लक्ष्मी या सरस्वती

Saraswati

Saraswati

जय माँ सरस्वती!!

जबसे होश संभाला पढ़ाई की ओर धकेल दिया गया।अपना समाज ऐसा ही हो गया है।एक मिड्ल क्लास परिवार में बच्चे को पढ़ा लिखा कर कुछ बना दिया बस यहीं अभिभावकों की इच्छा पूर्ण हो जाती है।मैं नहीं कहता कि ये गलत है।पर बचपन में माता सरस्वती का भक्त आगे चलकर माता लक्ष्मी के भक्ति में डूब जाता है ये मेरी तो समझ से बाहर की बात है।

जब हम स्कूल जाते वहाँ की हर वस्तु में सरस्वतीें माता को देखते।किताब विद्या माता।कलम विद्या माता।डेस्क जिसपर किताब रखते उधर पैर न पड़ जाए।किताब गिर पड़े या पैरों से छू जाए तो उठाकर सिर से लगाना।सबसे बड़ी कसम विद्या कसम।

हर वर्ष वसंत पंचमी पर स्कूल में माता सरस्वती की मूर्ति स्थापना और विधिवत पूजन होता था।अपना अपना लोकल सोसाइटी ग्रुप भी मूर्ति स्थापित कर पूजा करते थे।स्कूलों के पूजा में हमारा रहना तो अनिवार्य होता ही था साथ ही साथ घर पे भी किताबो की अगरबत्ती और घंटे भर का अध्ययन जरूरी था।बाकी दिन पढ़े ना पढ़े उस दिन तो पढ़ना पढ़ता था।

थोड़े बड़े हुए तो एक हमारे शिक्षक महोदय थे एक दिन हम उनके घर ज्ञानोपार्जन के लिए गए थेे तो देखा वो सो रहे थे।और सोते समय उनका पैर एक किताब पर था।हमने सोचा गलती से उनका पैर किताब पर पड़ गया होगा।हमने उन्हें जगाया और ये बताया।उन्होंने कहा “जितना ज्ञान लेना था ले लिया अब लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते हैं” ये सुनकर हम चकित हो कर उन्हें देखते रहे थे।वैसे उनकी शिक्षा बहुत ही उम्दा थी इसमें कोई शक नहीं था पर हमारे लिए ये किसी बड़े पाप से कम नहीं था।

तब और अब में कितना फर्क आ गया है।अब तो विद्या लिखते ही अगला suggestion बालन आ जाता है।गूगल का।

अब सरस्वती के वो भक्त लक्ष्मी के उपासक बन चुके है।कब बसंत पंचमी आयी गयी कई बार तो इसका भी पता नहीं चलता।अब दीपावली हम बड़े जोश से मनाते है।भला हो इन बड़े प्राइवेट स्कूलों का इन्होंने सरस्वती पूजा को छुट्टी देकर अपनी इतिश्री कर ली।

अब  बच्चों को कही सरस्वती माता की मूर्ति दिख जाती है तो उन्हें बताना पड़ता है ये कौन है।क़यू इनकी पूजा अर्चना करते हैं।अब स्कूल सुरु से ही लक्ष्मी उपासक बनाते है।

ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जैसे सरस्वती नदी विलुप्त हो गई हमारी सरस्वती माता और उनकी बसंत पंचमी न विलुप्त हो जाए।

चलिए कमसे कम इस प्लेटफॉर्म पर सभी माता सरस्वती के भक्त है तो उनके लिए कुछ कथा भी हो ही जाए।शर्वप्रथम माता का जन्म कथा।

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है।

विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। 

जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

अब कुछ और सन्दर्भ कही से जोड़तोड़ कर।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो सरस्वती मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने सरस्वती मां की हंसी उड़ाई। 

हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। 

यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसन्त पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे महाराजा रणजीत सिंहकी सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

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