लोककथा भाग 4

एक सूफी संत थें।सूफियाना मिजाज के साथ ही उनके हाजिर जबाब होने की भी बहुत चर्चा थी।लोग उनसे दूरी ही बना कर रहतें थें पता नहीं कब किसकी पगड़ी भरे बाजार उछाल दें।

एक बार गर्मी के दिनों में संत कहीं जा रहें थे।डगर नई थी और गांव भी।थोडी दूर चलनें के बाद सूफी संत जी लगें गला फाड़ कर चिल्लाने।उनकी चीखें दूर दूर तक जा रहीं थीं।गाँव वालों को लगा कि इनपर कुछ भारी विपदा आन पड़ी है।सारे गांव वाले अपने अपने काम छोड़ भागकर इनके पास पहुँच गये।

गाँव के लोगों ने इनको सर से पाँव तक निहारा लेकिन कुछ भी असामान्य नहीं दिख रहा था।एक व्यक्ति ने पूछा “क्या हुआ बाबाजी।क्यों इतनी जोर जोर दहाड़े मार रहे हो?”
सन्त जी ने अपना दायाँ पैर ऊपर उठाया।लोगो ने देखा एक काटा चुभा हुआ है।एक व्यक्ति उनके पास गया और उस काँटे को निकाल फेका।

अब गाँव के लोग और अचंभित होकर उस संत को घूर रहें थें।एक नए कहा “मुल्ला जी एक छोटे से काँटे के चुभने पर आपने सारा आसमान अपने सर पर उठा लिया और बनते हो बहुत बड़े सन्त!!”

संत मुस्कुराते हुए कहने लगें “ये ऊपरवाला बड़ा कारसाज है।आज काँटा चुभाया है।अगर इतनी हाय तौबा नहीं मचाता तो उसका क्या भरोसा कल भाला ही दे मारे”

ये सुनकर गाँव वाले हँसने लगें और अपने अपने काम पर चले गए।

नानक साहब के बारे में भी एक कथा है।
कहते है नानक साहब एक बार काबा गए थे।वहां पर सारे दर्शन के बाद थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगें।एक मुल्ला जी उधर से गुजरें और नानक जी को सोता देख बरस पड़ें “लाहौल वला कूवत।काफिर तुम्हें इतना भी होश नहीं कि काबा की तरफ पैर करके सो गया”

नानक साहब ने नींद की आगोश में ही कहा “क्षमा करें भाई।मैं तो थककर सो गया दिशा का ज्ञान नहीं रहा।आप ही मेरे पैर उधर करदो जिधर खुदा का घर न हो।”

मुल्ला जी को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मन मसोसकर उसने नानक साहब का पैर पकड़कर घुमाने लगा।वो नानक साहब का पैर जिधर भी घूमता उसे उधर ही काबा नजर आता।अंत मे उसने हार मानली और नानक साहब से माफ़ी मांग अपने रस्ते चला गया।
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