातार हत्याएं करने के बाद वह अपनी अपराध शैली में बेहद ऐहतियात बरतने लगा था.

दूसरी वारदात में भी उसे खासी रकम मिली थी. इस के बाद तो ट्रक ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्या को उस ने अपना फुलटाइम जौब बना लिया. लंबी दूरी तक जाने वाले ट्रक ड्राइवरों के पास तो खासी नगदी होती ही है, लेकिन उसे असल आमदनी होती थी ट्रक का माल लूटने से और फिर ट्रक को भी बेच देने से. यह आदेश खांबरा के लिए बाएं हाथ का खेल बनता जा रहा था.

सन 2010 से ले कर 2014 तक उस ने 5 ट्रक लूटे और 8 ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्या की. लेकिन उस की हिम्मत उस समय और बढ़ गई थी, जब वह तीसरी वारदात को अंजाम देने के लिए महाराष्ट्र के अमरावती जिले में गया था. यहां वारदात के बाद वह पकड़ा गया था और उसे डेढ़ साल की सजा भी हुई थी. जेल से रिहा होने के बाद उस ने जुर्म की दुनिया से किनारा कर लेने का इरादा भी बनाया था, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इस की 2 ही वजहें थीं. पहली यह कि जुर्म से कम समय में बहुत ज्यादा पैसा मिलता था और दूसरी बात संगत की थी.

एक बार जो अपराधी जेल हो आता है, उस के भीतर का डर मिट जाता है. वह पुलिसिया कामकाज के तौरतरीकों से भी वाकिफ हो जाता है. यही आदेश के साथ हुआ. सजा होने के कुछ दिन बाद तक उस ने भी जुर्म न करने की बात सोची, लेकिन जल्द ही जुर्म का कीड़ा उस के दिमाग में कुलबुलाने लगा. 2010 से 2014 के बीच वह एक दफा और पकड़ा गया था. इस बार जेल में रहते उस की दोस्ती तुकाराम बंजारा नाम के शख्स से हुई. दोनों ने जेल में तय कर लिया कि अब बाहर जा कर वे मिलजुल कर ट्रक लूटने और ड्राइवरों व क्लीनरों की हत्या का काम करेंगे.

इन दोनों ने जेल में रहते ही हाइवे क्राइम्स पर जैसे पीएचडी कर डाली थी. इस बात पर दोनों की राय एक थी कि मंडीदीप की फैक्ट्रियों में ट्रक ड्राइवर चोरी का माल बेच कर लाखों बनाते हैं तो हम तो उन्हें लूट कर और ज्यादा कमा सकते हैं.

महाराष्ट्र का रहने वाला तुकाराम भी कम खुराफाती और शातिर दिमाग का नहीं था. उसे आदेश जैसे किसी जोखिम उठाने वाले सहयोगी की जरूरत थी. जेल में रहते दोनों ने तरहतरह की योजनाएं बनाईं और बाहर आ कर उन पर अमल भी शुरू कर दिया.

योजनानुसार दोनों ने वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया. अब ये ट्रक ड्राइवरों को हथियारों की नोंक पर नहीं लूटते थे, बल्कि उन्हें मीठीमीठी बातों में फंसाते थे. फंसने के बाद उन्हें शराब पिलाते या फिर किसी खानेपीने की चीज में नशे की गोलियां मिला कर दे देते थे.

ड्राइवर के बेसुध हो जाने के बाद ये उसे या तो कहीं पानी में डुबो कर मार देते थे या फिर उसे रेल की पटरियों पर सुला देते थे, जिस से मामला हादसे या खुदकुशी का लगे. इन तरीकों को अपनाने के पीछे इन का मकसद पुलिस जांच का दायरा सीमित रखना था, जिस में वे कामयाब भी रहे.

इसी दौरान जयकरण प्रजापति नाम का शख्स भी इन के गिरोह में शामिल हो गया. जयकरण मध्य प्रदेश के ही टीकमगढ़ जिले के एक गांव का रहने वाला था, जिस का मुख्य काम ट्रक ड्राइवरों से दोस्ती बढ़ाना था. ट्रक ड्राइवरों को शीशे में उतारने के बाद वह कोड वर्ड में आदेश को बताता था कि अब आगे क्या करना है.

मसलन जब वह फोन पर यह कहता था कि कुछ मीठा लाओ तो इस का सीधा सा मतलब होता था कि शिकार जाल में फंस चुका है, इसलिए उसे ठिकाने लगाने के लिए तैयार रहो. जो ड्राइवर इन का दावतनामा कबूल कर लेते थे, उन्हें ये छक कर शराब पिलाते थे और फिर कहीं सुनसान जगह ले जा कर निर्वस्त्र कर उसे रेल की पटरियों पर फेंक देते थे या फिर किसी तालाब में.

इस तिकड़ी ने 3 साल में 20 से भी ज्यादा वारदातों को अंजाम दिया था. अधिकांश हत्याएं आदेश ने ही की थीं. ऐसा लगता है कि हत्या करते वक्त उस की सनक शवाब पर होती थी और वह अब यह जुर्म लूट के लिए कम बल्कि अपना शौक पूरा करने के लिए ज्यादा करता था. ट्रक ड्राइवरों की हत्या करने में माहिर हो चले आदेश खांबरा ने एकएक कर अपने जुर्म कबूले तो देश भर में सनाका खिंच गया.

अपने द्वारा की गई हत्याओं का राज्यवार हिसाब भी उस ने दिया कि उस ने मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा 20 कत्ल किए. इन में से सब से ज्यादा कत्ल चंदेरी के नजदीक किए थे. चंदेरी साड़ी की देश भर में अलग पहचान है, जिसे हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘स्त्री’ में दिखाया भी गया है.

दरअसल, गुना, चंदेरी और राजगढ़, आगरामुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े हुए हैं. यहां हत्याएं करना और लूटपाट करना अपेक्षाकृत आसान काम है. महाराष्ट्र के अमरावती में आदेश ने 2 कत्ल किए तो छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 3 और रायपुर में 2 कत्लों की बात उस ने कबूली है.

एक हत्या उस ने मशहूर देवस्थल शिरडी के संगमनेर जंगल में करने की बात स्वीकारी. उस ने महाराष्ट्र के ही वर्धा में 2 हत्याएं की थीं. ओडिशा के संबलपुर में भी आदेश ने 2 हत्याओं की बात कबूली.

कभी मंडीदीप से शुरू हुआ एक ट्रक की लूट का सिलसिला अंतरराज्यीय बन चुका था. जिस में खास बात यह थी कि आदेश की तरफ किसी का ध्यान नहीं था क्योंकि हाइवे पर हादसे और हत्याएं आम बातें हैं. सुनसान होने के चलते ऐसी जगहों पर पुलिस को गवाह और सबूत नहीं मिलते इसलिए वह भी जांच जल्द बंद कर मामला क्लोज कर देती है.

दूसरे आमतौर पर ड्राइवरों और क्लीनरों की परवाह ट्रक मालिक भी नहीं करते, क्योंकि उन की दिलचस्पी अपने माल और ट्रक में ज्यादा रहती है, जो न मिलें तो वे पुलिस में औपचारिक रिपोर्ट दर्ज करा कर अपने काम में ऐसे लग जाते हैं कि मानो कुछ हुआ ही न हो. ट्रक ड्राइवरों के परिजन भी ज्यादा भागदौड़ नहीं कर पाते. इस सिस्टम और मानसिकता का पूरा फायदा आदेश खांबरा, जयकरण प्रजापति और तुकाराम बंजारा उठा रहे थे.

आदेश खांबरा यूं ही पुलिस के फंदे में नहीं आ गया, बल्कि उसे अपना दायां हाथ कहे जाने वाले जयकरण की एक भूल काफी महंगी पड़ी. महत्त्वाकांक्षी जयकरण की इच्छा खुद का अपना अलग गिरोह बना कर काम करने की थी. जयकरण के जेहन में यह खयाल आया कि क्यों न एक दफा अपने दम पर ऐसी किसी वारदात को अंजाम दे कर देखा जाए कि कितनी कामयाबी हाथ लगती है. बस इसी को हकीकत में बदलने की कोशिश में वह तो पकड़ा गया, साथ में अपने बौस आदेश खांबरा और साथी तुकाराम को भी ले डूबा.

हुआ यूं था कि अगस्त के पहले ही हफ्ते में भोपाल के बिलखिरिया थाने में बंसल कंपनी के मालिक ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उन का एक ट्रक मंडीदीप से सरिए ले कर रवाना तो हुआ है लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंचा है. बिलखिरिया थाने के टीआई लोकेंद्र सिंह के जरिए यह बात एसपी राहुल लोढ़ा और उन से होती हुई आईजी जयदीप प्रसाद तक पहुंची तो पुलिस महकमे ने इस पर गंभीरता से काररवाई शुरू कर दी.

दरअसल, भोपाल पुलिस के आला अफसर लगातार मिल रही ऐसी रिपोर्टों और शिकायतों से परेशान हो चले थे, जिन में ट्रक रवाना तो हुआ था लेकिन अपने गंतव्य तक नहीं पहुंचा था. हैरानी की बात यह थी कि ट्रक के साथसाथ उस के ड्राइवर और क्लीनरों का भी अतापता नहीं लग रहा था.

आईजी जयदीप प्रसाद ने एसपी राहुल लोढ़ा के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित कर दी, जिस में एएसपी दिनेश कौशल और तेजतर्रार सीएसपी सुश्री बिट्टू शर्मा को शामिल किया गया. इस टीम ने बंसल कंपनी के लापता हुए ट्रक को लक्ष्य बना कर जांच शुरू की तो जल्द ही सुराग भी हाथ लग गया.

तब पुलिस को इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि उस के हत्थे कौन चढ़ने वाला है. जांच में भोपाल के ही आनंद नगर इलाके के एक जगह लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में जब यह दिखा कि एक ट्रक से सरिए उतार कर दूसरे ट्रक में रखे जा रहे हैं तो पुलिस टीम को लगा कि हो न हो यह ट्रक बंसल कंपनी का ही हो.

कोशिश की गई तो भोपाल के अयोध्या नगर इलाके में एक लावारिस ट्रक खड़ा मिला. साथ ही मिल गई ट्रक ड्राइवर लखन की लाश. इस के बाद तो पुलिस वालों की बांछें खिल उठीं.

उत्साहित पुलिस वालों ने सीसीटीवी फुटेज में चोरी के सरिए खरीदने वाले को तलाश लिया. उस की मदद से असली खरीदार महेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया. मंडीदीप निवासी महेश से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने जयकरण का नाम लिया.

जयकरण को भी उठाने में पुलिस ने देर नहीं की. पूछताछ में वह जल्दी ही टूट गया और उस ने अपना गुनाह स्वीकार भी कर लिया कि ट्रक को उसी ने लूटा है. उस ने यह भी बताया कि हत्या करने के बाद ड्राइवर की लाश फेंक दी. जयकरण ने बताया कि यह ट्रक उस ने 11 मील इलाके में लूटा था और सरिया दूसरे को बेच दिए थे.

यहां जयकरण ने वह गलती की थी जो उस का उस्ताद आदेश खांबरा कभी नहीं करता था. वह गलती यह थी कि लूटे गए ट्रक को लावारिस छोड़ देना. जयकरण का इरादा पहले ट्रक बेचने का था, लेकिन उस ने बाद में अपना इरादा बदल दिया था.

जब जयकरण से पूछताछ चल रही थी, तभी इत्तफाक से मंडीदीप के ही एक ट्रांसपोर्टर मनोज शर्मा भी मिसरोद थाने पहुंच गए थे. मनोज ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अपने ट्रक में चावल भर कर पुणे भेजे थे. ट्रक पुणे तक पहुंचा भी और वहां से चीनी ले कर वापस भोपाल के लिए रवाना भी हुआ लेकिन अभी तक यहां नहीं पहुंचा. मनोज के मुताबिक उस ट्रक में लगभग 10 लाख रुपए कीमत की चीनी थी.

जैसे ही मनोज ने ड्राइवर का नाम जयकरण बताया तो पुलिस वालों के चेहरे चमक उठे क्योंकि जयकरण पहले से ही उस की गिरफ्त में था. लेकिन नई समस्या यह थी कि बिलखिरिया थाने में बैठा जयकरण शक्कर का ट्रक कैसे उड़ा सकता था. इस बाबत जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि मनोज वाला ट्रक जिस का नंबर एमएच18बी ए 3560 है, वह तो उस ने आदेश खांबरा के हवाले कर दिया था.

जीपीएस से लगा ट्रक का सुराग

अब तसवीर साफ हो गई कि आदेश 10 लाख रुपए की शक्कर कहीं न कहीं तो जरूर बेचेगा, लेकिन इस का अंदाजा न तो पुलिस लगा पाई और न ही जयकरण कुछ बता पाया. इस वक्त ट्रक कहां होगा, यह भी पुलिस को नहीं मालूम था.

यह समस्या भी बैठेबिठाए हल हो गई, जब मनोज ने यह बताया कि उन्होंने ट्रक में एक गोपनीय जगह जीपीएस फिट कर रखा है. यह ट्रक जिस किसी टोल नाके से गुजरता था तो उस की लोकेशन उन के मोबाइल पर आ जाती थी. मनोज को अपने ट्रक की आखिरी लोकेशन झांसी की मिली थी.

उस के बाद से मैसेज आने बंद हो गए थे. इस के बाद भी उम्मीदें जिंदा थीं, इसलिए बिट्टू शर्मा हैडकांस्टेबल सचिन, आरक्षक अरुण और देवेश को ले कर रवाना हो गईं. मोबाइल फोन के जरिए अब ट्रक की लोकेशन मिलने लगी थी, लेकिन वह पलपल बदल भी रही थी.

बिट्टू शर्मा ने 10 दिन लगातार इस ट्रक का पीछा किया और आखिरकार ट्रक को उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर स्थित एक ढाबे पर देख भी लिया. इस ढाबे पर पुलिस वाले आधी रात को पहुंचे तो वहां का नजारा बेहद रंगीन था. ढाबे पर शराब सहित मौजमस्ती के तमाम इंतजाम थे जो आमतौर पर हाइवे पर होते हैं.

पर इस टीम का मकसद और निशाना आदेश खांबरा था, जिसे अंतत: सुबह तक पकड़ ही लिया गया और भोपाल ले आए. तुकाराम भी उस के साथ था. बिलखिरिया थाने में जैसे ही आदेश ने जयकरण को देखा तो उसे समझ आ गया कि खेल खत्म हो चुका है. इस के बाद भी उस ने पुलिस को बरगलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया.

आदेश का मुंह खुलवाने के लिए पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया और उस के बेटे का हवाला दिया कि जिन ड्राइवरों और क्लीनरों की हत्याएं उस ने की हैं, उन की आत्माएं बदला ले रही हैं. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आदेश के बेटे का 3 बार एक्सीडेंट हुआ था.

डर कह लें या मजबूरी कि आदेश ने एकएक कर सारे गुनाह स्वीकार लिए तो हड़कंप मच गया. आदेश से संबंधित जानकारियां टुकड़ों में ही सही, सामने आने लगीं. उस ने बताया कि वह अपने बेटे और परिवार को बहुत चाहता है.

हैरानी की बात तो यह थी कि उस के घर वालों को नहीं मालूम था कि वह इतना खतरनाक और दुर्दांत हत्यारा है. आदेश अकसर घर से गायब रहता था और कहां और क्यों रहता है, यह सच किसी को नहीं बताता था. हां, अपने गायब रहने के बाबत बहाने बनाने में वह माहिर हो गया था. बयानों में उस ने यह बात कही भी कि अपने गुनाहों की परछाईं उस ने घर वालों पर नहीं पड़ने दी थी.

लेकिन सच यह है कि आदेश के दोनों बेटे शुभम और सुगंध अपने पिता की वास्तविकता जानते थे. नगर पालिका में काम करने वाले शुभम को अपने पिता की गिरफ्तारी की जानकारी 9 सितंबर के अखबारों से मिली थी. शुभम को यह भी मालूम था कि आदेश पर मध्य प्रदेश के गुना के अलावा महाराष्ट्र के अमरावती और संगमनेर में भी मुकदमे चल रहे हैं.

आखिरी बार आदेश 15 अगस्त के दिन घर से निकला था, क्योंकि 16 अगस्त को नागपुर अदालत में उस की पेशी थी. उस का दूसरा बेटा सुगंध एक कार मैकेनिक की दुकान पर काम करता है.

गिरफ्तारी के बाद मंडीदीप में स्वाभाविक तौर पर आदेश की चर्चा रही. जिस ने भी सुना दांतों तले अंगुली दबा ली. इस कस्बे के लोग बताते हैं कि आदेश को टेलरिंग में इतनी महारत हासिल थी कि वह ग्राहक का नाप इंचीटेप से नहीं बल्कि ‘स्त्री’ फिल्म के हीरो राजकुमार राव की तरह अपनी आंखों से ले लेता था और उसी के आधार पर एकदम फिटिंग के कपड़े सिल कर देता था.

मंडीदीप से पहले आदेश रेहटी और शाहगंज के अलावा महाराष्ट के भंडारा में भी टेलरिंग की दुकानें खोल चुका था. यहां कुछ गुंडों से झगड़ा होने के चलते उस ने पुलिस वालों पर ही हमला कर दिया था.

कोई 6 साल पहले आदेश ने भंडारा में जेडेक्स टेलर्स के नाम से अपनी दुकान खोली थी, लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा तो वापस मंडीदीप आ गया था. हैरत की बात यह भी है कि मंडीदीप थाने में उस के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है.

मंडीदीप के पुराने लोग ही जानते हैं कि आदेश खांबरा के दादा नारायणदास खांबरा यहां के जानेमाने और प्रतिष्ठित नागरिक हुआ करते थे. वह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी नेता थे और पेशे से ठेकेदार थे. उन्हें बरखेड़ा से ले कर ओबैदुल्लागंज तक रेलवे लाइन बिछाने के लिए भी लोग जानते हैं और दाहोद बांध बनाने के लिए भी.

साल 1965 में नारायणदास का नाम तब पूरे मध्य प्रदेश में गूंजा था, जब उन्होंने भोजपुर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था और महज 3 वोटों के मामूली अंतर से हार गए थे.

उस जमाने में इस इलाके में कांग्रेस के अलावा हिंदू महासभा का अच्छा प्रभाव था. गुजरे कल की इन बातों और प्रतिष्ठा से कोई संबंध न रखने वाले आदेश खांबरा अपने परिवार और पूर्वजों का नाम इस तरह यानी कई घरों के चिराग बुझा कर रोशन करेगा, इस का अंदाजा किसी को नहीं था.

पुलिस आदेश से काफी कुछ उगलवा चुकी है, जिस से यह तो साफ हुआ कि उस के प्रत्यक्ष सहयोगी जयकरण और तुकाराम ही थे, लेकिन जाने क्यों यह बात हर किसी को हजम नहीं हो रही थी क्योंकि मामला एकदो नहीं बल्कि 34 हत्याओं का था.

ट्रक और लूट का माल बेचने में आदेश का मददगार ग्वालियर निवासी साहबजी था. मिसरोद थाने में पुलिस वाले उसे तोड़ने में तो सफल रहे, साथ ही यह जानने की भी कोशिश करते रहे कि आदेश के संबंध किन और कैसे लोगों से थे.

आदेश ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी कष्टों से भरी होती है, मैं इन्हें मुक्ति दे रहा था. उस ने स्वीकारा कि उस के संबंध दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के नेताओं से थे. रायसेन जिले के एक भाजपा नेता का संपत्ति विवाद सुलझाने में उस ने कथित तौर पर सुपारी ले कर हत्या भी की थी. यह कहानी लिखे जाने तक इस बात की भी जांच चल रही थी.

सबूतों के नाम पर पुलिस को उस के पास से एक अहम डायरी मिली, जिस में ज्यादा नहीं सिर्फ 50 लोगों के नाम व मोबाइल नंबर दर्ज थे. इन में से अधिकतर ट्रक ड्राइवरों के हैं या फिर उन लोगों के, जो आदेश के लूटे ट्रकों और उन का माल ठिकाने लगाने में उस के सहयोगी थे

पुलिस आदेश को ले कर वहांवहां गई, जहांजहां उस ने हत्याएं करने की बात कबूली थी. कई जगह लाशें मिलीं तो कई जगह से पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा, क्योंकि आदेश ठीकठीक जगह नहीं बता पाया कि उस ने लाश को कहां ठिकाने लगाया था.

अब से करीब 3 महीने पहले गायब हुए सीहोर के ड्राइवर राजेश पवार की लाश पुलिस ने उस की निशानदेही पर चंदेरी के निकट एक पुलिया से बरामद की, जिसे राजेश की पत्नी ने कपड़ों से पहचाना. इस रास्ते पर आदेश ने 2 ट्रक लूट कर 6 लोगों की हत्या की थी और सभी की लाशें पुलिया के नीचे पानी में फेंक दी थीं.

इन तीनों के 11 मील इलाके के कुछ ढाबे खास अड्डे थे, जहां से ये शिकार फांसते थे. आदेश की गिरफ्तारी के बाद देश भर के पुलिस थानों से भोपाल फोन आए कि कहीं उन के इलाकों में अज्ञात हत्याओं के आरोपी ये तीनों तो नहीं. यह बात भी पूछताछ में उजागर हुई कि महाराष्ट्र की तरफ की गई कुछ वारदातों को तुकाराम ने अपने दम पर अंजाम दिया था.

पुलिस हिरासत में आदेश की रंगीनमिजाज शख्सियत भी सामने आई. उस की एक प्रेमिका ग्वालियर में है तो दूसरी भिंड में. इन दोनों के नाम लिली हैं, जो अपने आशिक के पैसों पर लग्जरी जिंदगी जी रही थीं. लिली इन के असली नाम नहीं हैं, बल्कि ये नाम इन्हें आदेश ने अपनी सहूलियत के लिए दिए थे.

आदेश अपना खाली वक्त इन दोनों के साथ लेकिन अलगअलग गुजारता था. उस का कहना है कि उस की दोनों माशूकाओं को भी उस के गुनाहों की जानकारी नहीं थी. एक लिली के बारे में उस ने बताया कि वह कालेज गर्ल है जिस के बारे में चर्चा है कि वह उसे अपने धंधे में शामिल कर हाइवे क्वीन बनाने की मंशा पाले बैठा था.

पुलिस ने उस के ठिकाने पर दबिश दी लेकिन वह गायब हो चुकी थी. इसी तरह जयकरण की भी एक माशूका थी, जिस के बारे में उसे शक था कि उस के संबंध एक रिश्तेदार से हैं, जयकरण ने उस रिश्तेदार की ही हत्या कर डाली थी.

अक्तूबर के पहले हफ्ते में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गतिविधियां शुरू हुईं और आचार संहिता लगी तो आदेश की चर्चा भी कम हो गई. लेकिन अब तक पुलिस साहिबजी को गिरफ्तार कर भोपाल ले आई थी, जो गाजीपुर जेल में बंद था. इधर एक दूसरे पेशेवर अपराधी बिल्ला का कहना है कि वह दरअसल आदेश का गुरू है. बिल्ला का परिवार भी सालों पहले पाकिस्तान से आ कर झारखंड में बस गया था. सन 1989 में वह पंजाब से होता हुआ ग्वालियर आ गया और यहीं से आपराधिक वारदातों को अंजाम देने लगा.

बिल्ला भी ट्रक लूटता था. उस ने पहली वारदात साल 1992 में की थी. साल 2002 में वह राजगढ़ में गिरफ्तार हुआ था और सन 2007 में उस की मुलाकात आदेश से हुई थी. इस के बाद दोनों ने मिल कर हाइवे गैंग बना लिया था..

आदेश के जुर्मों की दास्तान बेहद उलझी हुई है, जिसे सुलझाने में पुलिस को पसीने आ रहे हैं. घटनाओं और पात्रों को सिलसिलेवार जमाना आसान काम नहीं रह गया है. इसी सिलसिले में 7 अक्तूबर को आदेश के मुंहबोले चाचा अशोक खांबरा का भी जिक्र हुआ, जिस की कहानी आदेश से कहीं ज्यादा दिलचस्प है. हिरासत में आदेश ने अपने मुंहबोले चाचा अशोक की बात कर के उसे अपना आदर्श बताया था.

अशोक खांबरा पर 70 हत्याएं कर ट्रक लूटने के आरोप हैं. उस की कहानी भी एकदम फिल्मी है. सन 2000 में वह बिलासपुर जेल में बंद था. पुलिस जब उसे पेशी के लिए ले जा रही थी, तब उस के गुर्गों ने फ्रूटी में नशीला पदार्थ मिला कर पुलिस वालों को पिला दी थी और अशोक फरार हो गया था.

इस के कुछ साल बाद अशोक के घर वालों ने अशोक की लाश नैनीताल के जंगलों में होने का दावा पेश कर उस का मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल कर लिया था. जब पुलिस रिकौर्ड में वह मर गया तो उस के खिलाफ चल रहे मामलों पर भी विराम लग गया. शक इस बात का है कि वह मरा नहीं बल्कि जिंदा है यानी नैनीताल के जंगलों में जो लाश मिली थी, वह अशोक की नहीं बल्कि किसी और की थी.

अब अशोक खांबरा की फाइलें भी खुल रही हैं और पुलिस उस का और आदेश का कनेक्शन भी ढूंढ रही है. अंदाजा है कि अशोक उत्तर प्रदेश में कहीं हो सकता है. इधर आदेश ने अशोक के बाबत चुप्पी साध रखी है. यानी मामला सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है.

अब नए नए किरदार आदेश से जुड़ रहे हैं, इस से पुलिस की मुश्किलें बढ़ रही हैं. इस के बाद भी वह जुटी हुई है कि बिखरी हुई कडि़यां जोड़ कर मामले को सुलझाए. अब यह सब चुनाव हो जाने के बाद ही संभव हो पाएगा, तब तक नएनए खुलासे होते रहेंगे कि आदेश के कहां, किस से, कैसे ताल्लुकात थे?

पता नहीं ऐसे और कितने हाइवे के हत्यारे सड़कों पर घूम रहे होंगें।

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